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भोजपुरी विशेष - सरगो में प्रेम फइलावत होइहें कथाकार अमरकांत

भोजपुरी विशेष - सरगो में प्रेम फइलावत होइहें कथाकार अमरकांत

तमाम पुरस्कार से सम्मानित अमरकांत जी के साहित्य संसार आम लोगन के आस पास के रहल हा.

तमाम पुरस्कार से सम्मानित अमरकांत जी के साहित्य संसार आम लोगन के आस पास के रहल हा.

इलाहाबाद यानी प्रयागराज के आपन घर बना लेबे वाला हिंदी साहित्यकार अमरकांत जी के जन्म बलिया में भइल रहे. भोजपुरिया माटी के ये रत्न के कई गो हिंदी रचना हर तरह से वैश्विक स्तर के बाड़ी सब. अमरकांत जी दरअसल प्रेमचंद जी के परंपरा के एगो नया आयाम देले रहना हां.

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अमरकांत बहुते आत्मीय कथाकार, उपन्यासकार रहले ह. ओतने सहज आ पारदर्शी. उनकर रचना दिल के छू के दिमाग में रजिस्टर हो जाली सन. फरवरी 2014 में ई संसार छोड़ि के अमरकांत जी जब सरग में गइले त हिंदी साहित्य जगत में एगो जगह सून हो गइल. ऊ प्रेमचंद के परंपरा के कथाकार रहले ह. ऊ ओह घरी आपन पहिचान बनवले जब “नई कहानी आंदोलन” जोर पकड़ चुकल रहे . नई कहानी आंदोलन प्रेमचंद के परंपरा के प्रकारांतर से विरोध करत, साहित्य जगत में इज्जत पावे लागल रहे. नई कहानी के नायक शहरी (गांव भा कस्बा के ना) , व्यक्ति केंद्रित रहे आ एमें स्त्री- पुरुष संबंध के प्रमुखता दिहल जात रहे. नई कहानी आंदोलन के केंद्र में जवन कथाकार रहे लोग ओमें- मोहन राकेश, कमलेश्वर आ राजेंद्र यादव अग्रणी पंक्ति में रहे लोग. बाकिर अमरकांत प्रेमचंद के धारा के आगे बढ़ावत गइले. पूरा मजबूती आ प्रखरता के साथे. अमरकांत जिला बलिया ( उत्तर प्रदेश) के मूल निवासी रहले. नया उमिर में हमरो लेखक बने के भूत सवार हो चुकल रहे. एही धुन में हम उनका इलाहाबाद के घर पर खूब जाए लगनीं. उनसे बातचीत कके बहुते सुख मिले काहेंसेकि उनकरा जइसन सरल विद्वान व्यक्ति हम बहुते कम देखले बानी. उनकर हंसी आ बातचीत में एगो मिठास रहत रहल ह.

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अमरकांत जी कवनो भी पुरस्कार से बड़ रहलन ह. हालांकि उनुकर उपन्यास- “इन्हीं हथियारों से” खातिर 2007 में उनुका के साहित्य अकादमी पुरस्कार आ 2009 में व्यास सम्मान मिल चुकल रहे. ज्ञानपीठ पुरस्कार भी 2009 में मिलल. लगभग एही के आसपास के समय में उनुका के सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिलल रहे. उनकर कहानी- “डिप्टी कलक्टरी”, “दोपहर का भोजन”, “जिंदगी और जोंक” आ “हत्यारे “ एक बार पढ़ि लिहला के बाद भुला ना सकेला. भीतरे भीतर ए कहानियन के पात्र रउरा चिंतन धारा में हस्तक्षेप करे खातिर खाड़ हो जइहन सन. अमरकांत अपना साथे रउरा के बहा ले जाले. “दोपहर का भोजन” में सिद्धेश्वरी देवी अपना उपेक्षित पति आ बेरोजगार बेटन के आधा पेट से भी कम भोजन देतारी. जाहिर बा केहू के पेट नइखे भरत. जब घर के सब केहू खा लेता त ऊ देखतारी कि उनका खातिर खाली आधा रोटी बाचल बा. सिद्धेश्वरी देवी चुपचाप रोअतारी. उनकर रोवल पाठक के अतल गहराई तक हिला देला.

