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भोजपुरी में पढें- बंगाल में काली पूजा पर जोर काहें बा

माता के हाथ में मूंड़ी अहंकार के प्रतीक ह. अहंकार खत्म होई तबे माता के आशीष मिली.
माता के हाथ में मूंड़ी अहंकार के प्रतीक ह. अहंकार खत्म होई तबे माता के आशीष मिली.

माता के बांया दू हाथन में से एगो में खड्ग आ दुसरका में मनुष्य के गरदन से कटाइल मूड़ी बा. खड्ग का करेला, सभे जानता. कटाइल मूड़ी अहंकार के प्रतीक ह. जब तक अहंकार ना जाई, मनुष्य ईश्वर (मां काली) के आसपास भी ना जा सकेला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 24, 2020, 3:03 PM IST
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अगर रउरा ईश्वर के मां काली रूप के साधक बने के बा त सबसे पहिले दिल- दिमाग डर के खतम कइल जरूरी बा. संजोग देखीं कि भगवद्गीता के सोरहवां अध्याय के पहिला श्लोक के शब्द बा- "अभयम सत्व संशुद्धि". माने भक्त बने के पहिला शर्त बा कि ओकरा भयभीत होखल छोड़े के परी. ऊहे बाति मां काली के साधको पर लागू होला. दीपावली के समय बंगाल में कार्तिक पूर्णिमा के अमावस्या के आधा रात के समय एह पूजा के बहुते आकर्षण बा. कोलकाता में त जानते बानी मिलल- जुलल संस्कृति बा आ कुल जनसंख्या के 35 प्रतिशत लोग हिंदीभाषी बाड़े. एही से एहिजा दीपावलिओ धूमधाम से मनावल जाला. कथा ह कि राक्षस संहार के बादो मां काली के क्रोध शांत ना भइल. मां काली के शांत करे खातिर अनंत भगवान के स्वरूप आ मां काली के पति- भगवान शिव उनुका आगा चितान सूति गइले. मां काली ज्योंही क्रोध में आगा बढ़ली तले उनुकर गोड़ भगवान शिव के छाती पर परि गइल. मां काली चिहुंकि के नीचे देखली, काहें से कि भोले बाबा के छाती पर गोड़ राखला के जवन वाइब्रेशन भा स्पंदन बा ऊ सब केहू बरदाश्त ना क सकेला. माता काली जानि गइली कि उनुका से गलती हो गइल बा.

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क्रोध के शांति
उनुकर समूचा क्रोध तुरंते खतम हो गइल आ पछताए लगली. ओही पछतवला में जइसे हमनी का करेनी जा ओही तरी ऊहो जीभ निकाल के दांत से हल्का दबावे लगली. ओही घरी माता काली ब्रह्मांड के कुल जीवन के आसिरबाद दिहली कि सबकर कल्याण होखे. ईहो सांच बा कि माता काली के क्रोध अउरी केहू रोके भा ना रोके, भगवान शिव जरूर रोकि सकेले. बंगाल में प्राचीन काल से शक्तिपूजा होत आइल बा. मध्यकालीन युग में बंगाल से लेके यूरोप तक में अनेक जगहन पर काला जादू (ब्लैक मैजिक) के प्रभाव के उल्लेख मिल जाई. ओह घरी मां काली के उपासक लोग काला जादू के प्रभाव के नकारि के कालीपूजा के महातम के स्थापित कइल लोग.
'काला जादू' के भ्रम


ओकरा बाद से बंगाल काला जादू खातिर ना, कला आ साहित्य खातिर जानल जाला. तंत्र साधना अलग चीज ह. ओमें साधक मंत्र आ कुछ पद्धति के साधना करेला. आजुओ तंत्र साधना खातिर तारापीठ के बहुते नांव बा. बाकिर तंत्र साधक सरेआम ना चिन्हाला लोग. सच्चा तंत्र साधक आम आदमी के सामने अपना के साधारण आदमी नियर पेश करेला. तबो कुछ तंत्र साधक से हमरा भेंट हो गइल बा. अगिला लेख में ओकर वर्णन लिखब. तांत्रिक लोग आधा रात के गुप्त रूप से तंत्र साधना करेला. ई त जानते बानी सभे कि मां काली के रूप जेतना भयावह लउकेला, माता ओतने कृपालु आ करुणामयी हउवी. जवन भक्त उनकर पूजा- अराधना करेला लोग, ओह लोगन के कवनो अनिष्ट ना हो सकेला. मां के उपासक लोग राहु चाहे केतु के कौनो कष्टकारी प्रभाव से मुक्त हो जाला. कवनो बाधा- विपत्ति ओह लोगन से डेराले.

