भोजपुरी में पढ़ें - सोझ अंगुरी से घीव ना निकले

समाज में बहुत से लोग सीधा समझल नइखे चाहत.
समाज में बहुत से लोग सीधा समझल नइखे चाहत.

जवना तरह से समाज में हर तरफ उलटा-पुलटा चलता, लोग सोझ राहि प चले के जगहा उलटा चलिके अपना के सफल मानता. आ आपन तर्क भी देता. ये राहि के ठीक से देखला के जरुरत बा. कबीरदास जी के उलटी बानी अलग रहल हा, लेकिन का सब उलिटा कइले से सफलता मिली?

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 5, 2020, 5:31 PM IST
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हो का बाहियात जबाना रहल होई, जब सोझबक आ सांच बोलनिहार लोग जिनिगी के सोझ-सपाट राह पर आंखि मूंदिके खरामा-खरामा चलत रहलन. बनल-बनावल लीखि पर चलेवाला लकीर के फकीर लोग! जरूर ऊ कमबखत कायर आ कपूत रहल होइहन. ओह कायर-कपूत से अलगा हटिके आजु के शायर, सिंह, सपूत के का कहे के! अगर रउरा ऊ यादगार दोहा इयाद ना होखे, त फेरु से मन परावत बानीं-
'लीक -लीक कायर चले, लीकहिं चले कपूत।
लीक छाड़ि तीनों चले,शायर, सिंह, सपूत ।।'

पुरान घिसल-पिटल लीखि के छोड़िके, कहे के मतलब कि छान-पगहा तुराके, आपन अलगे राग अलापेवाला भा आपन अलगा-अलगा असली लीखि बनावेवाला मरखहवा बैले नू आजु-काल्ह के शायर, सिंह, सपूत बाड़न! रउओं कहि सकेनीं कि आजु ना त ऊ शायरिए रहि गइल बा, ना शानो-शौकत आ ना पितृभक्तिए .फेरु ई विशेषण? माफ करबि, भाई जी! आजु-काल्ह के ई शख्स त लीखिए छोड़िके ना, बलुक बान्हो तूरिके सभका के बहा ले जाए आ डुबावे प आमादा बाड़न. इहां त निराला आ गालिबन के भरमार बा.
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समरथ के ना दोस गोसाईं!



भलहीं इन्हिकर कहल या त ई खुद समुझसु भा खुदा समुझसु, बाकिर लीखि छोड़ेके का निराला अंदाज बा एह लोग के!पहिले लिखात रहे ग़ज़ल, आजु ई रचत बाड़न आजाद ग़ज़ल. दोहा का जगहा दुमदार दोहा एहीसे नू गढ़ात बा कि बेगर दुम के भला कहवां हम आ कहवां तूं!अब गीत का जगहा अगीत आ तुकान्त के जगहा अतुकान्त लिखे के फैशन बाय. बेतुकी के एह दौर में सोझ-सांच तुक रचेके भला तुके का बा! सांच कऽ,जग मारल जाय, झूठ कहऽ त जग पतिआय! सांच बोलिके सुकरात, ईसा मसीह आ गान्ही बाबा जइसन बलि के बकरा बनल केकरा मंजूर होई! गली-महल्ला के दादा टाइप छोकड़ा आजु के सिंह आ सपूत बा. केकर बा मजाल, जे ओकरा ओरि आंखियो उठाके देखि सके भा ओकरा खिलाफ माछियो के मूड़ी-भर चूं-चपड़ करि सके? केकरा आपन कद छव इंच छोट करावे के बा! समरथ के ना दोस गोसाईं!

