भोजपुरी में पढ़ें - गोधन पूजा बहिनन के त्योहार

भाई खातिर उत्साह से बहिन गोधन मनावेली
भाई खातिर उत्साह से बहिन गोधन मनावेली

दीवाली के बाद कातिक महीना के शुक्ल पक्ष द्वितीया के दिन भोजपुरी भाषी क्षेत्र में गोधन कूटल जाला आ दलिदर खदेरल जाला. ई हमनी के बहुत पुराना रिवाज हऽ.

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  • Last Updated: November 16, 2020, 6:39 PM IST
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भुनेश्वर भास्कर

खूब कूचु - कूचु अन्हरिया रात भइल बा. आसमान में जोन्ही अबहीं टिमटिमाते बाड़ें , तीन डड़ियावा तारा भंडार कोना पऽ पहूंच गोइल बा, मतलब रात खतमें होखे वाला बा. सगरो सांय - सांय करता. पुरवइया हवा बहता ओकरा चलते थोड़ा सिहरावन भी लागता, जवना चलते लोग चादर आ गमछा ओढ़ के सुतल- परल बा. अबहीं खोरी, गली भा दलान से कवनो बुढ़उ लोग के खोंखे के आवाजो नइखे आवत. कबो - कबो कुकुरन के भोंके आ लड़े के आवाज जरुर आवता तबो कवनो असर नइखे पड़त, सभे उंघाइले बा .अइसने सुनसान आ अन्हरिया रात में अब कवनो - कवनो घर से कुछ - कुछ आवाज आवे लागल . थप - थप , थप - थप , ढब - ढब , ढब - ढब के आवाज गते - गते आवे लागल . बुढ़िया दादी , औरत आ लइकीन के कुछ आवाज आवे लागल . फटऽ - फटऽ सब कोई के दरवाजा खुले लागल. लतरी हाथ में सूप आ दहिनी हाथ में हंसुआ लेके ऊ बार - बार सूप के पिटऽताड़ी कहऽ ताड़ी , लइकिया आ औरत सब भी कुछो - कुछो बोलऽ ताड़ी . अलगे - अलगे झूंड में ढेरे औरत सब हंसुआ से सूप बाजावे लगली . अपना - अपना घरे से निकल के पातर- पातर खोरी आ गली मुहे बाधारी ओरे जा ताड़ी आ कह ताड़ी-

इसर तिसर दलिदर बहरी
लछिमी घर में बसस...

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बधार में जाके उ लोग सूप के जला देलस. ओकरा बाद माटी के दीयरी में करुआ तेल डाल के ओह में कपड़ा के बाती डाल के ओकरा के जलावेली आ ओकरा लौ पे हंसुआ रख के काजर बनावेली. ऊ काजर सब कोई के लगावल जाला. कहल जाला कि काजर से उपरवार से बचाव होई आ टोना ना लागी. हंसुआ से सूप पीटे के रिवाज बहुते पुराना हऽ. कहल जाला कि बाजा रे बाजा साल भर में एके बार बाजा. सूपे काहे पीटाला एकरा बारे में बहुत कुछ कहल ना जा सकेला. सूप के उपयोग हमनी किहां अनाज फटके खातिर कइल जाला. कहल जाला कि सूप लछिमी के रूप होला, अइसे भी कबहुं पैर से ओकरा के धांगल ना जाला. सूप पुराना हो जाला तऽ ओकर रुप बदल जाला फिर ओकरा के हटा दिहल जाला, दोसरा सूप के रखल जाला. कहल जाला कि अब ओह में कंगाली आ गोइल बा. एह से कंगाली के खदेड़ऽ आ लछिमी बलावऽ. इहे रिवाज बा. ओइसे कुछ जाति में ई रिवाज नइखे भी. लइकी आ औरत सब जब दलिदर खदेड़ के घरे आवेली तऽ अलग मिजाज में हो जाली आ गोधन बाबा के बखान करे लागेली. ऊ सब के गावल एगो गीत देखीं-

गोधन अइलें , पाहुन अइलें
चंदन के पीढ़ा बइठावऽ
मुंह कूट मुआऊ पुतवा बढ़ई के
चंदन के पीढ़वो ना देबो.

रात में जाग - जाग के औरत सब ढेरे खाना बनावेली . घरे - घरे जाउर ,दाल भर के पुरी आ पीठा बनेला . एकरा के अमर पीठा कहल जाला. बिसवास कि पीठा खइला से लोग ढेर दिन जिंहें . छोटे - छोटे लइकन के खिआवत घरी औरत लोग कहेली कि -

अमर पीठा लाद में
चल दलिदर ताल में.