मां काली के साधना
बंगाल में कार्तिक अमावस्या के आधा रात के मां काली के पूजा होला. मान्यता बा कि मां काली के विधिवत अराधना हमनी के शारीरिक (फिजिकल), मानसिक (मेंटल), भावनात्मक (इमोशनल), अध्यात्मिक (स्पिरिचुअल) आ ऊर्जा (एनर्जी) के स्तर संतुलित क देले. ईहे पांच गो ऊर्जा जदि संतुलित ना रहिहन स त आदमी के जीवन में उथल- पुथल रही. त खाली पूजा कइला से ई कुल प्रकार के ऊर्जा नियंत्रित हो जइहन स? उत्तर बा- ना. एकदम ना. एही खातिर साधना के विशेष पद्धति बतावल गइल बा, जवना के सार्वजनिक उल्लेख वर्जित बा. तांत्रिक साधक लोग कहेला कि कुछ मंत्र के जाप से भी ई कुल ऊर्जा संतुलित हो जाली सन. कहल बा कि कालीपूजा करे वाला आदमी के मन, हृदय आ आचरण शुद्ध होखे के चाहीं. शुद्ध कपड़ा पहिर के, ब्रह्मचर्य के पालन करते हुए मां काली के अराधना करे वाला के निश्चिते लाभ मिलेला. साधना के समय (कौल तंत्र के साधक लोगन के अलावा) मांस आ मदिरा के सेवन ना करेके चाहीं.

उग्र अउरी शांत मूर्ति
मां काली के बारे में एगो बात सभ कहेला. केहू गृहस्थ माने घर- परिवार वाला आदमी के उग्र काली के मूर्ति भा फोटो घर में ना राखे के चाहीं. हमेशा शांत भाव वाली मां काली के फोटो भा मूर्ति राखे के चाहीं. एगो अउरी बात. कोशिश होखे के चाहीं कि घर में मां काली के फोटो रहे, मूर्ति ना. काहें से कि मूर्ति के स्थापना के साथे कई गो नियम जुड़ जाला. जे नियम के पालन करे में सतर्क ना होखे, ओकरा फोटो राखे के चाहीं .माता के कइसन रूप बा? माता के बांया दू हाथन में से एगो में खड्ग आ दुसरका में मनुष्य के गरदन से कटाइल मूड़ी बा. खड्ग का करेला, सभे जानता. कटाइल मूड़ी अहंकार के प्रतीक ह. जब तक अहंकार ना जाई, मनुष्य ईश्वर (मां काली) के आसपास भी ना जा सकेला. त माता पहिले अपना भक्त के ज्ञान रूपी तलवार से अहंकार काट देली. दायां ओर के दू गो हाथ में से एगो अभय दान दे रहल बा, आ दुसरका वरदान देता. अभय दान बहुत बड़ आसिरबाद ह. मां काली के भक्त के अभय रहेला. एकर का माने? एकर माने ई कि साधना के रास्ता में पहिला जरूरी चीज ह निर्भय रहल. जे डेराइल रही ऊ साधना ना क सकेला. माता बहुत दयालु हई. कहल बा- जे मां काली, मां काली के जाप क दिहल, ओकर जिम्मा मां ले लेली. एही से माता के सच्चा भक्त अभयानंद स्थिति में रहे ला लोग.