उलटा नाम जपत जग जाना

सोझ राह के सुच्चा मोसाफिर भलहीं 'सियाराममय ' मानिके सउँसे संसार के प्रणाम करत होखसु, बाकिर केहू ओह सोझबक के घास ना डाले. ओइसन बुर्जुआ आ 'आउटडेटेड 'के आपन संगियो-साथी बनाके केकरा आपन माटी पलीद करवावे के बा!सीधापने से नू उन्हुका गुर के गोबर बनत देरी ना लागे आ उन्हुकरे चेला चीनी बनिके चानी काटत नजर आवेलन स. तजुर्बाकार लोग के कहनाम बा जबाना आजु उलटा राह के राहगीरन का साथे बा. एह से सोझ-सांच राह पर चलेवाला डेगे-डेग ठोकर खइहन, सजाइ भुगतिहन आ अपना बदकिस्मती प लोर टपकइहन, जबकि उलटा राह चलनिहार के बस मजे-मजा बा. कहल जाला कि राम के उलटा नांव 'मरा-मरा' जपिके डाकू वाल्मीकि ब्रह्मज्ञानी आ महाकाव्य 'रामायण' के रचनिहार बनि गइलन - 'उलटा नाम जपत जग जाना, वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना.'

बरिसे कम्मर, भींजे पानी…

बुद्धू-बक्सा के 'उलटा-पुलटा ' फ्लॉप शो कबो देखनिहारन के मन-माथा में चकरघिन्नी-अस नाचत रहे आ सोझ बात के उलटि-पलटिके भट्ठी मोशाय बहुतन के भट्ठा बइठा देले रहलन. सोझ अंगुरी से घीव ना निकले आ घीव निकाले खातिर अंगुरी के टेढ़ करेके परेला.उलटा चाल चले वालन के दसों अंगुरी घीव में रहेला आ कपार कराही में. अपना शुरुआती दिनन में एगो सज्जन भोरहरिए में आपन सउंसे कपड़ा-लत्ता उतारिके नंग-धड़ंग शहर से बहरी निकलि जासु आ मुंह आगा कके पाछा का ओरि चलेके रियाज करसु. भोर में साइकिल पर सवार दूध बेचेवाला ओह लांगट के दनादन पाछा मुंहें बढ़त देखिके भूत बूझि लेत रहलन स बाकिर आगा चलिके ओही भूत के भगवान मानल जाए लागल. कबीर के उलटबांसियन के भला का कहे के- ‘बरिसे कम्मर, भींजे पानी-!’

राजनीति में त जमीन से जुड़ल करता-धरता जिनिगी भर दरिए बिछावत रहि जालन, जबकि उलटा हरकत करेवाला रातोरात उन्हुकर मसीहा बनि बइठेलन. नीमन-नीमन समर्पित लोग बस टापते, भकुआइले रहि जाला आ जोकरई-लंपटई के बदउलत केहू शिखर-पुरुष बनि जाला.

धाराप्रवाह बोलेवाला बढ़िया वक्ता-विद्वान का ओरि केहू धियानो ना देला. अब त सुनल-गुनल जाला ओकरा के, जे लोकभाषा, स्त्रीलिंग-पुल्लिंग के उलटि-पलटिके लबारी शैली में कतहीं के ईंटा, कतहीं के रोड़ा जोड़िके भोनुमती के कुनबा खाड़ करे आ ऊलजलूल ढंग से शब्दन के रसदार चटक-मटक खिचड़ी परोसि सके, हिन्दी-भोजपुरी के टांग तूरिके, अंगरेजी से छौंकि-बघारिके, लोकभाषा के कहाउत-मुहावरा से बनल चटपटी शब्दावली वाली एह नवकी काकटेल भाषा के का कहे के!शिक्षा-अशिक्षा के अइसन घालमेल दोसरा जगहा बिलकुले दुलम बा.

कबो बांया ओरि से मत चलिहऽ!

हमरा टोला में एगो चचाजान बाड़न - अलाउद्दीन साहेब. सरकारी नोकरी से मुकुती पाके नवकी पीढ़ी के आपन पोढ़ अनुभव आ बुजुर्गियत का नाते बेमंगले नसीहत देत चलेलन. भोरे-भोर अखबार पढ़ला का बाद एक दिन हमरा के बोलाके कहलन, 'बेटा! आजुकाल्ह सड़कपर रोजे एक्सीडेंट हो रहल बा .एह से रोड पर कबो बांया ओरि से मत चलिहऽ!'