सहज जीवन शैली
सन उन्नीस सौ अस्सी के आसपास जब हम अमरकांत जी से इलाहाबाद में भेंट कइनी त ऊ सोवियत संघ (जेकरा के बोलचाल में हमनी का रूस कहत रहनी जा) के राजधानी मास्को के यात्रा से लवटि आइल रहले. ऊ एगो बड़ा रोचके किस्सा सुनवले . नहइला का बाद समस्या रहे कि भींजल तौलिया कहां पसारल जाउ. कहीं कवनो रेंगनी भा रस्सी जइसन चीझु ओइजा आसपास रहबे ना कइल. त अमरकांत जी गरम पानी के पाइप पर आपन अंडरवियर आ तौलिया फइला दिहले. सांझ तक कुल भींजल कपड़ा गरम पानी के पाइपे पर सूखि गइल. अब ऊ इहे उपाय रोज करे लगले. एह तरकीब पर हम आ ऊ खूब हंसनीं जा. साहित्य के बात भी ऊ एतना सहजता से कहत आ बतावत रहले ह कि हमनी का हंसी वाला माहौल में भी बहुत कुछ सीखि जात रहनी हं जा. ओह दिन उनका साथे उनुका घरे हम पराठा- सब्जी के जलपान कइनी आ खूब नीमन चाय पियनी. सबेरे टहले खातिर ऊ एगो बहाना खोजि लेले रहले ह. ओह घरी ऊ ग्वाला से दूध लेबे खातिर खुदे खटाल तक जात रहले. ग्वाला उनुकरा घरे खुदे दूध देबे पर तेयार रहे भा घरो के लोग आ के खटाल से दूध ले जाए के तेयार रहे. दूध ले आइल कौनो समस्ये ना रहे. बाकिर ऊ सबेरे ग्वाला किहां जाइके दूध लेत रहले ह. कहत रहले ह- एही बहाने टहरलो हो जाला. बाकिर कई बार हमरा लागत रहे कि अमरकांत जी अपना कथा पात्रन से अचानक अइसहीं भेंट करत होइहें. ओह घरी ऊ अपना उपन्यास- “सुन्नर पांड़े की पतोहू” लिखत रहले. उपन्यास में ढोलक के ध्वनि- कुदरबेंट, कुदरबेंट के उल्लेख अतना मोहक ढंग से कइल गइल बा कि रउवां के भीतर तक गुदगुदा दी. उपन्यास के भाषा- शैली आ पात्रन के संवाद समूचा हिंदी आ भोजपुरी भाषी प्रदेश के लोगन के हृदय के गहराई में उतरि जाला ( एह उपन्यास के अंश कौनो पत्रिका में छप चुकल रहे आ ई उपन्यास ओह घरी खूब चर्चा में रहे). एह उपन्यास पर हमनीं का देर तक बातचीत कइनीं जा. ओह घरी अमरकांत जी बेमार रहले. तबो उनकर मोहक हंसी जस के तस बरकरार रहे. जहां तक मन परता- उनका रीढ़ के हड्डी में दर्द रहे. ऊ बीच- बीच में लेट जासु. थोड़े देर बाद दिल्ली जाए खातिर हमार ट्रेन रहे. हम इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के तरफ चल दिहनी.

गांधी जी के असर
एक जुलाई 1925 के जन्मले कथाकार, उपन्यासकार अमरकांत 17 साल के उमिर में महात्मा गांधी के “अंग्रेजों भारत छोड़ो” आंदोलन में सामिल हो गइले. जब ऊ इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़त रहले त उनकर संपर्क आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया आ जय प्रकाश नारायण से भइल. उनकर जनपक्षधरता अउरी मजबूत भइल. उनकरा भीतर के लेखक अउरी धारदार हो गइल. महात्मा गांधी के आंदोलन “करो या मरो” के प्रभाव बलिया पर त रहबे कइल जल्दिए महाराष्ट्र के सतारा आ पश्चिम बंगाल के मिदनापुर तक फइल गइल. एही आंदोलन पर केंद्रित उनकर उपन्यास “इन्ही हथियारों से” बहुते रोचक बा. इतिहास के कथा में गूंथि के अमरकांत जी अद्भुत प्रयोग कइले बाड़े. पाठक एक बार पढ़े सुरू करी त उपन्यास खतमे कइके मानी. हालांकि उनकर बाकी उपन्यास “काले उजले दिन”, “सुखजीवी”, “सूखा पत्ता”, “सुन्नर पांड़े की पतोहू” वगैरह भी रोचकता में एक से बढ़ि के एक बाड़ सन.

