भोजपुरी विशेष: तपोभूमि हौ गोरखपुर के माटी

भोजपुरी विशेष: तपोभूमि हौ गोरखपुर के माटी
अब जौन सहर बा, ऊ मूल रूप से तब जंगल रहल.

गोरखपुर बाबा गोरखनाथ जी के तपोस्थली त हइले ह,आध्यात्मिक चेतना के जोत जरावे वाले कई अउर साधु-संत येह पवित्र भूमि में भइल हवें. सरयू के किनारे से हिमालय के तलहटी तक फइलल येह छेत्र के करमजोगी महापुरखन के समर्पित लेख

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 10, 2020, 3:00 AM IST
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हरिए बाबा गोरखनाथ के नाम से जानल जाला. एही से अनुमान लगाईं कि बाबा गोरखनाथ जब आइल रहल होइहें तब इहाँ का रहल होई. हमायूँपुर से गोरखनाथ मंदिर भ कहीं कि रेलवे लाइन के आगे सोनौली वाली सड़क पर पुरनका फ्लाईओभर से उतरते बाईं ओर एक ठो राहि जाले. इ रहिया रामलीला मैदान होत सूरजकुंड कालोनी में जाले. बकिर रामलीला मैदानो से पहिले जौन जगहि बा ओके अबहिनो पुराना गोरखपुर गाँव के नाम से जानल जाला. ई पुराना गोरखपुर गाँव ऊ जगही ह जहाँ गोरखनाथ बाबा बहुत दिन ले तप कइले रहले. बहुत बाद में उनके तपस्थली पर राजस्थान के राजा मान सिंह एगो पोखरा बनववले आ ओहीं एगो सिवाला भी बनवले. बाबा के असर उहाँ अबहिनो अनुभो कइल जा सकेले. अब जौन सहर बा, ऊ मूल रूप से तब जंगल रहल.

ओही जंगले के बीचे कहीं-कहीं गाँव रहलन. जंगल क हालत ई रहल कि ऊ राप्ती नदी के आरे-पारे दक्खिन में सरजू जी से लेके आ उत्तर में हिमालय जी ले कुल जंगले-जंगल फैलल रहल.

जेके एह इतिहास के तसदीक करे के हो ऊ अबहिनो लगभग हर तीसरे गाँव या बजार के नाम में उपनाम जैसन लगल जंगल चहे कौनो पेड़ के नाम से एकर तसदीक क सकाला. गोरखपुर से अगर रेल से उत्तर यानी नौतनवा ओर चलीं त पहिला टीसन नकहा जंगल ह, जौन अब गोरखपुर सहर क हिस्सा हो चुकल हौ. उहाँ से थोरे और आगे बढ़ीं त मानीराम छोड़ के फिर कौड़िया जंगल ह. सहर के पुरुब ओर कुसुम्ही पूरा जंगले ह. आसपास के और जगहिन में जंगल धूसड़, जंगल बब्बन से लेके अलग-अलग पेड़-पौधा के नाम पर बनगाईं, बरगदवा, महुआतर, बाँसगाँव, बड़हलगंज... ऐसन सैकड़न नाम इहाँ रउरे पा जाइब.



