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भोजपुरी में पढें – पर्व-त्योहार के मजा आखिर कहें घटत जाता

भोजपुरी में पढें – पर्व-त्योहार के मजा आखिर कहें घटत जाता

मोबाइल के लोकप्रिय होखे के पहिले तक पर्व त्योहार के लेके बहुत उत्साह रहत रहल हा.

मोबाइल के लोकप्रिय होखे के पहिले तक पर्व त्योहार के लेके बहुत उत्साह रहत रहल हा.

आप सब त जानी ला की टीवी की बाद तकनीक में बदलाव तेज हो गइल. पहिले कम्प्यूटर आउर फिर मोबाइल. कम्प्यूटर त गांव में अबहियों ठीक से ना पहुचल ह. कम्प्यूटर सिखवले की नांव पर देखावे खातिन कुछ डब्बा रख लिहले हवन सो. लेकिन डब्बा रखले का होई. सामुदायिकता के बोध मन में होखे के चाहीं.

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‘भाट भाटीन मर गइलन, सातो भइया परदेश गइलन, सोन चीरइया चिंता में बा कि भेदभाव करे वाली भउजीन की संग्हे कईसे बीती. सात में से छगो भउजी अइसन बाड़ीं सो की ननद से असंभव काम करवावत बड़ीं सो. जइसे कि जेठकी भउजी कहलीं कि कुवां पर जो आउर बिना डोर बल्टी के चलनी में पानी ले आउ. दूसरकी जानी कहलीं की जंगल में जो आउर बिना रसरी से बन्हले लकड़ी ले आउ. तिसरकी जानी कहलीं की भेड़ीहवा करिया कमरा के धो-धा के गोर क के तबे घरे अयिहे. अयिसही कुल भउजी कुछ न कुछ काम दे दीहलीं. सबसे छोटकी तनी मुलायम रहलीं. उ ननद के अयिसन समस्या में पड़ले पर चुपचाप मदद करें. लेकिन बड़की कुल दबंग रहलीं सो. उ अपना आगे छोटकी क ना चलें दे सो. एही बीच भाई कमा के घरे आ गईलन स आउर बहिन के सासत देख के उनहन के बहुत दुख भईल. कुल जानी क परीक्षा लिहलन सो. जे जानी गलती कईले रहलीं जा उनके सजा मिलल आउर सबसे छोटकी की संग्हे राज-काज आगे बढ़वलन सो.’

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किस्सा कहे वाली बुढ़ियामाई
हमरी गाँव में एगो बूढ़ीमाई पीड़ीया में इहे कहानी ढेर सुनावें. गाँव भर क लईकी जुटे आउर बूढ़ीमाई इहे कहानी सुनावे. शुरुआत एगो गाना से होखे- ‘निरफल जाय हो सदासी पीड़ीया’. समूह में लोग गावे त ओकर रंगत देखे लायक रहे. फिर रात भर लईकी अपनी नई-नई कलाकारी से गरगद्द मचावें. खूब नाचल गावल होखे. हंसी-ठिठोली करें. रात छोट पड़ जाय. अगले दिन काम करत समय कवनो लईकी अलसिया जाय त बहुत डांट पड़े. लेकिन लईकी अगले दिन फिर से वही जगह पहुंचे आउर ओही उर्जा से गीत-संगीत, कथा आगे बढ़े.

तब बहुत अभाव रहे. गांवभर की लइकिन के रहले-खईले क जोगाड़ कयल एक अदमी के बस क ना रहे. सब केहू अपना सूते खातिन घर से लेवा ले के जाय. खाना खा के जायं आउर दाना-भेली/चुरा लेके जायं. सब मिलबांट के खायं आउर जशन मने. इकुल महीना भर चले. गाँव भर क लईकी एक अदमी की घरे जुटें आउर कबो कवनो दिकत ना होखे. गाँव के लोगन के पूरा भरोसा रहे की लईकी उनकरा घरे सुरक्षित रहियन सो. कुछ बढ़िया चीज सीखीहें सो. लईकी कुल साल में एक महीना खूब आनंद उठावें. आनंद से ढेर इ समय उनके सीखले क रहे. बहुत कुछ रचनात्मक होखे. जवन अकेले होखल संभव ना रहे.

लोक में पर्व-त्यौहार सामूहिकता बोध क उदाहरन ह. इहो कहल जा सकेला कि सम्मिलित परिवार की संग्हे संग्हे लोगन के समूह ज्ञान सबसे अधिक पर्व-त्यौहार पर मिलत रहे. खिस्सा/कहानी से लेके उपदेश दिहले तक क बात समूह में होखे. पर्व/त्यौहार क महिमा वहीँ से सीखे के मिले. बुढ़-पुरनिया लईका-लईकिन के रहन सीखावें. खायल, बोलल, केहू क सम्मान कयल जईसन बहुत सामान्य काम सीखे खातिन पर्व एगो बहाना रहे. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी आउर पीढ़ी दर पीढ़ी बात आगे बढ़े. पेड़-पौधा, जीव-जंतु सबकरी खातिन कुछ न कुछ उनहन लोगन की पास रहे. नदी, कुवां, तलब, बउली सबके टिकल जाय. सबकर पूजा होखे. आप समझ सकीलां की एगो त्यौहार क विस्तार एतना रहे कि कुछऊ ना छूटे.