नजदीक लागे वाला चरित्र रचना
अमरकांत के पात्रन के संवाद पाठक के मथत रहेले सन. “हत्यारे” के दू गो युवक कौनो कामधाम नइखन सन करत. खाली बड़- बड़ बात करेके ओकनी के आदत बा. ई दूनो लइका एगो गरीब स्त्री के शारीरिक शोषण करतारे सन आ ओकर मजदूरियो पचा घालतारे सन. बाकिर ऊ एक दूसरा से डींग हांकतार सन कि जवाहर लाल नेहरू आ जान एफ कैनेडी से ओकरनी के गहिर आत्मीयता बा. डींग हंकला में ऊ इहो कहसन कि प्रधानमंत्री के पद त ओकनी के थरिया में राखि के परोसल जात रहे बाकिर ओकनी के एहू पद के ठोकर मारि दिहले सन. अराजक इतना कि अपना पीछा करे वाला एक युवक के ई दूनो हत्या क देतारे सन. हमेसा नियर एक रात जब ई दूनो दारू पियत रहले सन त ओकनी में से एगो युवक कहता ह- “हम सोचत रहनीं हं कि जब हम प्रधानमंत्री बनबि त तोहरा के भ्रष्टाचार आ जातिवाद विरोधी समिति के प्रेसिडेंट बना देब. बाकिर तूं एतना कम दारू पियब त अधिकारियन से घूस कइसे लेब? चार सौ बीसी कइसे करब? झूठ कइसे बोलब? तूं देस के सेवा करे लायक नइख.” मनुष्य के निकम्मा प्रजाति के लोगन पर अमरकांत जी के कटाक्ष बहुते धारदार रहत रहल ह.

जनता के साथ लेकिन विसंगति पर प्रहार भी
अमरकांत हमेशा जनता के साथे, भा जदि दोसरा भाषा में कहीं त आम आदमी के साथे खड़ा रहत रहले ह. उनुकर लेखन विसंगतियन पर लगातार चोट करेले. लेकिन हमनीं का अपना लेखकन के योगदान के जल्दिए भुला जानी जा. बंगाल में त लेखकन के जन्मतिथि भा पुण्यतिथि पर कवनो कार्यक्रम क के ओह लेखक के बहाने देश के मौजूदा हालत पर बातचीत करे के परंपरा अभियो बा. बाकिर हिंदी आ भोजपुरी भाषी लोगन में ई परंपरा खतमे हो रहल बा. एह परंपरा के आगे बढ़ावे के बारे में सोचे के परी. ए पर मंथन करे के जरूरत बा. लेखक के केंद्र में राखि के देश के परंपरा के बारे में बातचीत, आम आदमी के सरोकार के बारे में बातचीत बड़ा स्वस्थ परंपरा रहि चुकल बा.

पत्रकारिता की सेवा
अमरकांत लंबा समय तक इलाहाबाद के मित्र प्रकाशन में संपादक के रूप में काम कइले. देखल जाउ त ऊ आर्थिक रूप से समृद्ध ना रहले. बाकिर दिल के विलक्षण धनी रहले. एक बार केहू उनुका से भेंट क लेउ त उनकर दीवाना हो जाउ. गहिर घनत्व वाला मिठास आ प्रेमपूर्ण बातचीत खातिर हमनी आजुओ तरस तानी जा. अइसन आपन लागे वाला साहित्यकारन के पीढ़ी में उनुकर सबसे ऊपर स्थान बा. जदि कौनो नया लेखक, पत्रकार खातिर सिफारिशी चिट्ठी लिखे के बा त ऊ तुरंते लिखे के तेयार हो जासु. एहघरी के अइसन बा? चिट्ठी पर नोकरी पावे वा जुग- जमाना अब हइयो नइखे. उनकरा वजह से केहू के कुछ भला हो जाए त उनुका बड़ा आनंद आवत रहल ह. अइसन लोगन के संख्या धीरे- धीरे कम हो रहल बा कि बढ़ता रउरे सभे बताईं. कम से कम अमरकांत जी के बहाने एह बिषय पर चिंतन त कइले जा सकेला.

Tags: Allahabad news, Article in Bhojpuri

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