जंगल एक तरफ अपने आसपास रहे वाले जीवधारी के जिअले के जरूरत भर के पूरा साधन देले त दुसरे तरफ तरह-तरह के संघर्स, एक तरफ पुरहर सांति त दुसरे तरफ ओह सांति के चीरत तरह-तरह के भयावह अवाजि, चिंग्घाड़. गोरखपुर सहर के आज जौन सबसे बेसी भीर वाला चौक-बजार हवें, ओह कुल जगह ढेर नाईं चालिस-पचास साल पहिले तक कास-मूज-नरकटे के झाड़ी में लोग सियार-बिगवा घूमत देखले हौ आ ऊ लोग अबहिन सहरिए में मौजूद हवें. अब भला तप के लिए जंगल से निम्मन जगह और का हो सकेले!
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कंचित एह मटिए में कुछ अइसन हौ कि हर उन्नत आध्यात्मिक चेतना के पहिले त ई अपनी ओर खींचेले आ फिर अपने ढंग से सबके अलग-अलग तरह के तप में लगा देलिन. बाबा गोरखनाथ से पहिले एही मिट्टी में गौतम बुद्ध हो भैल रहलें, जे पूरी दुनिया के आपन जोत आपै बनले के संदेस देहलें. इहाँ के संत परंपरा में एह बीचे छोट बड़ा केतना जने अइले-गइले एकर कौनो लेखा-जोखा रखल केहू के लिए बहुत मुस्किल हौ, बकिर एह बाती के साखी त महाभारत हौ कि पांडव लोग अपने अज्ञातवास के दौर क बड़हन हिस्सा इहाँ बितवले. गोरखपुर सहर से करीब 60 किलोमीटर उत्तर आर्द्रवन में स्थित दुर्गा माई के थान ऊ जगहि ह जहाँ पांडव लोग आपन सब दिव्यास्त्र एगो समी के बिरिछ के सौंप के बिराट नगर चल गइल रहलन. आर्द्रवन के अब अदरौना कहल जाला. ई लेहड़ा टीसन के लगे हौ, एह नाते बहुत लोग अब एके लेहड़ा नाम से भी जानेले. बिराट नगर अब नेपाल में हौ. पांडव परिवार खातिर बनबास से लेके अज्ञातवास के ई पूरा र कौनो तप से कम त नइखे रहल.

अध्यात्म आ ओकरे लिए तप के ई क्रम लगातार चलले आवत हौ, ई अलग बाति बा कि ओकर तरीका और बहाना बदलि गइल हो. कबो दुनिया के कौनो प्राकृतिक संकट से मुक्ती दियावल जरूरी रहल त महातिमा लोग ओह हिसाब से तप कइल. मानव समाज के भलाई खातिर आपन धुनी रमावल, त कबो समाज में अपनहीं ब्यापि गइल कुरीति आ रूढ़िए समाज के दुसमन हो गइल आ तब ओसे मुक्ती दियावल समझ के लोग ओह हिसाब से तप कइलस. कबो बिस्मरन के गर्भ में समा गइल अपने प्राचीन बांग्मय के फेर से हेरल एगो कठिन चुनौती बनि गैल त कबो बिदेसी सासन से मुक्ती बहुते बड़ा चुनौती हो गैल. ऐसन हर समय पर गोरखपुर के माटी समय के अनुकूल तप के लिए अद्भुत ढंग से लोगन के प्रेरित कइलस आ सही समय पर ओकरे लिए पूरा माहौल भी बना देहलस.

ऐसने एक तपस्वी भइलन परमहंस योगानंद जी. उनकर परिवार बंगाल से रहल. पिता श्री भगवती चरन घोष जी बंगाल-नागपुर रेलवे में वाइस प्रेसीडेंट रहलन आ ओह समय ऊ गोरखपुर में ही पोस्टेड रहलन जब बालक मुकुंद लाल के जनम भैल. बालक मुकुंद लाल में आध्यात्मिक छमता त सुरुए से रहल आ एकर अनुभव भी उनके आसपास के लोगन के कई बार भैल. केवल 11 साल के उमिर में इनके माताजी के निधन हो गैल आ हाई स्कूल के बाद ही ऊ बनारस के एगो आस्रम में चल गइले आ करीब 17 साल के उम्र में उनकर भेंट अपने गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि जी से भैल. इहे बालक मुकुंद आगे चल के परमहंस योगानंद बनले. योगानंद जी पहिला भारतीय गुरु हवें जौन जा के अमेरिका में आपन डेरा बनौले आ उनही के लिखल ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी, जौन 1946 में छपल, के अब तक 40 लाख से ज्यादा प्रति बिक चुकल हौ. हार्पर सैन फ्रांसिस्को के अनुसार ई 20वीं सदी के 100 सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक पुस्तकन में से एक ठे हौ और लॉस एंजिलिस टाइम्स के अनुसार परमहंस योगानंद जी 20वीं शताब्दी के पहिला सुपरस्टार गुरु हवें. निहचित रूप से गोरखपुर के माटी के अइसन सपूत के जनम देहले के गर्व त होखही के चाहीं.