असली भक्त के?
कई लोग पूछेला कि असली भक्त माने का भइल? साधक लोग कहेला कि असली भक्त ऊहे ह जेकर मन आ हृदय निर्मल होखे. चाहे ओकर पेशा कुछु होखे, नोकरी करत होखे भा बिजनेस करत होखे. जदि ईमानदार बा, सचाई के पालन करता आ ईश्वर में पूर्ण बिसवास बा त ओकर काम बन जाई. साधना पूर्ण हो जाई. असली भक्त उहे बा जे जीवन में परोपकार, सेवा आ भक्ति पर खरा उतरता. ओकर प्रेम अपना परिवार के दायरा तक सीमित नइखे. ऊ समूचा ब्रह्मांड के जीव- जंतु से प्रेम करता. केहू पराया नइखे, सब आपने बा. कई लोग कहेला कि ई आदर्श स्थिति सिर्फ किताबे तक सीमित बा. वास्तव में अइसन आदमी मिलल मुस्किल बा. बाकिर रउरा जानि के हैरान हो जाइब कि अइसन भक्त बा लोग आ आधुनिक युग में भी बा लोग. एकदम सरल, सहज. जतनाहो सकेला सेवा आ भक्ति में लीन. अइसन साधक लोगन के निगाह में ना आवेले सन. कहीं अनाम, अजाना आदमी नियर रहेले सन. ऊ ना चाहसु लोग कि हमरा के केहू चिन्हो, आदर करो भा महत्व देउ. जेकर भगवाने के चरण में आश्रय बा, मां काली के चरण में आश्रय बा, ओकरा मान- अपमान, सुख- दुख के का चिंता. जइसे माता रखिहन, ओइसहीं रहे के बा. एगो बांग्ला में भक्ति गीत बा- “मां के दिहल खात- पहिरत बानी, तब काहें चिंता करीं?”

एही संसार में बाने असली भक्त
हम एगो काली भक्त से पुछलीं कि एतना सच्चा- खांटी भक्त कहां मिली जेकरा मन में कवनो स्वार्थे नइखे, कौनो लालसा आ आसक्ति नइखे. निष्पाप आ निर्मल हृदय होखे? त ऊ कहले कि – देखीं, एह संसार में कुछु असंभव नइखे. अइसन लोग बाड़े. बस दिक्कत बा कि अइसन आदमी संगे रउरा भेंट नइखे. अइसन भक्त के संख्या कम बा, बाकिर अइसन आदमी बाड़े. एह संसार में हर तरह के लोग मिल जइहें. एही से एकर नांव संसार परल बा. ऊ आगा कहले कि एही घरी ना, हरदम अइसन भक्त एह पृथ्वी पर रहत आ इल बाड़े. सबसे बड़ उदाहरण त गीता बा. भगवद्गीता के बारहवां अध्याय में भगवान कृष्ण एगो भक्त के जवन लक्षन बतवले बाड़न, ऊहे आजुओ लागू हो रहल बा. एह अध्याय के नाम भक्तियोग ह.

भगवान कृष्ण कुल्ही जुग खातिर ई बाति कहले बाड़न. खाली त्रेता युग खातिर नइखन कहले. भीतर से उहे निर्मल रहि सकेला जेकरा ई ज्ञान हो गइल बा कि ई संसार हमनी के कौनो कामना के पूर्ति ना क सकेला. ई संसार मृग मरीचिका ह. लागता कि सुख एह संसार में जरूर मिली, बाकिर सचाई ई बा कि इंद्रिय लिप्त आदमी खातिर ई संसार धोखा, दुख, प्रेम के अभाव वाला आ रोग के घर ह. संसार में सुख मिलिए ना सकेला. गीता में भगवान कृष्ण कहले बाड़े कि हे अर्जुन एह दुख रूपी संसार समुद्र से बाहर निकल. त जब भगवाने एह संसार के दुख के समुद्र कहि देले बाड़े त मनुष्य कवना आशा में एइजा सुख खोजता? जवन क्षणिक सुख ओकरा मिलतो बा, ऊ ई बतावे खातिर बा कि ईश्वर में एहू से बढ़ि के सुख बा, ऊहे स्थायी सुख ह.
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