हम चकित रहि गइलीं. चचाजान हमार जान लेबे प तुलल बाड़न आकि हमरा के सलाह देत बाड़न?कतहीं सठिया त नइखन गइल! तलहीं ऊ समुझावे का गरज से फेरु कहलन, 'बेटा! तूं त सोचत होइबऽ कि चचवा पगला गइल बा का? बाकिर अइसन बात नइखे .सड़क पर बांया तरफ से चलेवाला के का पता कि पाछा से आवेवाली कवनो गाड़ी कब ओकरा के कचारत चलि जाई?दहिना ओरि से चलबऽ, त आवेवाला वाहनन के देखिके खुदे होशियार हो जइबऽ आ कबो तहरा संगें कवनो अइसन हादसा ना होई .आपन हाथ जगरनाथ!' चचाजान के काबिलियत पर हम दंग रहि गइलीं.

तूं डाल-डाल, हम पात-पात!

त का ई जुग उलटा खोपड़ी वालन के बा?बाल के खाल निकाले में आ गड़ल मुरदा उखाड़े में त हमनीं के महारत हासिल बड़ले बा. सरकार गलत काम रोकेके लाख बेवस्था करे, हमनीं के कवनो-ना-कवनो सुराज ढूंढ़िए निकालेलीं जा. रेल महकमा जब 'चेन पुलिंग 'के तकनीक बन्न कऽ दिहलस, त भाई लोग होज पाइप निकाले आ काटे लागल, फेरु वैक्यूम खोले लागल. तूं डाल-डाल, हम पात-पात!

त केकर जै-जैकार ?

मजेदार बात इहो बा कि जबले रउआ उलटा हरकत नइखीं करत, तबले घोड़ा बेंचिके सूतेवाला हरकत में आवते नइखे. चाहे राशन-किरासन के लाइन होखे भा सरकारी-गैर सरकारी कवनो दोसर-तीसर काम- जबले रउआ चुपचाप कोल्हू के बैल आम अदिमी नियर क्यू में लागल रहबि, काउंटर पर गप्प मारत भा नदारद अगिला के कान में ढीलो ना रेंगी, बाकिर जइसहीं रउआं लाइन से बेलाइन होके तेवर बदलत.
अगिया बैताल रूप धरबि, देखते-देखत हीरो बनि जाइबि आ अगिला एह तरी हरकत में आई, जइसे ओकरा कान में केहू पिघिलल सीसा उड़ेलि देले होखे. जबले सरकार के समर्थकदल सहजोग करेला चुपचाप, तबले ओकरा मुसीबत के सुधि लेबे के भला केकरा फुरसत बा, बाकिर जइसहीं ऊ समर्थन-वापसी के अल्टीमेटम देला, सरकार के कान खाड़ हो जाला आ उलटी गिनती शुरू हो जाले.
चाहे घूस लेबे वाला अफसर होखे भा दहेज़ लेबेवाला लइका के बाप--जबले रउआं नाक रगड़बि, गिड़गिड़ाइबि, कवनो असर ना परी, बाकिर जइसहीं सीबीआई के मार्फत उलटा चाल चलल जाई, अगिलाके बोलती बन्न होखे आ घिग्घी बन्हाए में ढेर देरी ना लागी. सोझ डहर पर चलनिहार सोझबक कवनो अपराध के मुजरिम मानि लिहल जाउ, त एमें अचम्भे का बा!उलटा चाल चलेवाला हाथी का, शहर-सूबा-देश लीलिके ढेकारो ना ली आ ओकरे जै-जैकार होत रही .अब रउओं त किछु बोलीं - का खुदे उलटा-पुलटा खेलबि, ओह घाघ खेलाड़िन के खेले देबि आकि खेल बिगाड़े के दिसाईं जरूरी पहल करबि?
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