भोजपुरी स्‍पेशल: परब-त्यौहार में अउरो ईयाद आवेला गाँव

कोरोना महामारी के वजह से भलहीं एह साल पिछला साल जइसन भीड़-भाड़ नइखे.
कोरोना महामारी के वजह से भलहीं एह साल पिछला साल जइसन भीड़-भाड़ नइखे.

Bhojpuri Special: गावत मलहोरिन झूमत रहली. धूप-दीप आ नीम के पुलुछा आ सेनुर से टिकल माई के थान एगो अजबे माहौल के सिरजन कइले रहे. गोइठा के सुलगत आगि पर माटी के मटका में चढ़ल कराह के उफान अपना शिखर पर रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 5, 2020, 10:26 AM IST
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पटना. हमरा बचपन के ईयाद के दरपन हमार गांवे नू ह. गाँव में हम कम रहल बानी बाकिर गाँव हमरा भीतर हरदम रहल चाहे दिल्ली-बम्बे रहनी चाहे अफ्रीका-लंदन. गाँव से जेतने दूर भइनी, गाँव ओतने नजदीक आवत गइल. परब-त्यौहार में त अउरो रोअवलस. कबो पढाई के चलते आ कबो रोजी-रोजगार के चलते शहर में खूंटा से बन्हाइल मन छटपटात रहल. गाँव खींचत रहल. फगुआ, छठ, दियरी-बाती आ दशहरा के सब नाटक-नौटंकी, खेल-खुरापात मन के गुदगुदावत रहल. भूलल-बिसरल तमाम नेह-नाता आ कहानियन के ईयाद दियावत रहल. अब त दिवाली आ छठ आवे आला बा. दशहरा आ दुर्गा पूजा अभिये बीतल ह. गाँव के ईयाद आवता.

ईयाद आवता कि गांव के दखिन काली माई के मंदिर पs भीड़ जुटल रहे, काली माई के सोझा एगो दउरी में फल, बताशा आ पुआ परोसल रहे, लगहीं लोटा में लौंग-मीठा वाला छांक रखल रहे आ- ‘ निमिया के डार मईया झुलेली झुलनवा कि झूली झूली ना ’... गावत मलहोरिन झूमत रहली. धूप-दीप आ नीम के पुलुछा आ सेनुर से टिकल माई के थान एगो अजबे माहौल के सिरजन कइले रहे. गोइठा के सुलगत आगि पर माटी के मटका में चढ़ल कराह के उफान अपना शिखर पर रहे. अइसन लागत रहे कि माई कहीं ना कहीं हमनी के भीतर उतर गइल बाड़ी.

ई रात के देखल कवनो सपना ना हवे
दरअसल, ई रात के देखल कवनो सपना ना हवे. ई हकीकत हवे- आज से तीन दशक पहिले के नवरात्रि के दौर के. जब लइकन के टोली के धमाचौकड़ी के साथे भोर होई आ फूल-बेलपत्र जादे से जादे इक्कट्ठा करे को होड़ लागल रही. सूर्योदय होत-होत लइकन के साइकिल में बान्हाइल लोटा के साथे टोली लउकी, जवन गांव से तकरीबन दू कोस दूर बाबा महेंद्रानाथ के जल चढ़ावे खातिर रवाना होई. बूढ़-पुरनिया, कनिया-बहुरिया गांव के शिवालय में जल चढ़इहें. गंवई रामलीला में तरह-तरह के किरदार निभावे वाला, अपना रिहर्सल में लाग जइहें, तs रामलीला के चौचक बनावे वाला गंवई संगीतकार लोग, रामचरित मानस के चौपाई गावे आ झाल, ढोलक के गांठ चढ़ावे में व्यस्त हो जइहें. बाकी लोग रामलीला के स्टेज सज्जा में जुटल रहिहें.
अइसे लागी कि सउँसे गांव कवनो जग-परोजन में अझुराइल बा. ठीक एकरा समानांतर गांव के जवानन के एगो टोली पूजा खातिर साड़ी-धोती आ तिरपाल से पंडाल बनावे में जुटी तs कुछ लोग मूर्ति ले आवे खातिर बैलगाड़ी-टायर ले के रवाना होइहें. शायदे अइसन केहू लउकी जे तनि फुर्सत में होखे. बाकी बचल कई घर-परिवार में मातारानी के कलश बइठावे के प्रक्रिया चलत लउकी. बगैर कवनो लाउडस्पीकर के ‘या देवी सर्वभूतेषू....’ के मंत्रोच्चार से गांव गूंज उठी. सांझ होखते महावीर जी के पंडाल के सोझा बांस के फाट्ठा-लाठी भांजत, गदका खेलत, उत्साहित बालवीर आपन करतब देखावत लउकीहें. रोट-पंजीरी के प्रसाद लेत–लेत कान में ‘सब नर करहिं परस्पर प्रीती. चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीती... ’ सुनाई. एकर मतलब की अब रामलीला के आगाज होखे वाला बा. रामलीला में लोक के राम के मनभावन कथा के मंचन त होखबे करी, बीच-बीच में लबरइयो चलत रही.



