भोजपुरी विशेष – लोक में वीर भाव भरत 'आल्हा' आ रचनाकार जगनिक

पृथ्वीराज रासो के आजुओ चरचा होला. बाकिर कन्नौज के जनकवि जगनिक कवनो राजा-महाराजा के बखान में रासो ना लिखलन. जवन उ रचने ओकरा के सुनिके अनासे रोआं खाड़ हो जाला.

पृथ्वीराज रासो के आजुओ चरचा होला. बाकिर कन्नौज के जनकवि जगनिक कवनो राजा-महाराजा के बखान में रासो ना लिखलन. जवन उ रचने ओकरा के सुनिके अनासे रोआं खाड़ हो जाला.

पृथ्वीराज रासो के आजुओ चरचा होला. बाकिर कन्नौज के जनकवि जगनिक कवनो राजा-महाराजा के बखान में रासो ना लिखलन. जवन उ रचने ओकरा के सुनिके अनासे रोआं खाड़ हो जाला.

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  • Last Updated: December 28, 2020, 1:58 PM IST
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गांव के सजल चौपाल. सैकड़न लोगन के भीड़ ठकचल बा. गोला बनाके गंवई नर- नारी बइठल भा ठाढ़ होके अजगुत तमाशा देखत बा. गोलाई का बीचे बइठल बाड़न डेरा प के धन जी पहलवान. उन्हुका आगा ढोलक धइल बा. सभकर निगाह उन्हुके ओरि ठहरल बा. पहिले ऊ ढोलक के कड़ी के खींचि-खांचिके थाप देत बाड़न, फेरु हाथ जोड़िके धरती माई के सुमिरन करत आल्हा गावल शुरू कऽ देत बाड़न. सउंसे

गांव उहवां जुटत जा रहल बा आ धन जी पहलवान के ओजस्वी सुर में ढोलक बजा-बजाके आल्हा गावे के लमहर सुरीला सिलसिला चलत बा. सभे केहू आल्हा सुने में आपन सुधि-बुधि भुला देत बा.

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लोकमहाकाव्य आल्हा
चाहे जाड़ के हाड़ कंपावेवाला मौसम होखे भा बरखा-बूनी के देहभिंजाऊ महीना, आल्हा अइसन वीरत्व-बोध करावेवाला महाकाव्य ह,जवन पिछिला आठ सइ बरिस के लोक के कंठहार बनत आइल बा. सउंसे उत्तर भारत एकर दीवाना रहल बा. आल्हा गावेवाला के अल्हैत कहल जाला आ ई जवना छंद में रचल गइल रहे, ऊहो आल्हा छंद के नांव से मशहूर हो चुकल बा. अपना ओजस्वी सुर में अल्हैत आल्हा गा-गाके सुननिहारन के खाली मनोरंजने भर ना करेला, बलुक तन-मन से बहादुर बने आउर देश-समाज खातिर जानो कुरबान करेके प्रेरना देला. वीरता का संगहीं एमें सांच परेम आ सुन्नरता के भाव अभिभूत करे बेगर ना रहे. इहे कारन बा कि रामचरित मानस का बाद आल्हा शोहरत के बुलंदी छूवेवाला बेजोड़ लोकमहाकाव्य बा. ओहू से बड़ बात ई कि अल्हैत के वाचिक परिपाटी के सउंसे काव्य शुरू से आखिर ले जबानी इयाद रहेला.

आदि रचयिता जगनिक

आल्हा में वीर बांकुड़ा आल्हा आउर उन्हुकर भाई ऊदल के वीरता आ पराक्रम के कथा बा. एकर रचना वीरगाथा काल में भइल रहे आ आदि रचनाकार रहलन जगनिक. ओह घरी राजा-रजवाड़न प रासो लिखे के परंपरा रहे. पृथ्वीराज रासो के आजुओ चरचा होला. बाकिर कन्नौज के जनकवि जगनिक कवनो राजा-महाराजा के बखान में रासो ना लिखलन. ऊ चहितन, त अपना राज के राजा परमाल पर महाकाव्य रचिके शोहरत-दौलत कमइतन,बाकिर ऊ अइसन ना कइलन आ परमाल के अधीनता में रहेवाला वीर-रणधीर आल्हा-ऊदल के अपना काव्य के विषय बनवलन आ कन्नौजी-बुंदेली का संगहीं भोजपुरियो में आल्हा के शोहरत बुलंदी के छूवे लागल. एकरा लोकप्रियता के राज बुझिला ई रहे कि जनता के जबान में जनता खातिर एकर रचना भइल रहे आ हर किसिम के डर-भय छोड़िके वीरत्व भाव भरे में एकर अगहर भूमिका रहल. मूल ग्रंथ 'आल्ह खंड' का रूप में रचाइल रहे आ बाद में एमें कई गो छेपको जोड़ात चलि गइलन स. नतीजा ई भइल कि राजा- रजवाड़न प कसीदा कढ़ाइल रासो के तुलना में जनता के ई काव्य भारी पड़ल आ वाचिक परंपरा में आगा बढ़त ई अमर कृति बनि गइल.



