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    भोजपुरी में पढें - गांव के मिठाई में माटी क मिठास

    भोजपुरी इलाका में बने वाली मिठाई के आनंद अलगे होला.
    भोजपुरी इलाका में बने वाली मिठाई के आनंद अलगे होला.

    अइसे त हर इलाका में अपना तरीका के मिठाई बनेला लेकिन भोजपुरी इलाका में बने वाली मिठाई में लागेला जइसे वहां के पानी आ माटी के भी मिठास घुलल बा. इ मिठाई में सेहद आ स्वाद दूनो के ध्यान रहेला.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 13, 2020, 12:26 PM IST
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    जकल के नौवका युग में अगर केहू कउनो मीठा के देसी कहे त सुन के अजबे लागे कि सबे मीठा त इहे देश क ह चकलेट - केक के छोड़ के त कउनो मिठाई के देसी कहे क का मतलब निकालल जाओ. देसी मीठा से मतलब पूर्वांचल अउर बिहार में पूजा, कथा- जज्ञ, सादी बियाह, मरनी जिवनी के भोज-भात में खाये के होखे बा नेग बिदाई में दू चार झापी भर के भेजे क के होखे लेड़ुआ, खाजा, टिकरी, बालूसाही, ढूंढी जैइसन मीठा के बिना काम न चले. अइसन सूखल मीठा क कई तरह के फायदा होखे. एक त पहिले क जमाना में गांव क मनई लोगन क खुराको ढेर रहे जौन कउनों कउनों क आजो ह जे बिना आपन सेहत पर धयान देहले ढेर खाये न बदहजमी क फिकिर न सुगर- बलड पेसर क चिंता. लोगन के खुराके के चलते कौउनो काज परोज के मौका पर ढेर मातरा में भोजन मीठा बनावल जात रहे कि कौउनो कमी के चलते इज्जत क पाही न लगे. दोसरे मीठा क मातरा इहोसे ढेर होखे कि बिना खराब होएले ढेर दिन तक चल सके. ऐही से देसी मीठा माने सूखल मीठा के चलन रहे. अउर त अउर पहिले के बूनी के लड्डू में चीनी क मातरा ढेर होखे जेसे उ जलदी खराब न होखे पावे.

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    मौसम देखि के होई काज-परोज
    एकरा अलावा गांव देहात में पहिले सादी बियाह बा कौउनों काज परोज ( जिवनी मरनी के छोड़ के ) गरमी के मौसम में ही ऱखल जाओ. गेहूं के दवनी के बाद लोग धान के बीआ डाले तक खेती किसानी से लोग लगभग दू अढ़ाई महीना फारिग हो जाओ. ए समय खेतों खलिहान हो जाओ त मेहमानन –बरातियन के आवे जाए सूत्ते बइठे में कउनो दिक्कत ना होखे. सादी क समियाना भी खाली खेत खलियान में गड़ा जाओ. एकरा अलावा गरमी में काज परोज करे क सबसे बड़ फायदा ई रहे कि रबी के फसल के बाद लोगन के हाथ में गेहूं चना सरसों गुड़ बेच के दू पइसा हाथ में आ जाए. अइसे त खरीफ के सीजन में भी धान अरहर जौ मकई बेच के खेती किसानी करे वालन के हाथ में दू पइसा आ जाला लेकिन जाड़ा में बियाह सादी एसे ना होखे कि बराती मेहानन के सूते बइठे, ओढ़े बिछावे में दिक्कत होखे. अब त गांवे कसबे टेंट हाउस खुलला के चलते खटिया, रजाई तोसक क कउनों कमी न रहल. अब त खाली पइसा फेको तमासा देखो वाली बात रह गइल ह. जेकरा खलती में पइसा ओकरा खातिर जाड़ा गरमी सब बराबर. अब त गांवों में भाई लोग बढ़िया मौसम के चलते जाड़ा में ही सादी बियाह कइल चाहत ह.
    सूखल मिठाई के चलन


    एक ओर गरमी में सादी बियाह, गौउना बिदाई होखे के चलते बेसन, मैदा, चीनी अउर घी बा डालडा से बने वाला सूखल मिठाई क चलन रहे त गरमी में दूध दही क भी कमी हो जात रहल. बिहार पूर्वांचल क सूखा मौसम के चलते गरमियन में गाय भैइसियन क घास चारा क कमी हो जाए. एसे उनकर दूध में कमी हो जाए. दूध क कमी के चलते गरमी में छेना खोआ क मीठा त नइहे बनत रहे अउर केहू केहू सौक से बनवा भी ले त गरमी के चलते छेना खोआ क मिठाई जादा दिन टिकबो ना करे. छेना क त दूसरे दिन खटा जाए. तब न त ठंडा करे वाली मसीन रहे न एसी कूलर. समय बदलला के साथे सबे कुछ आस्ते आस्ते बदले लागल. ना बदलल ह त झोरी झापी में भर के बर बिदाई में लेवे देवे वाला देसी मीठा क चलन. चाहे कउनो मौसम होखे आजो गांव देहात में झोरी झापी में लड्डू खाजा टिकरी ही भेजेल जाला. जेसे कि ढेर मातरा में भेजेल गइल मीठा ढेर दिन तक खराब ना होखे साथे देर दिन मेहमानन के खिआवल अउर आस पड़ोस में बाटल जा सके.

