भोजपुरी विशेष – दीवाली पर माटी से बनेला आ सजेला सपना के घरौंदा - मटकोठा

सांझि के माटीघर भा घरौंदा के पास भी दीया जलावल जाला.
सांझि के माटीघर भा घरौंदा के पास भी दीया जलावल जाला.

दीवाली के दिन सब कोई दीया जलावेला, घर के सजावेला बाकी लइकी सब माटी के घर बनावेली आ कुलिया - चुकिया भरेली , गीत गावेली. मटकोठा के बारे में देखीं एह आलेख में.

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  • Last Updated: November 12, 2020, 2:56 PM IST
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उ पलस्ती मार के बइठल बिया आ अपना गोड़ के पास भींगल माटी के लौंदा रखले बिया. लतरी हाथ से माटी के लौंदा पकड़ के दहिना हाथ के हथेली आ मुका से माटी के पीटऽ तिया. कबहुं - कबहुं पैर से माटी के लौंदा के कचटतिया , माटी सानऽ तिया, गुथऽ तिया. जरुरत पड़ता तऽ दु - चार ठोप पानी भी डालऽ तिया. माटी सानते-सानते उ कुछ सोचत भी बिया. ओकरा दिमाग में कुछ बात घुम रहल बा. चेहरा से लागता कि उ कवनो उलझन में बिया. फिर माटी के चौड़ा-चौड़ा पटी बनाके ओकरा हाथ के मुठी से पीट - पीट के लंबा पटी बनाव तिया. पटी तैयार मइला के बाद माटिए से उ एगो चरखुंट छोटहन घर बनाव तिया. देखते - देखत कई दिन से मेहनत कइला के बाद उ एगो माटीघर बना दिहलस . माटीघर तैयार भइला के बाद अब उ ओकरा ऊपर माटी के लेप लगवलस,गोरकी माटी से पोतलस, फिर ओकरा के रंग से रंगलस, सजवलस. माटी के घर देख के अब उ खुश बिया. अइसन शब्द ओह लइकी के मुंह से निकल रहल बा-
रामजी- रामजी पानी दऽ घोड़वा पिआसल बा,

ओदा- ओदा लेले जा सूखल - सूखल देले जा.

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अब ओकरा चेहरा पऽ परेशानी नइखे . अब ओकरा चेहरा पऽ अलग तरह के मुस्कान नजर आवता. ओकरा आंतरिक खुशी बा उ आनंदित बढ़िया. खुशी काहे ना होई, कई दिन से जवन घर उ बनावे में व्यस्त बिया ओह घर के पास आज उ बइठी. बइठ के पूजा करी, चुकिया भरी , चुड़ा भरी, मिठाई खाई, अपना भाई के मिठाई खिलाई , ओहिजा बइठ के गीत गाई , भजन गाई. दरअसल मटकोठा मतलब माटी के घर मतलब घरौंदा के निर्माण हमनी किहां लइकी लोग दीवाली के दिन करेला. दीवाली के दिन घरौंदा के अलगे महत्त्व होला. दीवाली में घर के सब लोग घर, आंगन आ खोरी के साफ सुथरा करे में लागल रहेला, दीवाली मनावे के तैयारी में व्यस्त रहेला, ओही समय में लगभग एक सप्ताह पहिले से लइकी लोग घरौंदा बनावे लागेला. शाम , दोपहर , धूप भा छांह में जब कभी लइकी लोग के समय मिलेला उ लोग भीड़ जाली आ मटकोठा बनावे लागेली. दीवाली के शाम तक मटकोठा रंगाई - पुताई के बाद तैयार हो जाला. जवना में उ सब के मेहमान , कल्पना आ कलात्मक रुचि समाहित रहेला.



दीवाली के दिन जब शाम हो जाला, थोड़ा अंधेरा हो जाला तऽ सभे अपना- अपना घर में दीया जलावे लागेला. देवी - देवता के पास दीया भी दीया जल जाला. तब घर आ टोला में लोग दीया , मोमबत्ती आ लाईट भी जला देला. ओकरा चलते पूरा मुहल्ला जगमग हो जाला . ओही घरी माटीघर भा घरौंदा के पास दिया जलावल जाला. घरौंदा में दीया जलला के बाद घरौंदा जहां बनल बा ओहिजे बइठ के कुंवारी लइकी आ बच्ची सब कुलिया-चुकिया भरेली. कुलिया चुकिया मतलब पकल माटी के चुकिया जवना के कोंहार लोग माटी से चाक पऽ बनावेला आ आंवा में पकावेला. लइकी सब कोंहार के घर से कुलिया ले आवेली.