राम जिनगी के दर्शन हउवन आ एही जीवन दर्शन से भोजपुरिया समाज अघाइल-पुराइल बा.
आजु के समय में अइसन कवनो विधा नइखे, कवनो शिल्प नइखे, जवना में राम आ माई के बखान ना होखे. जइसहीं देवी माई के नाव दिमाग में आवेला, ओइसहीं शक्ति के अलग-अलग रूप लउके लागेला. एही भक्तिभाव आ श्रद्धा के अतिरेक के रूप में बीतल समय में हमनी के कथित ‘कोरोना माई’ के पूजो गांव-गिराव, बाग-बगइचा में देखनी जा. एकरा के कबो जायज नइखे ठहरावल जा सकत. बाकिर एकरा पाछे देवी माई के प्रति अगाध श्रद्धा से भी इनकार नइखे कइल जा सकत. भोजपुरिया संसार में देवी माई एह ढंग से गुहाइल, पुराइल, समाइल बाड़ी कि जब कवनो आफत-बीपत आवेला तS माइये सहाय लउकेली. दोसरा ओरी राम के जिनगी के दर्शावे खातिर सबसे लोकप्रिय मनोरंजक नाटक रामलीला हवे. रामलीला के केंद्र में केहू बा त ऊ खाली रामे बाड़ें. हर रूप में, पूरा संयम के साथे, पूरा मर्यादा के साथे. उ तनिको अपना मर्यादा से डगमगात नइखन. राम जिनगी के दर्शन हउवन आ एही जीवन दर्शन से भोजपुरिया समाज अघाइल-पुराइल बा.

पारंपरिक भोजपुरिया व्यंजन के स्टॉल कहीं हेरा गइल बा
बाकिर बीतल तीन दशक में एह क्षेत्र में ढेर कुल्ह बदलाव आइल बा. एकर एगो खास कारनो बा. रोजी-रोजगार के चक्कर में लोग कलकत्ता, दिल्ली, सूरत, पंजाब, मुंबई सहित कई गो शहर के ओर पलायन कइल आ फेर ओहिजा से लवटल त अपना साथे, ओहिजा के ईयाद, कला, संस्कृति, रिति-रिवाज ले के लवटल. एकर परिणाम ई भइल कि भोजपुरिया संस्कृति में मां दुर्गा के लकदक मंडप, रावण के पुतला दहन, गरबा शामिल हो गइल. एकरा से भोजपुरिया संस्कृति के दायरा बढ़ल आ ई अउर संपन्न भइल बाकिर एकरा साथही ऊ पहिलका गंवई रौनक हेरा गइल. आज भलहीं चट्टी-बाजार बिजली के बल्ब-झालर से सजल बा. लाखो-लाख रुपया के बजट वाला मां दुर्गा के पंडाल बनत बा. बंगाल से ढाक बजावे वाला ढाकी बोलावल जात बा. मेला में मेहरारूअन के श्रृंगार-प्रसाधन से लेके लइकन के खेल-खिलौना आ तरह-तरह के दर-दुकान सजल बा. भांति-भाति के व्यंजन के स्टॉल सजल बा. एह स्टॉलन में पूरा देश-दुनिया के व्यंजन त बा बाकिर पारंपरिक भोजपुरिया व्यंजन के स्टॉल कहीं हेरा गइल बा. लिट्टी-चोखा के स्टॉल त लउकी बाकिर आपन मूल सौंध गंध के बिना पश्चिमी कलेवर में लिपटल लउकी.

