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भोजपुरी विशेष – कोरोना के टाइम आ असो के बलिया ददरी मेला में

बलिया के ददरी मेला अबकी रस्म अदायगी भर रहि गइल हा.
बलिया के ददरी मेला अबकी रस्म अदायगी भर रहि गइल हा.

बलिया के कई चीज बहुत मशहूर ह. ओकरा में ददरी मेला बहुत खास ह. असली में इहे मेला ह, जहांवा से जे जवन चाहेला उ ओकरा मिलेला. केहू आपन जानवर बेचेला, केहू कीनेला. केहू घर परिवार खातिर समान किनेला, त केहू खातिर इ खाली घूमे आ लोगन से मिलेके मौका होला. खेती-किसानी से लेकर घर-दुआर आ मन करे तो सर्कस, मुशायरा -कवि दरबार सब एके जगह.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 1, 2020, 5:07 PM IST
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एह साल बलिया के ददरी मेला लागी कि ना लागी, एपर बड़ा एनो-ओने भइल हा. बाकिर बाद में लोग तय कइल हा कि मेलवा लगाइ दिहल जाउ. भीड़ प कंट्रोल राखल जाई. आखिर ददरी के बड़ा महातम ह. कातिक के पुरनवासी के असनान के संगे शुरू होखे वाला मेला एक महीने से भी ढेर चलेला. अइसे त पशु मेला पहिलहीं शुरू हो जाला. इ बात प्रशासन पर भारी परल हा अउर धरना-अनशन के दबाव में मेला लागि गईल बा. सरकार अउर प्रशासन के जोर बा कि कोरोना से बचे के उपाई कइल जाऊ. इ कहां तक सफल होई, राम जानसु. बाकिर मेलवा लागल बा त एहू साले एकर धूम शुरू हो गईल बा. ददरी मेला पर कुछ समय पहिले एगो गीत आइल रहे, ऊ गानवा एह साल के मेला पर फिट बईठत बा-
असो के ददरी में बलिया अइब कि ना अइब
ऐ पियऊ मेला घूमइब कि ना अइब ...
लागल रही जिंनीगी के झमेला बलम जी
चलीं ना घुमा दीं हमके मेला बलम जी
... जाता देखे रोज, रेला बलम जी.

उऔरतिया के ई सवाल पहिले ए अरथ में रहल हा कि सभे मेला जात बा. तुहूं आव त ददरी चलल जाउ. अब कोरोना में एकर अरथ इहे निकाले के चाहीं कि एह महामारी में मेला के का हाल रही. अइसे जानकार लोग त इहे कहते बा कि चुनाव अउर मेला के आगे महामारियो पानी भरी. ई ददरी के मेलवा अइसने हवे कि कमाए खातिर देस-परदेस गइल लोग साल में जरूर आवे ला. असल में एह मेला के दुगो हिस्सा होखे ला- एगो असनान के पहिले दस दिन मवेशी के खरीद-बिक्री और दुसरका पुरनवासी के बाद त पनरह (15) दिन तक खेल-तमाशा, खाईल पियल अउर तरह तरह के सामाना के बेसाही. जाड़ा शुरू भईल बा. केहू के कंबल, ऊनी शाल, कोट- सदरी अऊर ऊनी सलवार समीज कीने के बा. केहू के बेटा-बेटी के बियाह बा त एह मेला में तरह-तरह के साड़ी-कपड़ा, बेटी के बिदाई के सामान मिल जाला. दूर-दूर से आईल दोकानि से घरेलू सामान जईसे तेल-मसाला-अंचार तक एह मेला में मिले ला. अंचार बनावे खातिर नींबू - बड़का मरीचा चाहीं, तवने एहि जा होला.



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आदमी से पहले पशु मेला चलेला
ददरी मेला के कमाल त ई बा कि पशु मेला से लेके दोसर हाट-बाजार कुल्हि एक से एक होला. देखीं ना पुरनवासी के पहिले पशु बाजार लाग गइल. जिला में बांसडीह तहसील के सुरहियां गांव से एक लाख रुपया के गाइ आइल रहलि हा. इ गाइ 24 घंटा में 24 लीटर दूध देले. बनारस के आदमपुर निवासी इत्ते सरदार यादव हरियाणा से एक दर्जन भंइसि लेके पहुंचल रहले हा. अइसन लोग हर साल आपन गाइ-गोरू लेके आवेला. एह में पंजाब अउर बंगाल के पशु व्यापारी भी शामिल होला.