ओकरा बाद लइकी आ औरत लोग अपना - अपना घरे से गाय भा भंइस के गोबर के लोंदा ले लेके कोई के दलान पऽ भा दुआर पऽ जुटेली. सब लोग एगो थरिया मेंं अगरबत्ती , गुड़ , बूंट , लडू , बतासा, सिन्दूर, रोरी आ रेगनी के कांट लेके आवेला . सभे गोबर एके जगे रखेला. लोंदा - लोंदा गोबर होखे से गोबर के एगो छोटहन टिला हो जाला. ओही गोबर में से थोड़ा सा गोबर लेके बगल में जमीन पऽ पहिले एगो गोधन बाबा आकृति बनेला. गोधन के सिर , शरीर , हाथ आ पांव बनेला. ओकरा सटले गोधन बो माने गोधन के मेहरारू के आकृति बनेला. ओकरा बाद दुनों लोग के कउड़ी से आंख बनेला आ दांत बनावे खातिर जौ के उपयोग होला. ओकरा बाद गोबरे से सांप आ बिछी बनावल जाला. औरतन द्वारा बनावल ई कलाकृति लोककला के बहुत बढ़िया नमूना होला. ओइसे गोबर से आकृति कहीं भी ना बने. ओही घरी औरत लोग रेगनी के कांट से अपना जीभ में गड़ावेली आ गोधन के सारापेली. ओकरा बाद गोबर पऽ चना आ मिठाई सब चढ़ावेली. उन्हकर पूजा करेली. चारों तरफ से खड़ा हो जाली आ फिर एगो मुंसर अउरी पांच गो डंडा लेके पांच जानी गोधन बाबा के कूटे के शुरुआत करेली. जब कूटे लागेली तऽ सब औरत लोग गीत गावेली-
आवरा कुटीना, भांवरा कुटीना

कुटीना जम्ह के दुआर
कुटीना भइया के दुश्मन
आठों पहर दिन रात-

गीत से स्पष्ट हो जाता कि गोधन बो भइया के दुश्मन ह लोग. इहो धेयान देबे वाला बात बा कि अगल- बगल सांप आ बिछी बनेला, ई दूनों दुश्मन के प्रतीक रूप में बड़ुए काहे से कि अइसहुं आदमी के सांप बिछी से डर रहेला कि ऊ काटे मत , डसे मत . एहिजा ओह सोच के समझल जा सकेला. कातिक महीना के शुक्ल पक्ष द्वितीया के दिन गोधन पूजा, गोधन कूट भा भइया दूज के आयोजन औरत आ लइकी लोग अपना भाई के मंगल कामना खातिर करेली . जब गोबर कूटाला त ओह में बूंट डालल जाला , उ बूंट कूटा ना पावे. बूंट भाई ह ऊ बाच जाला. फिर भाई के बूंट खिआवल जाला.
गोबर कूटत घरी औरत लोग अलग - अलग गीत गावेली, ओह गीतवा में भाई के बीरता के बखान होखेला. एगो गीत में उ लोग कहता कि भइया के घर धन अउरी अन से भरल रहे आ उ ढेर दिन जियस आ भउजी के खुश रहस, परिवार बढ़े, देखी एह गीत में-

चलले कवन भइया अहेरिया
कवन बहिनी देली आशिष
जिअस हो मोरे भइया
जिय भइया लाख बरीस
भइया के बढ़े सिर पगिया
भउजी के बढ़े एहवात.

गोबर कूटला के बाद औरत लोग एक दूसरा के पानी पिआवेली आ पूछेली कि-
का पिअताड़ू
आंवरा भांवर के पानी-

ओकरा बाद बिआहल औरत एक दूसरा के मांग में सिन्दूर लगावेली आ आशीर्वाद लेली. ऊ बिबाहिता जे अपना मायके में ही बाड़ी ऊ अपना ससुराल के बारे में बात करऽ ताड़ी. कहऽ ताड़ी कि ससुराल से दोसर कोई आई लिया जाये तऽ ना जाइब आ पति जी अइहें तऽ चल जाइब , देखीं एह गीत में.

निसी ही रात के अंजोरिया ए बाबा
बरवा तऽ खेलन हम जइबो ए बाबा
बर तऽ से खेल कूद के लवटनी ए बाबा
आई गइले नउआ दुआरावा ए बाबा
नउआ के संग हम ना जइबो ए बाबा
छुड़िया देखावत रहिया लेई जइबो ए बाबा
स्वामी जी के संग हम जइबो ए बाबा
हंसत- खेलत रहिया लेई जइबो ए बाबा..

ओकरा बाद लइकी आ औरत लोग गोबर के लोंदा ले जाके सारी घर के दीवार पऽ गोबर के पांच - पांच गो पिंडी लगा देला आ एक महीना तक गीत गावेला . ओकरा बाद पिड़िया के आयोजन होला.
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