भोजपुरी विशेष: कोरोना काल में फेर - रेलिया बैरन पिया को लिये जाए रे… 

भोजपुरी विशेष: कोरोना काल में फेर - रेलिया बैरन पिया को लिये जाए रे… 
रोजी रोटी खातिर फेर गांव छोड़े के पड़त ता.

गांव देहात भोजपुरी के गीतन में बिरह के खूब वर्णन बा, गिरमिटिया मजदूर के तौर पर जाए वाला लोगन के चर्चा होखे चाहें वो समय कलकता-बंबई जाए वाला लोगन के. भोजपुरी में खूब गीत बनल. दखिं कि कैसे ये समय इ बिरह फेर फन उठा लेले बा -

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  • Last Updated: September 7, 2020, 3:38 PM IST
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रेलिया बैरन तबो रहे, आजो बा. तबो मेहरारु छाती पीटत ई गावत रहली सन, आजो .... समय के पहिया आगे बढ़ल बा बाकिर हमनी के स्थिति जस के तस बा.

हाले में सरनामी भोजपुरी के ब्रांड एम्बेस्डर नीदरलैंड निवासी राज मोहन अचीवर्स जंक्शन पर हमरा साथे इंटरव्यू में रेलिया बैरन गीत गावत ई बतावत रहलें कि ई ओही कालखंड के गीत ह जब अंग्रेज गिरमिटिया लोग के रेलगाड़ी में भर-भर के कलकत्ता ले गइलें आ उहाँ से भवानीपुर डिपो से पानी के जहाज में भर के मॉरिशस, फिजी, गुयाना आ सूरीनाम आदि देशन में.

आज कोरोना काल में लॉकडाउन टूटला के बाद, गांव में रोज़ी-रोज़गार ना रहला का चलते, विवश होके, लाचारी में जब केहू दिल्ली, बम्बई के ओर डेग बढ़ावsता त उनका पत्नी के चेहरा प उहे भाव बा - रेलिया बैरन पिया को लिए जाये रे.



राज़ी-ख़ुशी से ना तब केहू तैयार रहे, ना आज.
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वरिष्ठ निर्देशक अनुभव सिन्हा के निर्देशन में अभिनेता मनोज बाजपेयी भोजपुरी में एगो गाना गावत बाड़न. काल्हे माने शिक्षक दिवस के दिन टीजर रिलीज भइल बा.  डॉ. सागर के लिखल एह गाना के बोल बा –

‘मुंबई में का बा?...गांव-सहर के बिचवा में गजबे कंफ्यूजिआइल बानी / दू जून के रोटी खातिर बम्बई में आइल बानी.  ना त बम्बई में का बा ? इहवाँ का बा?’

एह मर्म के तह में जाये के पड़ी.  रेल आ जहाज बाउर थोड़े बा? ‘रेलिया ना बैरन, जहजिया ना बैरन, पिया पइसवे बैरी ना देशवा-देशवा भरमावे इहे पइसवे बैरी ना.’

हमार एगो शेर बा – ‘पटना से दिल्ली, दिल्ली से बंबे, बंबे से लंदन / भावुक हो आउर कुछुओ ना पइसे नाच नचावेला’.

त ई पइसा गाँव में नइखे.  पइसा माने रोज़गार.  एही से रेलिया बैरन बिया.

लागsता कि इतिहास फेरु अपना के दोहरा रहल बा.  ओह ऐतिहासिक काल (गिरमिटिया काल) के बाद कई गो पीढ़ी गुजर गइल बाकिर ना गुजरल त उ त्रासदी आ दरद.

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ना करे के से करावे काम एह संसार में / का कहीं भावुक हो, अइसन पेट ई चंडाल बा… पानी के बाहर मौत बा, पानी के भीतर जाल बा / लाचार मछरी का करो, जब हर कदम पर काल बा.

लाचार मछरी माने, के? आम आदमी.  हमनी के.  गाँव में भूखमरी बा आ बम्बई, दुबई, अरब में घुट-घुट के जीये के त्रासदी.  अब त कोरोना के त्रासदी.

त का गँउवे बम्बे-दुबई नइखे बन सकत ???

इही जी ठहर के सोचे के जरुरत बा.  एह सवाल के जबाब मिल जाई त ‘आ अब लौट चलें  ‘चाहे’ चलो गाँव की ओर ‘के नारा सांचो के बुलंद होखे लागी.  गाँव राजनीति के अड्डा से रोजी-रोटी के अड्डा बन जाई त लोग रेलिया से सैर-सपाटा करे जाई, हनीमून मनावे जाई, होलीडे बितावे जाई. मजबूरी आ लाचारी में ना जाई.

कोरोना बहुत कुछ समझावत बा.  जवन लइकी भावी दुलहा के रूप में एनआरआई खोजत रहली ह स, उ अब दिल्ली आ मुंबई वाला से भी परहेज करत बाड़ी सं. गाँव के महत्ता आ सत्ता समझ में आवे लागल बा, बस जरुरत बा ओकरा के साधन संपन्न बनवला के. पढ़ाई-लिखाई, चिकित्सा आ रोज़ी-रोज़गार के साधन जुटवला के.  ना त इतिहास अपना के बार-बार दोहरावत रही.