लोकप्रियता के भुनावे के कोशिश

कहल जाला कि ब्रिटिश शासन में किछु अंगरेज अफसर,जवना में जॉर्ज ग्रियर्सनो रहलन, इहां के लोकभाषा-संस्कृति में खास रुचि लेके रचनात्मक काम कइलन. ओइसने एगो जिला कलक्टर, रहलन चार्ल्स इलियट, जे सन्1865 में फर्रुखाबाद रहिके आल्हा छंद के संकलित आ लिपिबद्ध करावे में यादगार भूमिका निबहलन आ 1871में प्रकाशित करववलन. आजुओ ओकर मूल प्रति लंदन के ब्रिटिश इंडिया म्यूजियम में सुरक्षित बा.बाद में लालता प्रसाद, श्रीकृष्ण पहलवान, भोलानाथ मिश्र वगैरह कवियन के आल्ह खंड छपल आ अलग-अलग बोली-भाषा में एमें किछु ना किछु सुधार-परिमार्जन होत चलि गइल, बाकिर केन्द्रीय भाव ओइसहीं बरकरार रहल.

शारदा माई के उपासक

कहल जाला कि खाली कन्नौजे में ना, महोबा,माड़ौ,गांजर,बूंदी से लेके दिल्ली ले आल्हा के वीरता के डंका बाजत रहे. आल्हा मैहर के माई शारदा के सच्चा उपासक रहलन आ रोज मैहर मंदिर में पूजा करे जात रहलन. उन्हुका जन-जन में अमरता के अंदाजा एहू से लगावल जा सकेला कि आजुओ मैहर के माई शारदा के मंदिर में पहिला पूजा आल्हा करेलन आ रोज जब मंदिर के कपाट खुलेला, त आल्हा के माई के चरन में चढ़ावल फूल हैरत में डालि देला. भलहीं ई किंवदंती होखे, बाकिर एहू में जन-मन में पइसल आल्हा के वीरता के छवि के छाप साफ महसूस कइल जा सकेला. माड़ौ (मांडवगढ़) में पथल प उकेरल गइल ऊदल के घोड़ा के टाप आजुओ मौजूद बा.

जीए के धिरकार

जब अल्हैत का मुंह से ओजस्वी बानी में आल्हा फूटेला, त सुनेवाला के रोवां-रोवां ठाढ़ हो जाला. कबो जोश के भाव से नस-नस फड़के लागेला, त कतहीं अनेति-अतियाचार प खून खउले लागेला. लड़ाई के मैदान के दृश्य बेरि-बेरि सुनेवाला के रोमांच से भरि देला-

खट-खट-खट-खट तेगा बोले,

बाजे छपक-छपक तरुआर,

होत लड़ाई जब महबा में--


बीच बीच में अइसन भाव आ कथा के बखान होला कि सुनेवाला का सोझा सउंसे नजारा नजर आवे लागेला. डेगे-डेग प्रेरना जगावे वाला, उदबेगे वाला भावबोध झलकेला-

जाके बैरी सम्मुख ठाढ़े,

ताके जीए के धिरकार!


आल्हा के मन में इहो भावना घर करत बिया कि देश-समाज खातिर जान कुरबान करे में गौरव-बोध होखे के चाहीं. लमहर नाहक जीएवाली जिनिगी के कवनो मोल ना होला-

बीस बरिस ले कुक्कुर जीए

तीस बरिस ले जिए सियार

बरिस अठारह छत्री जीए

आगे जीए के धिरकार!


आल्हा में ओइसे त पूरा महाकाव्य अलग-अलग लड़ाइयन में आल्हा-ऊदल के वीरता से ओतप्रोत अनगिनत कहानियन से भरल पड़ल बा,बाकिर एकरा संगहीं बेला आ फुलवा का संगें आल्हा आ ऊदल के परेम के तरल प्रसंग श्रोता में सौन्दर्यबोध आउर रोमानियत के तरलता बहावत बाड़न स. आल्हा आ उन्हुकर बहादुर सैनिक साजो-बाज में पारंगत बाड़न आ कबो-कबो भेस बदलिके विरोधियन के चकमा दे देत बाड़न. अइसने एगो दृश्य देखीं-

कर इकतारा मलिखै लिन्हो,डमरू आल्हा लिए उठाय,

सोन सरंगी सैयद लीन्ही,ढेंवा खंजड़ी लई बजाय,

बजे बंसुरिया जब ऊदल की,शोभा कछू कही न जाय,

सोरठ, भैरों, जैजैमंती ठुमरी, टप्पा और मल्हार,

धरपद गामै और तिल्लाना, तोरो गजल पर्ज पर तान!


आखिरकार ई लोककाव्य बेसम्हार दु:ख आ करुना से भरि देत बा, जब आल्हा आउर ऊदल वीरगति पावत बाड़न. बेला आ फुलवा के घवाहिल दिल तार-तार हो जात बा. आल्हा का शोहरत के जरि में ओकर वीरत्व भाव आ लोक चेतना जगावे के उतजोग बा. एकर चरितनायक आम लोगन का बीच के तेज-ओज से भरल-पुरल नवही बाड़न, जे देश खातिर बलिदान हो जात बाड़न. आजुओ आल्हा के सुर जइसहीं कान में गूंजेला, रोआं-रोआं गनगना उठेला. तबे नू आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के कहनाम रहे, ' गांवों में जाकर देखिए तो मेघ गर्जन के बीच में किसी अल्हैत के ढोल के गंभीर घोष के साथ यह वीर हुंकार सुनाई देगी-

बरस अठारह छत्री जीए, आगे जीए को धिक्कार!'

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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