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एही माटी में भाई जी हनुमान प्रसाद पोद्दार समय के ओह छोर पर अइले जब प्राचीन भारतीय बांग्मय के सहेजल बहुत दुसवार काम हो गैल रहल. हालांकि उनकर जन्म राजस्थान के रतनगढ़ में भैल आ कारोबार के लिए ऊ पिताजी के साथे कलकत्ता चल गइले. उहाँ ई क्रांतिकारी अरविंद घोष (महर्षि अरविंदो) के संपर्क में आ के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गैलन. फिर देशबंधु चितरंजन दास, झाबरमल शर्मा, लोकमान्य तिलक, गोपालकृष्ण गोखले और वीर सावरकर आदि कई क्रांतिकारी लोगन के साथे काम कइलन. काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्थापना में भी खास योगदान कइले. आ ई सब कइले के बाद ऊ भारत के सांस्कृतिक धरोहर सहेजे आ ओके जन-जन तक कम से कम कीमत पर पहुँचावे बदे गोरखपुर आ गैलन. इहाँ आके गीता प्रेस के स्थापना और कल्याण पत्रिका सहित करीब छह सौ दुर्लभ पुस्तकन के प्रकासन भाई जी के समय में संभव भैल. एकरे अलावा गीता वाटिका और कैंसर अस्पताल के स्थापना आ समाजसेवा के अनगिनत काम में भाई जी के योगदान भुलाइल ना जा सकेले. एही गीता वाटिका में संत राधा बाबा के उपस्थिति भी भाई जी के ही तप के फल रहल. ई सब कौनो तप से कम ना रहल.

ई गोरखपुर के धरती के तापस प्रभाव के ही असर रहल जौन गांधी जी स्वतंत्रता आंदोलन के गति देवे बदे 1920 में इहाँ बाले मियाँ के मैदान में ऐतिहासिक जनसभा के संबोधित कइलन. एह जनसभा में गांधी जी बोलवले के निर्णय भी संजोग से एक ठे जनसभा में भइल रहल. ई जनसभा मौलवी मकसूद अहमद फैजाबादी और गौरीशंकर मिश्र के अध्यक्षता में 17 अक्टूबर 1920 के भैल रहल. एही निर्णय के अनुसार बाबा राघवदास के अगुआई में एगो प्रतिनिधिमंडल नागपुर गैल आ उहाँ जा के गांधी जी के गोरखपुर में सभा कइले के न्योता दिहलस. दस्तावेजन के अनुसार ओह सभा में करीब डेढ़ लाख लोगन के भीड़ रहल.

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एही गोरखपुर सहर के बड़ी जेल में 16 दिसंबर 1927 के दिन अंग्रेज सरकार स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल के फाँसी दिहले रहल. अंग्रेज सरकार के सामने ऐसन संकट कहीं और ना आइल रहल कि ओके फाँसी दिहले के बाद परिवार के लोगन देह सौंपे बदे दीवार तूड़े पड़ल हो. लेकिन गोरखपुर में बिस्मिल जी के फाँसी दिहला के बाद ई करे के पड़ल. जेल के मेन गेट पर एतना भीड़ जुटि गैल कि अंग्रेज सरकार के हिम्मत नाईं भैल सामने से बिस्मिल जी के पार्थिव सरीर निकाले के. दीवार तूड़ के पीछे से निकलले के बादो भीड़ मानल ना आ पूरे सहर के चक्कर लगावत राजघाट ले जा के राप्ती नदी के किनारे बिस्मिल जी अंतिम संस्कार कइलस. एह जुलूस में भी करीब डेढ़ लाख लोग सामिल भैल. तप के ई संस्कार एह माटी में अबहिनो ओतनही सिद्दत से देखल जा सकेले. चहे ऊ बाढ़ के समय प्रकृति से होड़ लिहले के हो या फिर सामान्य समय में प्राकृतिक संसाधन आ जीव जंतु के बचउले में. आध्यात्मिक परंपरा के महान साखी गोरखपीठ त हबे करे.
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