पर्व – त्योहार के टाइम घटल
लेकिन समय की संग्हे धीरे-धीरे लोगन क रहन बदल गईल. बिसवास कम होखे लागल. एक महीना चले वाला कार्यक्रम आज कुछ घंटा में हो जाला. एकाएक इ स्थिति ना भइल ह. पहिले एक महीना क तिउहार पनरह दिन भईल. लइकी एक महीना क कहानी पनरह दिन में सुने/कहे लगलीं सो. कुछ समय इ चलल आउर फिर टीबी क जमाना आ गईल. तनी ओहरो समय देवे के परे लागल. त्यौहार क मनोरंजन सनीमा से होखे लागल. साल भर पीड़ीया क होखे वाला इंतजार कमजोर पड़े लागल. सबके घरे में मनोरंजन क नया साधन आ गईल. एक महीना अगोराए वाली पीड़ीया खातिर पनरह दिन निकलल भारी पड़े लागल. पीढ़ी बदलल त इ भईल कि अब एतना दिन तपसिया के करी? त लोग ओकरा के घटा के सात दिन क दिहलन जा.

टेक्नॉलॉजी के असर !
आप सब त जानी ला की टीबी की बाद तकनीक में बदलाव तेज हो गईल. पहिले कम्प्यूटर आउर फिर मोबाईल. कम्पुटर त गांव में अबहियों ठीक से ना पहुचल ह. कुकुरमुत्ता मतीन खुलल अंग्रेजी पढ़ावे वाला स्कूल कम्पुटर सिखवले की नांव पर देखावे खातिन कुछ डब्बा रख लिहले हवन सो. लेकिन डब्बा रखले का होई. सीखले क काम त तब होई न जब बढ़िया मास्टर रही. सही इ ह कि कम्पुटर सीखल पीढ़ी अब गांव/गिराव में ना रुकत. सहर में उनहन लोगन के ठीक-ठाक तनखाह मिल जात हिय. अयिसना में गवईं स्कूलन में कम्पुटर की नांव पर कुल मामला देखावटी ढेर ह. ओसे आगे अबहीं कुछ ना भईल ह. एहिसे सामाजिक विघटन में कम्पुटर क ढेर भूमिका ना ह.

कम्पुटर क बच्चा मतलब की मोबाईल ढेर सत्यानास कईले बा. अब पर्व-त्यौहार पर होखे वाला मनोरंजन कमजोर हो गयल ह. बल्कि कहल जा सके ला की नई पीढ़ी खातिन महत्वहीन हो गईल ह. एकर सबसे बड़हर नुकसान इ ह कि महीना भर चले वाला पर्व कुछ घंटा में सिमट के रह गईल ह. मतलब कह सकीला की खानापूर्ति से ढेर अब कुछ ना बचल ह. समय की संग्हे चलल जरुरी ह. लेकिन एकर मतलब इ ना न होखे के चाही की सीखले-जियले क तरीका भुला जायल जाव. कवनो पर्व-त्यौहार खाली दिन तारीख महीना साल कटले क माध्यम ना हवे. ओकरा संग्हे आउरो बहुत कुछ होखे ला. महीना भर चले वाली पीड़ीया कुछ घंटा में सिमट गईल एकरा से कवन नुकसान बा, इ केहू पचास साठ साल क औरत बता दिहें. सबसे ढेर नुकसान आपसी समझ क भईल ह. आज एक-दूसरा के समझले-बतवले-सिखवले क तरीका बाउर लागत बा. आपसदारी में मेल-मिलाप ना भईले की कारन बिसवास क हालत इ बा कि अब तनिको देर खातिन आपन सयान लईकिन के केहू अकेले ना भेजल चाहत ह. परिवार क कवनो सयान मेहरारू संग्हे जालीं तब लईकी जा सके ले नहीं त ना जाई. एतना बढ़िया पर्व अब आखिरी साँस लेत ह. ओकरा के जियावे क कवनो प्रयास ना देखात बा. अब त तकनीक आउर आगे बढ़ल जात ह. डर इ ह कि आवे वाला समय में इंटरनेट पर मिले वाला परसाद मतीन इहो न आनलाईन हो जाय. नहीं त तनी-मनी जवन सदभाव बचल बा उहो बिला जाई.

Tags: Article in Bhojpuri, Chhath Puja 2020, Kartik Purnima

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