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भोजपुरी विशेष - कोरोना काल : सकून के चिरई जिन्दगी के अँगना में कइसे चहकी

कोरोना के सबसे ज्यादा असर मन प ही पड़ल बा आ एकरा के सबसे ज्यादा ठीक करे के जरुरत बा.

कोरोना के सबसे ज्यादा असर मन प ही पड़ल बा आ एकरा के सबसे ज्यादा ठीक करे के जरुरत बा.

कोरोना के ये दौर में मन के व्याकुलता बढ़त जाता. भले कोरोना के वैक्सीन के खबर खूब आवत बा, लेकिन अभी भी परेशान मन के आसरा नइखे मिलत. संतोष नइखे होत. त कइसे मिली संतोष आ का कइके आदमी फेर से आपन मन के इलाज कई सकेला.

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भोरे-भोरे गौरैया आँगन में चहकल / चाह के दोकानी के आँच बाटे लहकल .... आ ओही चाह के दोकानी प, चट्टी प कुल्हड़ में चाय सुड़ुक-सुड़ुक के पीयत दुनिया भर के बतकही, दुनिया भर के पंचायत, देश-विदेश के समस्या, निजी घात-भीतरघात सब शेयर होखे अपना यार के सङे, दिलदार के सङे, राजदार के सङे, साथी-संघाती के सङे. उ आउटलेटे अब गायब भइल जाता.
त मन के भीतर खउलsता तरह-तरह के बात. तरह-तरह के खीस-पीत. अवसाद-विषाद, कुंठा-क्रोध के अम्ल मन के बर्तन के पेंनिये गाएब कs देता. मन रीते लागsता. तबो मन के बुझात नइखे कि कवनो मनोचिकित्सक से मिल लिहल जाव. लागsता कि ई जवन होता, बहुत सामान्य बात बा. असहीं होला. बाकिर ई सामान्य घटना नइखे. जहर पीयत-पीयत मन आत्मघाती हो जाला. मन नॉर्मल ना रहे. नार्मल अवस्था में केहू पंखा से लटक के जान कइसे दे सकेला? केहू ख़ुदकुशी कइसे क सकेला?

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मन के परेशानी के समय
कोरोना त आदमी के जान लेते बा. ई अवसाद, विषाद, फ्रस्ट्रेशन, अकेलापन भी मौत के मुँह में ढकेल रहल बा. हमरा दिलोदिमाग में बेर-बेर उ गीत गूँज रहल बा कि ''जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए''... बाहर से जे सुखी लउकsता, जेकरा पास धन-दौलत, शोहरत आ मान-सम्मान सब बा, उहो पंखा से लटक जाता. गरीबी से जे मू रहल बा, उ त मुअते बा. एकर मतलब कि आत्महत्या के सम्बन्ध अमीरी, गरीबी से नइखे, धन-दौलत आ शोहरत-सम्मान से नइखे. उ कवनो भितरिया चीज ह. शायद ओकर नाँव विलपॉवर ह. जिजीविषा ह. मन के ढिठई ह. मन के थेथर होखे के चाहीं. मन के चमड़ा मोट होखे के चाहीं जहँवाँ से अपमान, उपेक्षा आ दुःख के तीर परावर्तित हो जाव. कमजोर मन आत्मघाती हो जाला आ फेर उ अपने के खोर-खोर खाए लागेला. मन बहरियो बहुत उत्पात मत मचावे, एकरे खातिर संत लोग योग, ध्यान, चिंतन आ सत्संग के राह बतवले बा ना त आदमी के मन आसाराम बापू हो जाला, रामरहीम हो जाला.

मन ह का? देह में ई कहँवाँ रहेला? ई कहल कठिन बा. दिल आ दिमाग के अस्तित्व त जीव विज्ञान में बा बाकिर मन ? बाकिर एतना त तय बा कि मन देह से अलगा के कवनो चीज नइखे तबे नू मन के पीड़ा देह के अस्तित्व के खतम क देता. एह से मन के मजबूत कइल जरुरी बा. तन के इम्म्यून सिस्टम के सङे-सङे मनो के इम्म्यून सिस्टम के स्ट्रांग कइल जरुरी बा. व्यायाम के साथ ध्यान आ योग भी जरुरी बा. स्ट्रेस के हैंडिल करे के कला सीखल जरुरी बा. मन आ तन दुनो स्तर पर अपना के फौलाद बनावे के पड़ी तबे सकून के चिरई एह जिन्दगी के अँगना में चहकी.

