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Kartik Purnima 2020 : भोजपुरी विशेष – कातिक पूर्णिमा के महातम अउर काशी में नहान

Kartik Purnima 2020 : भोजपुरी विशेष – कातिक पूर्णिमा के महातम अउर काशी में नहान

काशी में कातिक पूर्णिमा नहाए के बहुत महत्व ह.

काशी में कातिक पूर्णिमा नहाए के बहुत महत्व ह.

कातिक के समान न कौनो महीना हौ, सतयुग के समान न कौनो युग हौ, वेद के समान न कौनो शास्त्र हौ अउर गंगा के समान न कौनो तीर्थ हौ.

हिंदू पंचांग में 12 महीना में से चार महीना के पवित्र मानल गयल हौ. एही चार महीना के चातुर्मास कहल जाला. चातुर्मास अषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से शुरू होला अउर कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी तक रहयला. इ चार महीना के दौरान भगवान क भक्ति अउर व्रत करय क महातम हौ. लेकिन चातुर्मास में कातिक के सबसे पवित्र महीना मानल गयल हौ. स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण में कातिक नहान क फल एक सहस्त्र बार गंगा नहइले के बराबर बतावल गयल हौ.

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कातिक महीना के विष्णु भगवान क महीना मानल गयल हौ. कहल गयल हौ कि जवन फल प्रयाग में कुंभ नहइले से मिलयला, उहै फल काशी में कातिक महीना में गंगा नहइले से मिलि जाला. मान्यता हौ कि कातिक में देवी-देवता हर दिन देवलोक से उतरि के पंचगंगा घाट पर आवयलन. एही बदे पंचागंगा घाट से अस्सी घाट तक पूरे कातिक भर नहान, दीपदान अउर भगवान विष्णु क प्रतिमा बनाइके ओनकर पूजा-पाठ करय क विधान हौ.

कातिक क महीना एह साल एक नवंबर से कृष्ण पक्ष के प्रतिपदा से शुरू भयल हौ अउर 30 नवंबर के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा यानी कार्तिक पूर्णिमा के दिन खतम होइ जाई. कातिक में विष्णु भगवान क पूजा के साथ ही लक्ष्मी मईया क पूजा भी कयल जाला. स्कंद पुराण में कातिक के लक्ष्मी पूजा बदे सबसे बढ़िया मानल गयल हौ. मान्यता हौ कि कातिक में गंगा स्नान, दान, दीपदान कइले से पाप कटि जाला, रोग-बियाद खतम होइ जाला अउर मोक्ष दरवाजा खुलि जाला. पुराण में कहल गयल हौ कि अगर कातिक के पुन्नमासी यानी पूर्णिमा से व्रत शुरू करय, अउर ओकरे बाद हर महीना में पूर्णिमा क व्रत रखय, रतजग्गा करय त आदमी कुल मनोरथ पूरा होइ जाला. स्कंद पुराण में कातिक क बखान कुछ अइसे कयल गयल हौ.
न कार्तिक समो मासो, न कृतेन समं युगम्.
न वेद सदृशं शास्त्रं, न तीर्थ गंगा समम्.

यानी कातिक के समान न कौनो महीना हौ, सतयुग के समान न कौनो युग हौ, वेद के समान न कौनो शास्त्र हौ अउर गंगा के समान न कौनो तीर्थ हौ. लेकिन काशी में गंगा क महत्व अउर बढ़ि जाला, काहे से कि काशी देवन क देव महादेव क बसावल शहर हौ. मदन पारिजात में लिखल हौ कि पुन्य पावै बदे कातिक में सूर्योदय से पहिलय गंगा नहाइ के भगवान विष्णु अउर लक्ष्मी क पूजा करय के चाही. कातिक में खटिया-पलंग पर सूतय क मनाही हौ. जमीन पर सूतय के चाही. भोजन में गेहूं, मंूग, दूध, दही, घी जइसन शाकाहारी पदार्थन क सेवन करय क मान्यता हौ. मांस-मछरी अउर लेहसुन-पियाज न खाए के चाही. कहय क मतलब अइसन कौनो काम कातिक में न करय, जवन भगवान विष्णु के अच्छा न लगत होय.

पंचगंगा घाट के महातम

मान्यता हौ कि कातिक महीना में भगवान विष्णु गंगा में निवास करयलन. एही कारण से कातिक में गंगा स्नान क महत्व हौ. काशी में पंचगंगा घाट पर पांच नदिन क संगम हौ- गंगा, यमुना, सरस्वती, धूतपापा, किरणा. एही पंचगंगा घाट पर कातिक महीना में भगवान विष्णु क वास रहयला. इहै कारण हौ कि कातिक में पंचगंगा घाट पर नहाए बदे भक्तन क भीड़ उमड़ि पड़यला. कातिक नहाए बदे काशी के अलावा प्रयागराज, कुरुक्षेत्र अउर अयोध्या के भी पवित्र मानल गयल हौ. लेकिन जवन फल काशी में नहइले से मिलयला, उ दूसरे जगह नाही मिलत. बहुत लोग अइसन भी हयन कि चाहि के भी कातिक नहाए बदे काशी या गंगा नाही पहुंचि पउतन. अइसन परिस्थिति में आदमी जहां भी रहय ओही ठिअन सूर्योदय से पहिले नहाइ लेय अउर भगवान विष्णु क पूजा कइ लेय त ओहू के कातिक नहान क फल मिलि जाला. हां, नहात क समय इ मंत्र जरूर बोलय के चाही.
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति.
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेअस्मिन् संनिधिं कुरु.