    बनारस के मिठाई के असर
    कउनो भी किसिम क खानपान में उ जगहा क माटी अउर पानी क मिठास जरूर घुल मिल के ओकर सवाद चार गुना बढ़ा देला. चाहे उ कहीं क मीठा होखे बा कहीं क पूड़ी तरकारी. एकरे चलते कउनों जगह क मीठा बा नमकीन क ढेर नाम हो जाला. फेर उ नामे के चलते लोग दूर दूर से उहां त मीठा नमकीन खाये आवेला अउर अपने परिवार रिस्तेदारन खातिर बन्हवा के लेउ जाला. जइसे बनारसे क बात कइल जाओ त पक्का महाल ( घाटन के किनारे गलियन में बसल पुरान कासी ) क कउनों मीठा क दुकान क बालूसाही होखे ब बूनी बेसन क लड्डू आ चाहे मेवा खोआ क बनल बरफी गुलाबजामुन. उनकर सवाद क कौउनो जोड़ नाही ह. एइसे त आजकल बनारस के कोना कोना में एक से बढ़ के एक मीठा क दुकान खुल गइल ह जहां क मीठा कउनो माने में पक्का महाल से कम ना ह लेकिन पक्का महाल का मीठा जेकरे मुंहे लाग गइल उ ओके कब्बो भुला ना सकेला.

    ऐही तरह पांडेयपुर क गुलाबजामुन क भी बहुते नाम ह. कहल जाला कि माटी क परई में लकड़ी क चम्मच से काट के खाये खातिर मिले वाला इहां क गुलाबजामुन खाए समय लोग बिसेस सावधानी न रखे त गुलाबजामुन मुंह में जाए से पहिले ही टूट के गिर जाए का खतरा रहेला. काहे से कि उ इतना नरम रहेला कि मुंह में जाते त घुल जाला लेकिन साथे ओसे पहिले धोखा भी दे सकेला. इ खतरा होखे के बाद भी बनारस बा आस पास के जनपद के लोग एके उठावे पांडेयपुर मौका निकाल के जरूर जालं. बनारस के गोदौलिया चौक पर एगो बंगाली मीठा क बहुते पुरान दुकान ह जलजोग. जेकर चमचम अउर लौंग लत्ता खाए बनारस, आसपड़ोस क जनपद के अलावा बनारस गाजीपुर अउर चंदौली जिला से सटल बिहार के भभुआ, सासाराम, बक्सर से लोग आवे. समय क मार केहू पर बिना मरुव्वत के पड़ेला. जलजोग भी एसे ना बच पाइल. भाइयन के अलगौजी में दोकान एक से दू हो गइल. आधुनिक युग में लकदक करत बनारस के एक से बढ़िके एक मीठा के दुकानन के आगा जलजोग कहीं ना ठहरे ला लेकिन एक बार इहां क चमचम, लौंग लत्ता क सवाद ले चुकल लोग आजो ओकरा चाह में जरूर जाइल चाहेला.

    बनारस के कचहरी के बगल में भोजूबीर, अर्दलीबाजार से सटले एगो परिसर महाविद्यालय ह उदयपरताप महाविद्यालय जौन यूपी कालेज के नाम से जानन जाला. परिसर कालेज होवे के चलते यूपी कालेज में महाविद्यालय के साथे लाइका लइकिन क विद्यालय भी हव. एकरा अलावे परिसर में बैंक, डाकघर, डेयरी, अस्तबल, डिसपेंसरी, हर तरह क खेल क मैदान, व्यायामशाला अउर कोआपरेटिव भी हव. कोआपरिटव में मीठा भी बनेला. 70 के दसक में इहां रंगई साव नाम क हलवाई रहलन. कहल जाला कि एक बार साव जी बरफी बनावे खातिर दूध जरावत रहलन. बेख्याली में दूधवा ढेर जरके चाकलेटी लाल हो गइल त साव जी ओके बरफी जइसन काट देलन. उ बरफी खाये में चिमड़ लेकिन खूबे सवादिस्ट रहे त उहे दिन से साव जी ओके लाल पेड़ा कह के बेचे लगलें. फिर का रहे साव जी लाल पेड़ा यूपी कालेज क छात्रन, मास्टरन अउर कर्मचारियन खातिर सबका ले अधिक पसंद वाला मीठा बन गइल. समय बितला के साथे लाल पेड़ा कालेज परिसर के बाहरो पसंद कइल जाए लगल. 20-30 साल में लाल पेड़ा के समूचा बनारस के लोगन के पसंद आवे लागल.

    आज लाल पेड़ा बनारस के लगभग सब मिष्टान भंडार में यूपी कालेज वाला लाल पेड़ा क नाम से बिकाला. एक बार जेकरा मुंहे ई लाल पेड़ा लाग गइल उ बनारस जाए वाले संगी साथियन से एके जरूर मंगवाएला. अपने आप में ई बेजोड़ मीठा के अलावा जौनपुर क इमरती समेत दोसरो जगह क कई सवादिस्ट मीठा के बिना पूर्वांचल के देसी मीठा क कथा कहानी पूरा ना पाई लेकिन उ सब क बिस्तार से बखान फेर कबहू होई.
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