दुश्मन त मानी ना, साजिश करी. मन के तूरे के भरसक कोशिश करी. बाकिर हमनी के दादा-परदादा भा रामायण-महाभारत के पात्र अपना हक खातिर लड़े के सिखा गइल बाड़े ना कि सुसाइड करे के.
अपना क्षमता के हिसाब से ‘कुछ’ बने के कोशिश बेशक होखे के चाहीं बाकिर कोशिश अइसनो ना होखे के चाहीं कि उ पूरा ना भइला पर रउआ भितरी से टूटि जाईं. षङयंत्रकारी त हर जगहा, हर क्षेत्र में बाड़न. जरनियहपन त हर जगहा बा. एह से धीरज त धरहीं के पड़ी. संघर्ष त करहीं के पड़ी भाई ! कीड़ा फतिंगा भी अपना आखिरी दम तक अपना संघर्ष के लड़ाई लड़ेला. हर घड़ी हर कदम संघर्ष. अनथक साधना आ धीरज के काट केहू के लगे नइखे.

किसी के पांव से कांटा निकालकर देखो
जिनिगी बा त सुख-दुःख त अइबे-जइबे करी. सुख के महफ़िल से इतर दुख के साथी चीन्हे के पड़ी. अइसन साथी जेकरा सामने बेफिक्र होके दिल खोलल जा सके. जेकरा कान्हा प मूड़ी ध के फूट-फूट के रोअल जा सके. जे बेकहले राउर दुख बूझे आ अपना जोर भर मदद करे. अइसन साथी मिलल मुश्किल बा. बाकिर दोसरा खातिर अइसन साथी त बनले जा सकत बा. ई अपना अख्तियार में बा. एहू से दुख कम होई. कुँवर बेचैन जी के एगो शेर बा- तुम्हारे दिल की चुभन भी जरूर कम होगी / किसी के पाँव से काँटा निकालकर देखो...

संवाद जरूरी बा
भाई हो, उदार बने के पड़ी. सहनशील बने के पड़ी. ‘’ नेकी कर दरिया में डाल ’’ के राहे चले के पड़ी. अनेरहूँ हँसे के पड़ी. अपनो प हँसे के पड़ी. गीत गावे के पड़ी. गुनगुनाये के पड़ी. हमार शेर बा कि 'दुखो में ढूँढ ल ना राह भावुक सुख से जीये के / दरद जब राग बन जाला त जिनगी गीत लागेला‘ .... मतलब, रउरा दुःख के आउटलेट रखे के पड़ी. अइसन नेह के बंधन भी चाहीं जॅऺहवाँ बेबातो के बात होखे, बेवकूफी भरल बात होखे, पागल नियर आदमी ठठा के हँसे. जहाँ दिल, दिमाग आ किडनी पर जोर ना पड़े. बिंदास होके संवाद होखे. जहँवाँ ई संदेह मत होखे कि एह में से केहू अपना मतलब के बात उचिला के कबो सेंटीमेंटल ब्लैकमेल करी. जहाँ दोस्ती में माई आ बेटा वाला ममता के, देवर-भउजाई वाला मजाक के आ पति-पत्नी वाला निजता आ खुलापन के रिश्ता होखे. अइसन दोस्त चाहीं. अइसन दुखहरन दोस्त. ना बाहर मिले त अपना भितरी खोजीं. बाकिर संवाद चालू रहे. हमार एगो दोहा बा, " भावुक अब बाटे कहाँ पहिले जस हालात / हमरा उनका होत बा, बस बाते भर बात.'' ई बाते भर बात वाला दीवार तुरियो के कुछ रिश्ता चाहीं, जहाँ नेह के बरसात में मन भींज के तरोताजा होत रहे. तब ना होई कवनो सुसाइड. ना होखिहें लोग आत्महंता. ना मरिहें कवनो सुशांत सिंह राजपूत. तब जिंदगी जंग भलहीं लागी, बोझ ना लागी.

संयुक्त परिवार सबका ले बड़ इलाज
तीन गो बात अउरी इशारा में. संयुक्त परिवार का ओर लौटल एकदम से संभव नइखे. बाकिर जहँवें बन पड़े, दुख त बाँटल जा सकेला. सूनल-सुनावल जा सकेला. एकल परिवार में त पति-पत्नी के बीच अनबन भा झगड़ा भइल होखो त हफ्तन सन्नाटा रहेला. दूनो के मन होखबो करो तबहूँ केहू फरियावे भा समझौता करावे वाला ना होला. दोसर बात, अपना जड़ का ओर सोचल जाव, जहँवाँ अपनन खातिर दरवाजा हर-हमेसा खुलल रहत रहे. अपॉइंटमेंट लेबे के औपचारिकता ना भइल करे. तीसर बात, दिन रात सोशल मीडिया के अनसोशल कोना में ढूकि के टेंशन बटोरला से नीमन बा जे छोट-छोट लइकन के सङे बइठ के लूडो खेलल जाव, भा प्रकृति के सङे रोमांस कइल जाव. प्रेम आ रोमांस.. ईहे कवनो तनाव के काट बा. अपना से, अपना माई-बाप से, भाई-बहिन से, परिवार से, देश आ समाज से अउर अपना सपनन से प्रेम करीं. प्रेम जीये के भूख देला, त जिंदगी खातिर लड़े के ताकत.

(लेखक मनोज भावुक भोजपुरी भाषा के जाने-माने कवि हैं.)

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