स्कंद पुराण में कहल गयल हौ कि जवने दिना विष्णु भगवान चार महीना के निद्रा से जागयलन यानी देव उठनी एकादशी या कातिक शुक्ल एकादशी के दिन पंचनद तीर्थ पर यानी पंचगंगा घाट पर कुल तीर्थन के साथ तीर्थराज प्रयाग अउर कुल देवतन के साथ महादेव भी उतरि आवयलन अउर पुन्य क अनुभव करयलन. कातिक में देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी क बियाह भी होला. तुलसी के बियाह के साथ शादी-बियाह क काम शुरू होइ जाला. काशी में तुलसी बियाह के दिन पंचगंगा घाट से लेइके अस्सी घाट तक औरत लोग तुलसी क पूजा करयलिन. भगवान विष्णु के तुलसी दल चढ़ावल जाला अउर शालिग्राम के साथ तुलसी क बियाह कराइ जाला. मान्यता हौ कि कातिक में तुलसी क पूजा अउर बियाह कइले से बहुत पुन्य मिलयला, भगवान क विशेष कृपा प्राप्त होला, कुल दुख दूर होइ जाला, अउर घरे में सुख, समृद्धि आवयला.

तुलसी बियाह के पीछे एक पौराणिक कथा हौ. जलंधर नाम क एक ठे राक्षस रहल. ओकरे मेहरारू क नाम वृंदा रहल. वृंदा पतिव्रता रहल. ओकरे पतिव्रता धर्म के नाते ही जलंधर बहुत बीर अउर पराक्रमी रहल. जलंधर के केव हराइ न पावै. उ चारो तरफ उत्पात मचउले रहल. देवता लोग ओहसे बहुत परेशान रहलन. एक दिन सब देवता भगवान विष्णु के पास जाइके जलंधर से बचावय क गुहार लगइलन. भगवान विष्णु देवतन क गुहार सुनि के वृंदा क पतिव्रता धर्म भंग करय क निश्चय कइलन. जलंधर क भेस धइके उ वृंदा के पास गइलन अउर ओकरे शरीर के स्पर्श कइलन. जलंधर ओह समय देवतन से युद्ध करत रहल. जइसय विष्णु वृंदा के छुअलन, ओकर सतीत्व भंग होइ गयल अउर जलंधर युद्ध में मारल गयल. ओकर सिर कटि के आइ के वृंदा के सामने गिरल. जलंधर क सिर देखि के वृंदा आग बबूला होइ उठल कि अगर ओकर पति युद्ध में मारल गयल त जेके उ स्पर्श कइलेस उ के हौ. विष्णु अपने असली रूप में प्रकट होइ गइलन. वृंदा ओही समय विष्णु के शाप देहलस, ’’हे विष्णु तू हमार सतीत्व भंग कइल. जा तू पत्थर होइ जा.’’ उहै पत्थर शालिग्राम कहल जाला. वृंदा के शाप के बाद विष्णु कहलन कि ’’हे वृंदा हम तोहरे सतीत्व क आदर करत हई, लेकिन तू तुलसी बनि के हमेशा हमरे संगे रहबू. जे भी कातिक एकादशी के दिन तोहरे संगे हमार बियाह करी, ओकर कुल मनोरथ पूरा होई.’’ तबय से बिना तुलसी दल के शालिग्राम क पूजा नाही होत.

व्रत त्योहार क महीना

कातिक महीना में सबसे ज्यादा व्रत-त्योहार पड़यलन. करवा चैथ, अहोई अष्टमी, रमा एकादशी, गौवत्स द्वादशी, धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, सौभाग्य पंचमी, छठ, गोपाष्टमी, अक्ष्य नवमी या आंवला नवमी, देव एकादशी, बैकुंठ चतुर्दशी, कार्तिक पूर्णिमा या देव दिवाली. इ कुल त्योहारन क आपन अलग-अलग महत्व हौ अउर काशी में हर त्योहार के अलग-अलग तरीका से धूमधाम अउर श्रद्धा भाव से मनावल जाला. कातिक महीना में देव उठनी या प्रबोधिनी एकादशी क बहुत महत्व हौ. मान्यता हौ कि एही दिन भगवान विष्णु चार महीना के नीद से जागले के बाद पूरी सृष्टि के संचालन क जिम्मेदारी फिर से अपने हाथे में लेइ लेलन. भगवान विष्णु के जगले के बाद समाज में मांगलिक कार्य शुरू होइ जाला.

कोरोना महामारी के नाते एह साल काशी में रामलीला नाही भयल. अइसन लगत रहल कि कातिक क त्योहार भी न मनावल जइहै, लेकिन प्रशासन अनुमति देइ देहलसे अउर त्योहार मनावल जात हयन. हालांकि हर साल की नाही भक्तन क भीड़ नाही हौ, काहे से कि बहरे क लोग काशी कम आइ पावत हयन.

Tags: Article in Bhojpuri, Kartik Purnima, Kashi

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