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जइसे आज से लगभग 200 बरिस पहिले रोजी-रोजगार खातिर पांच बरिस के एग्रीमेंट क के सैकड़ो लोग परदेश गइल आ जेकरा हाथ के मेंहदी के रंग अबही छुटलो ना रहे उ दुल्हिन करेजा प पत्थर राखि के एह लोग के ले जात रेलगाड़ी के कातर नजर से देखत, बिरहिन भाव से गुनगुनात रहली- ’रेलिया बैरन पिया को लिये जाए रे’... ई सिलसिला चलत रही, अगर अपना सरजमीं के हालत ना सुधरी.

ई गीत सदियन से एह क्षेत्र के त्रासदी आ दरद के प्रतिनिधित्व क रहल बा. ई हर्ष के ना विषाद आ टीस के गीत बा.

तब देश गुलाम रहे.  अब देश के आजाद भइला 73 साल हो गइल बाकिर एह लमहर कालखंड में ना अंग्रेज एह क्षेत्र के विकास-रोजी-रोजगार के साधन तइयार करे खातिर गंभीर रहले आ ना अब के कर्णधार.  अंग्रेजन के त बात समझ में आवेला, बाकिर एह रहनुमा लोगन के का कहल जाव आ का कइल जाव?

पुरबिया ना खाली अपना श्रम शक्ति से बलुक अपना जीवटता आ बुद्धिमत्ता से देश-विदेश सगरो अपना के स्थापित कइले.  मजदूर बन के गइलें बाकिर अपना पौरुष से मालिक बन गइलें, गिरमिटिया बन के गइलें बाकी गवर्नमेंट बन गइलें.  चमका देलें ओह देश के.  स्वर्ग बना देलें. बाकिर आपन गाँव-घर, नेटिव प्लेस स्वर्ग नइखे बन पावत, ई काहे ? कविता-कहानी आ अखबार में मड़ई-पलानी ग्लैमराइज होता.

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जिंदगी ग्लैमराइज काहे नइखे होत. दुःख के गावे में बड़ा मजा आवेला बाकिर ओकरा के भोगे में, ... बाप रे बाप! जे भोगत बा सेही जानsता.

आज गाँव सबका मन परsता. शहर में कंपनी-कॉर्पोरेट में छंटनी के सीजन शुरू हो गइल बा.  कहीं-कहीं वेतन दू-दू महीना के बकाया चले लागल बा. बाकी लइकन के स्कूल फीस, फ्लैट के किराया भा मकान के ईएमआई भा दूनो, दवा-दारु वगैरह-वगैरह सब खर्चा बड़ले बा. एही में रात-बीरात जब कबो अँघी टूटsता त बुझाता कि मेल प टर्मिनेशन लेटर आइल बा.  जे बेरोजगार हो गइल बा, ओकरा नया रोजगार के कवनो संभावना लउकते नइखे.  अइसे में आदमी मानसिक, सामाजिक आ आर्थिक अवसाद में घिर रहल बा.

दरअसल दिल आ दिमाग के रास्ता पेट से होके जाला. पेट में आग लागी त ओकर लपट दिल आ दिमाग तक जइबे करी.  जब लपट दिल आ दिमाग तक जाई त ओकर असर परिसंचरण तंत्र आ तंत्रिका तंत्र यानी कि दिल के धड़कन आ दिमाग के फड़कन पर पड़बे करी. बीपी बढ़ी आ दिमाग खराब होई.  ख़राब दिमाग से सही निर्णय होला ना.  आदमी अंड-बंड करे लागेला.  त सउँसे देश में अंड-बंड के स्थिति उपजे के ढेर संभावना बा.  ई बहुत बड़ त्रासदी बा जवन कोरोना लेके आइल बा.  कोरोना खाली बेमारी ना जिनगी के राहु-काल बा.

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साँच कहीं त एह कोरोना काल में आदमी के जिनगी चूल्हा हो गइल बा आ देह लवना.  ओही में जरsता-धनsकता आदमी.  एह लपट से मानवता के बचावे खातिर जल्दिये कुछ उपाय कइल जरुरी बा.  हमरा आपन एगो शेर ईयाद पड़sता -

पेट में आग त सुनुगल बा रहत ए भावुक
खुद के लवना के तरह रोज जरावत बानी

शहर में दिल-दिमाग सब जरsता.  आदमी भोंकार पार के रोवे के चाहsता.  केहू लोर पोंछे वाला भी नइखे इहाँ.  अइसना में गाँव आँख का सोझा नाचsता.

त सवाल बा कि अपना ओह गाँवे के मॉरिशस, फिज़ी, सूरीनाम भा दिल्ली-मुंबई काहे ना बना दिहल जाव.  एकर बीड़ा उठावे के पड़ी.  ई सामूहिक सोच आ प्रयास के काम बा भाई.  जब ले अइसन ना होई पूरब के जनाना लोग ई गीत गावे खातिर अभिशप्त रहीहें कि रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे.
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