पशु मेला के बाद खास हलचल वाला चरखी-कठघोड़वा, सर्कस में मौत के कुंआ अउर जादू वाला हलचल भी पुरनवासी के संगे शुरू हो गईल बा. तरह तरह के हाट-बाजार एके जगहि लागी त सामानो खूब आवे ला. रोज-रोज के बाजार से सास्ता भी मिलेला. खास बात इहो बा कि ऊनी कपड़ा के दोकानि बाड़ी सन, त खूब दूर ले ऊहे मिली. दोसर कपड़ा चाहीं त ओकर दोसर पटरी बा. आ मीना बाजार के ते कहहि के का बा. जवन सामान औरति अपना घर के मरद से ना मंगा सकेली सनि, तवन झुंड बनाके खुदे मेला में खरीदे ली सनि. आखिर एहि खातिर ता गनवा में ई कहल गईल बा-
बड़ि दुरि ले लागे ला हई मेला देख भारी
देखे खातिर जात बाड़ि गनेश जी के साली.

मेला मिलेजुले के भी बहाना होखे ला. जेकर घर नजदीक बा, नवका पतोहि अपना नईहर के लोगन के बोलावे ली, पुरनिया दादी-काकी भी गंगा नहाए खातिर भाई-भतीजा के परिवार के बोलावा भेजे ला. लोक-जीवन के ई नजारा गाना-गवनई में त मिलबे करे ला-
करे तू अईह पुरनवासी असनान हो
गेटवा पर भिरगू जी के करे के मिलान हो.

मेलवा के टाईम पर हंसी-मजाक के रिश्ता भी एखाला फेरू से याद आवे ला. मेला में मिले के कहानी तरह-तरह से सुनावल जात बा-
चल सढुंआइन घुमा दी मेला ददरी,
खाए के जिलेबी चाट, खाके मन के ताजा.
चरखी पर चढि के लिहल जाइ माजा.

जवन होखे, ददरी मेला ह, जवना में रेला बा-ठेला बा, मेला संभारे के पुलिस प्रशासन के झमेला भी बा. बाकिर कईसे भुला जाइल जाऊ के एहमें छोट बड़, सभका खातिर खेला भी बा. सबसे बड़ बात ई कि पुरान समय से पुरनवासी के असनान खातिर गंगा नहाये आवे वाला औरति-मरदे लोग मेला के जरि ह. साफ बूझा ता कि ई असननवे मेला के कारन ह. नहाये आवे वाला लोगनि के भीड़ देखि के बेवसायी लोग के दिमाग खुलल होई कि व्यापार कई लिहल जाऊ. अब बलिया नगर पालिका अउर मेला से जुड़ल गांव पंचायतन तक के मेला से चुंगी- टैक्स मिले ला. धरम अऊर ओकरा खातिर भीड़ में व्यवसाय के गजब संजोग होखबे करेला. एह ददरी मेला पर इयाद रखे लायक बा कि ददरी मेला भिरूग बाबा के चेला दरदर मुनी के नाम पर लागे ला. भिरूग मंदिर में दरदर मुनि के मूर्ति भी देखल जा सकेला. जहां अतना कुल्हि बा, ओकरा के देखे खातिर औरति लोग अपना मरद के इयादि दियइबे करी-
असो के ददरी में बलिया अइब कि ना अइब
ऐ पियऊ मेला घूमइब कि ना अइब
दरदर मुनी भिरगू जी के अस्थल हवे पावन
ए पिया बात हमार मनब कि ना मनब
पिछिला साल के वादा तू पुरउब कि ना अइब.

त पिछिला साल के वादा पूरा करे खातिर एहू साले बहुते लोग ददरी जात बा. धियान रखीं सभै कि एह साल कोरोनवा बा, तनी बचिए के.
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