चुकिया भी कई तरह के होला. कतहुं - कतहुं पांच गो चुकिया एके में सटल रहेला. चुकिया में चुड़ा, लकठो, लडू भा अउर कवनो मिठाई भरल जाला. ओकरा बाद चुकिया के ढकनी से ढक दिहल जाला .ओहिजे लछिमी जी के पूजा होखेला. पूजा पाठ करत समय घर के बड़ लोग माने बड़ बहिन, भाई आ माई भी रहेली . भाई के परसादी खिआवल जाला. कतहुं - कतहुं सुबह में चुकिया हटावल जाला. चुकिया भरला के बाद औरत सब देर रात तक जागेली आ बइठ के कई तरह के गीत गावेली. सबके पहिले गंगा माई के गीत गावेली ओकरा बाद कुलिया - चुकिया के गीत गावाला. एगो गीत में बहिन के उ भाई जवन बाहारा रहेला ओकरा से कुलिया चुकिया आ मिठाई लेके आवे के बात करऽ ताड़ी. भाई कहता कि हम ई सब ना ले आइब , बहुत महंगाई बा. तू बरत मत करऽ. बाकी लइकी अडिग बिया. उ कुलिया चुकिया जरुर भरी. देखीं एह गीत में-
मोरे भइया बसेले मोरंग मनेर
लेले आइहऽ हो भइया कुलिया चुकियावा
हमरा ही देसे बहिनी कुलिया महंग भइले
छोड़ देहुं ए बिहिनी कुलिया चुकियावा
ना छोड़ब ए भइया कुलिया चुकियावा
भरतऽ बानी ए भइया तहरो बधइया..

माटीघर भा मटकोठा नाम से ही माटी के घर बनावे के रिवाज बहुते पुराना हऽ. लइकी सब बहुत पहिले से एकरा के बनाव ताड़ी . जइसे - जइसे समय बितल ओइसे-ओइसे एकरा के बनावे में बदलाव भी भइल बा. कतहुं - कतहुं ईटा के दीवार बनाके ओकरा ऊपर माटी के लेप कके चुना से पोत दिहल जाला. ऊपर से रंग से डिजाइन बनावल जाला. एकरा संगही कूट आ गाता से भी घरौंदा बनता. गाता के दीवार बनाके रंगीन कागज से डिजाइन बनेला. अब ढेर जगे थर्मोकोल के भी घरौंदा बनता. छोटे - छोटे बाजार आ शहर में थर्मोकोल के घरौंदा बने लागल बा. आज घरौंदा बाजार में भी बिकाए लागल बा . कुछ लोग खरीदत भी बाकीर जवन घरौंदा भा मटकोठा लइकी सब अपना हाथ से बनावेली ओकर महत्व अलगे बा. ओकरा संगे उन्हकर संवेदना जुड़ल रहेला. माटी साने से रंग- रोगन करे तक में अपनापन रहेला. दीवाल पऽ पोताई करत खानी उन्हुकरा हाथ के जवन चिन्ह उभरेला, ओकरा संगे एगो सपना बनेला , एगो रचनाशीलता बनेला , उ सब बजारु घरौंदा में ना हो सके. ओकरा संगे एगो आस्था बा. एगो जीवन बा.

लइकी सब के बनावल माटीघर , मटकोठा , भा घरौंदा के अगर हमनी के कला के नजर से देखींजा तऽ ई लोक कला - शिल्प के बहुत बढ़िया नमूना बा. अलग - अलग घर में अलग - अलग लइकी घरौंदा बनावेली एह से ओह में उन्हकर शिल्प के बारे में पूरा सोच, नजरिया, कला से लगाव , रुचि सबकुछ दीखेला. जातना लइकी, जातना हाथ, जातना दिमाग उतना घरौंदा के प्रकार. सबके के देखे आ संग्रह करे के जरुरत बा. बाल शिल्प कला के रुप में देखे के जरुरत बा. आयोजन खतम भइला के बाद माटीघर के हमनी के खतम कर दीहींनाजा . ओकरा के रखे के जरुरत बा.
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