भोजपुरी में पढ़ें- महर्षि भृगु के तप:स्थली : लोकमेला ददरी

बलिया के ददरी मेला खाली मेला ना ह संस्कृति के हिस्सा ह.

ददरी के मेला ओतने प्रसिद्ध बा, जेतना भोजपुरी आ बलिया जिला. महर्षि भृग से लेकर भारतेंदु तक ये मेला के इतिहास बा, आ आधुनिक दौर के समृद्ध वर्तमान भी. अइसे त मेला में मीना बाजार से मुशायरा तक सब कुछ होत रहला हा, लेकिन एह साल कोरोना के कारण वो रूप में ददरी मेला नइखे लागत.

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संत - महात्मा के मेलजोल आ संगति के बड़ा महातम रहल बा. ई मेल-मोहब्बत आ संग-साथ समाज आउर मनई के भला कवन मंगल ना करे!जड़ता के जरी-सोरी हरन करेवाली, बानी में सच्चाई ले आवेवाली, मान-मरजाद आ तरक्की के राह देखावेवाली, पाप के समूल नाश करेवाली, मन-मिज़ाज खुश राखेवाली आउर चौतरफा जस-कीर्ति के पताका फहरावेवाली ई सत्संगतिए नू होले. ओइसहूं भारत भूंइ सभे धरम-सम्प्रदाय के केन्द्र बिन्दु रहल बा. प्राचीनेकाल से नामी संत-महात्मा लोग के धार्मिक सम्मेलन-समागम होत आइल बा,जहवां लौकिक आउर पारलौकिक ज्ञान के चरचा - परिचरचा आ सद् विचारन के आदान-प्रदान खास मकसद होत रहे. आस्ते-आस्ते दूर-दूर से मरद-मेहरारू संतन के दर्शन आ प्रवचन सुने खातिर जुटे लगलन, जहवां तीरथजात्री के मेल-मिलाप का संगहीं ओह सभके जरूरत का मोताबिक चीजु-बतुस कीने-बेसहे के प्रधानता होत गइल. उत्तर प्रदेश के पूरबी छोर पर बसल भृगुक्षेत्र (बलिया) में कातिक पूरनमासी के मोका प गंगा-सरजू के संगम लागेवाला मेला ददरी, जवन महर्षि भृगु के अनन्य शिष्य दर्दर मुनि के इयाद में लागेला, ऋषि-मुनियन के तप:स्थली रहल बा. सामाजिक परिवेश के बदलाव का संगहीं ऋषि-समागम का रूप में मनावल जाएवाला एह मेलो के सरूप बदलल आ आजु ददरी मेला लोकमेला का रूप में सुप्रसिद्ध बा. हालांकि एह साल पहिले जिला प्रशासन ददरी मेला ना लगावे के निरनय लेले रहे,कोरोना महामारी का डर से, बाकिर लोक आस्था का आगा फेरु निरनय बदले के परल, काहें कि एह मेला के खास महातम रहल बा.

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सत्ये तु पुष्करं क्षेत्रं, त्रेतायां नैमिषं परं
द्वापरे तु कुरुक्षेत्रे, कली गंग विशिष्यते।
गंगाद्वारं, हरिद्वारं, प्रयागं स्थानमुत्तमं
वाराणसी दर्दरं च पंचस्थानं विमुक्तिदम्।
तत्रापि दर्दरं क्षेत्रं गंगा -सरयू संगमम्
दर्शननस्पर्शनस्नान्नरो नारायणो भवेत्।

कहे के माने ई कि सतजुग में पुष्कर, त्रेता में नेमिषारण्य, द्वापर में कुरुक्षेत्र, कलिजुग में गंगा- ई सभ खास तीरथ बाड़न स. गंगाद्वार, हरिद्वार, प्रयाग, काशी आ ददरी- एह पांचों तीरथ से मोक्ष मिलेला. इन्हनियों में गंगा-सरजू के संगम पर बसल सभसे अधिका पावन दर्दर क्षेत्र दर्शन, आचमन आ नहान से नर-नारी के नारायण-तुल्य कऽ देला. दर्दर क्षेत्र के मोक्ष देबेवाला शिव क्षेत्र मानल गइल बा. कहल जाला कि मनई के सैकड़ों जनम के पाप के दारण (नाश)करे का वोजह से ई क्षेत्र दर्दर क्षेत्र के नांव से तीनों लोक में लोकप्रिय भइल.