कुछ प्रभावशाली आ धनाढ्य लोग गरबा के आयोजन क रहल बाड़े... जवना में कुलीन वर्ग के जमावड़ा लउकी आ ई मातारानी के श्रद्धा में गरबा से कहीं अधिका आपन प्रभुत्व आ संपन्नता के सामाजिक प्रदर्शन के एगो बहाना बन गइल बा. दशहरा के दिने रावण के पुतला दहन के परंपरा अइसन नइखे कि एहिजा बीतल तीन दशक में आयात भइल बा, लेकिन अब ई पहिले के बनिस्पत आज कही जादे नाटकीय बन गइल बा.


कोरोना महामारी के वजह से भलहीं एह साल पिछला साल जइसन भीड़-भाड़ नइखे. बाकिर एही संघे भोजपुरिया पट्टी के एगो बड़हन हिस्सा बिहार में आवेला आ ओहिजा विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एह पारी ई नवरात्रि-दशहरा चुनाव प्रचार स्थल में तब्दील हो गइल बा. असत्य पर सत्य के जीत के प्रतीक के सभ राजनीतिक दल अपना–अपना ढंग से व्याख्यायित करत रावण के पुतला दहन के तइयारी में बाड़े. लोक एह लोकतंत्र के महालोक पर्व में एह हुड़दंग से अपना के अलगे महसूस करता. अबहियों लोग माता रानी आ भगवान श्रीराम से गोहरावत बा कि अबकी जवन सरकार बने ओकरा के देवी मइया आ राम जी सदबुद्धि दीं कि लोग के दू जून के रोटी खातिर बहरा ना जाये के पड़ो. एह बहरा गइला के कीमत एह पारी लोग कोरोना में ढेर चुकवले बा. नवरात्रि-दशहरा के चमक फीका त बड़ले बा, बाकिर तीन दशक पहिले वाला गंवई उल्लासो हेरा गइल बा. सांस्कृतिक वैविद्यता आ संपन्नता भोजपुरिया जनमानस के उत्कंठ त करते बा बाकिर एह पर्व के बहाने जवन गंवई सौहार्द आ प्रेम लोग के जिया के जुड़ावत रहे, ऊ अब जुड़ाव लउकत नइखे. हे राम जी! हे देवी मइया! एह दुःख–बलाय वाला माहामारी से जग के मुक्ति दिवावे के साथे पहिले वाला प्रेम के रस गांव में बहायीं. हे मईया दियरी के दिन गंउवे में ना लोग के मनवो में अंजोर करीं. ए बाहरी अँजोर से आम आदमी दहशत में बा -
शहर कहीं ना बने गाँव अपनो ए भावुक / अँजोर देख के मड़ई बहुत डेराइल बा
हे छठी मईया अइसन असीरबाद दीं कि हमार ई शेर झूठ हो जाव –
लोर पोंछत बा केहू कहाँ / गाँव अपनो शहर हो गइल
(लेखक मनोज भावुक भोजपुरी कला, साहित्य और सिनेमा के जानकार और जाने-माने कवि हैं)
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