भृगु महातम के पौराणिक कथा

पुरातन काल में महर्षि भृगु बलिये में गंगा-सरजू के संगम पर आपन साधना शुरू कइलन आ ओही घरी से बलिया का संगें 'भृगुक्षेत्र ' जुड़ि गइल. ब्रह्मा के संतान भृगु मुनि एगो अइसन तपस्वी रहलन, जे सत्पथ पर ले आवे खातिर भगवान विष्णु के छाती प लात मारि देले रहलन. पुराण में लिखाइल एगो कथा के मोताबिक, एक हाली ऋषि-महर्षि में ई चरचा छिड़ल कि त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु, महेश- में से केकराके सभसे सेसर पूजनीय मानल जाउ? ई बहुते कठिन काम महर्षि भृगु के जिम्मे सउंपि दिहल गइल. भृगु मुनि सभसे पहिले ब्रह्मा का लगे पहुंचले, बाकिर जानि-बूझिके उन्हुका के प्रणाम ना कइले. फेरु त ब्रह्मा के किरोध सातवां आसमान पर रहे. आखिर उन्हुके बेटा उन्हुका के प्रणाम ना करे, ई त हद हो गइल ! भृगु जी के ई बात बूझत देरी ना लागल आ ऊ उलटे पांव लवटि अइलन, ई सोचत कि इन्हिकरा लेखा किरोधी एह पूजा के काबिल कतई ना हो सके.

भृगु मुनि कैलाश के राह धइलन आ शंकरो जी किहां जाके ओइसने सलूक कइलन. नतीजा ई भइल कि पार्वती-पति शिव एकदम मुंह फुलाके बइठि गइलन आ उन्हुका से बातो ले ना कइलन. फेरु त उन्हुका नियर आत्म अभिमानी के ऊ एह पूजा के काबिल ना समुझलन.

थाकल-खेदाइल भृगु मुनि जब क्षीर सागर में ढुकलन, त बेवक्त भगवान विष्णु के लछिमी जी का संगें शयनकक्ष में देखते उन्हुकर पारा गरम हो गइल आ ऊ चितान लेटल विष्णु के वक्षस्थल पर बरियारे लात मारि दिहलन. विष्णु भगवान के अपना गलती के भान भइल आ ऊ भृगु मुनि के गोड़ धऽके कहलन,'मुनिराज! कतहीं रउरा पांव में चोट त ना लागल?'

महर्षि भृगु के तलाश पूरा भइल आ ऊ सोचलन--एह पद के जोग त विनम्र भगवान विष्णुए बाड़न. आजुओ भगवान विष्णुए के स्थान सर्वोपरि मानल जाला. बाकिर भगवान के छाती प लात मारला के पाप उन्हुका साथे जुड़ि गइल. देवता उन्हुका देह पर मृगछाला फेंकलन, जवना के शरीर से सटि गइला से पाप के पुष्टि हो गइल. फेरु त देह प सटल मृगछाला लेले पारी-पारी से तमाम तीरथ भरमि अइलन. बलिया शहर से तकरीबन दू मील दक्खिन गंगा-सरजू के संगम पर महर्षि भृगु के बदन से सटल मृगछाला गिरल आ इहे धर्मारण्य महर्षि के तप:स्थली बनल. ओही पवित्र स्थल पर दर्दर मुनि एगो विशाल जग्य कइलन, जवना के पूर्णाहुति कातिक पूरनमासी के भइल. बाद में ओही तिथि के महर्षि भृगु आ दर्दर मुनि के पावन इयाद में एह तीरथ पर मेला लागल शुरू भइल, जवन आजुओ लोकमेला का रूप में विख्यात बा.
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मौजूदा भृगु आश्रम ऋषि के तिसरका आश्रम हऽ. दूगो आश्रम गंगा के उफनत धारा में समा गइल. किछु लोग ई मानेला कि पहिले ददरी मेला बांसपुर का लगे लागत रहे, जहवां दर्दर मुनि के स्थान बा.
भृगु मुनि के मेला ऋषि-मुनियन के समागम के केन्द्र बिन्दु रहे. बाद में दूनों मेला मिलि गइल आ ददरी मेला का रूप में ख्याति मिलल.

मेला-बेवस्था

शुरुआत में मेला के मए बेवस्था सरकार के जिम्मे रहे. बाद में जिला परिषद से मेला के प्रबंध होखे लागल. ओकरा बाद मेला के तमाम इंतजाम-जिम्मेवारी नगरपालिका के हाथ में आ गइल. आजादी के पहिले सन् चालीस के आसपास आवेवाला तीरथजात्री के तादाद आउर क्षेत्रफल के लिहाज से ददरी मेला के उत्तर भारत में तिसरका स्थान रहे. सन् बेयालिस के जनक्रांति के आन्दोलन के समय में मेला लागल बन्न हो गइल रहे आ सन् 1946में दोबारा शुरुआत भइल,जवन आजुओ जारी बा. अब ई मेला कातिक सुदी 11से आरंभ होके अगहन के अमावस ले लगभग तीन हफ्ता चलेला.

मवेशी-मेला

अलगा-अलगा जाति के मवेशियन खातिर मवेशी-मेला में अलगा-अलगा इंतजाम रहेला. बैल, गाय, भइंसि, घोड़ा आ गदहा खातिर चार गो अलगा-अलगा जगह के प्रबंध रहेला. मवेशियन के भेड़ियाधसान के मजबूत बल्ला से घेरिके सुविधानुसार प्रवेश आ निकासद्वार बनावल जाला. पंजाब, हरियाणा, बिहार वगैरह सूबन से लाखन मवेशी बिक्री खातिर आवेलन. तय समय के एक हफ्ता पहिलहीं ई मेला शुरू हो जाला. मवेशियन-बैपारियन के जान-माल के समुचित हिफाजत-बेवस्था खातिर हैंडपाइप, पुलिस थाना, पांच गो चौकी गश्त लगावे बदे पांच-पांच के दस टोली में तेयार रहेले.

खास चुंबकीय खिंचाव- मीना बाजार से मुशायरा तक

लाखों-लाख मरद-मेहरारू कातिक पूनो के भोर में गंगा में डुबकी लगाके भृगु मंदिर में जल चढ़ावे देश-विदेश से पधारेलन. जदी एह बरिस के महामारीकाल के छोड़ि दिहल जाउ, त हरेक साल रेल महकमा के टिकट खातिर कई गो खास बेवस्था, डाक विभाग के डाक बेवस्था, जल बेवस्था, पूछताछ आउर सूचना-प्रसारण वगैरह तमाम इंतजाम रहेला.

मीना बाजार मेला के आकर्षण का केंद्र में रहेला. किसिम-किसिम के कपड़ा, सौन्दर्य प्रसाधन के सामग्री, लोहा, काठ के दोकान

अलगा-अलगा लाइन में करीना से लागल रहेली स. दंगल, सरकस, चलत-फिरत चिड़ियाघर, कवि सम्मेलन, मुशायरा आ सांस्कृतिक कार्यक्रम देखते बनेला. नीमन-नीमन नसल के लहलहात पौधन के नर्सरी मेला में ढुकते कतारबद्ध होके मन मोहेला.

एह हरियरी का संगहीं ददरी मेला गंवई नारियन के सतरंगा पहिरावा, सिंगार-पटार से जगमगा उठेला. लजात, सकुचात, इठलात मेहररुई दल मेला से मनमाफिक साज-सिंगार के चीजु-बतुस, जलेबी-पटउरा के गठरी बन्हले, डोलची लटकवले लवटी. किछु लोग मेला के मजा लूटी आ केहू खुदे लुटाके मुंह लटकवले वापिस लवटी. ददरी मेला- जहवां हंगामा बा, हंसी-खुशी बा, हुल्लड़बाजी बा, चीख-पुकार बा, आध्यात्मिक दर्शन बा, भोजपुरी हलका के गौरवशाली लोकसंस्कृति के झांकी बा आ बा बहुत कुछ. अतना कुछ, जवन अनमोल बा, अनकहल बा, अनलिखल बा. गंवई नारियन के मेला का प्रति ललक के का शब्दन में बान्हल जा सकेला? महेन्दर बाबा कहले बाड़न:
माया के नगरिया में लागल बा बजरिया,
ए सोहागिन सुनऽ,
चीझुआ बिकाला अनमोल,
ए सोहागिन सुनऽ!

भृगुक्षेत्र के ई मेला हर साल आवेला आ हमनीं के धरमाचरण करे,अधरम-पाप से बचे आ सत्पथ पर आगा बढ़ेके सबक देला. चीजु-बतुस के खरीद-बिक्री आ मेल-मिलाप का जरिए मानवता के सीखो मिलेला. परिचित-अपरिचित से नेह-छोह से मिलिके लोकसंस्कृति के आदान-प्रदान आ 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' के सद्भावना के सौगात लेके हुलास-उछाह से लवटले में एह लोकमेला के सार्थकता बा.

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