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भोजपुरी में पढ़ें - सामयिकता के कसौटी प मीर आ ग़ालिब

गालिब और मीर के शायरी में दौर के केतना जिक्र बा.
गालिब और मीर के शायरी में दौर के केतना जिक्र बा.

जब महान रचनाकार के चर्चा होला त उनकर सामयिकता पर भी विचार कइल जाला. अइसे त गालिब के सर्वकालिक शायर मानल जाला लेकिन 1857 के बिद्रोह के चिंगारी पर उनकर एगो दूगो शेर ही मिल पावेला, जबकि मीर समय पर ढेर चिंतित लउकेलें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 25, 2020, 6:35 PM IST
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कवि, शायर चाहे साहित्य-कला के कौनो विधा के सर्जक के योगदान पर चर्चा करे के एक कसौटी ईहो होए के चाहीं कि ऊ आपन समय काल से केतना जुड़ल रहलन आ ओकरा के आपन रचना में कवन रूप में प्रस्तुत कइले बाड़ें. हम आज उर्दू के दू ठो महान शायर पर बात करल चाहत बानी. उर्दू में एक से एक बड़ आ महान शायर भइल बाड़न. ओकरा में सबसे बड़ नाम मीर तकी मीर आ ग़ालिब के मानल जाला. दूनो शायर एकक ठो ऐतिहासिक घटना के गवाह रहलन. मीर के जमाना में दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीले रहलन. मीर तकी मीर उनकर दरबारी शायर रहलन. ओही जमाना में भारत में नादिरशाह के हमला भइल रहे. ओह हमला में दिल्ली में भारी खून-खराबा भइल रहे. ओकरा में एक लाख से जादा लोग मारल गइल रहें. मीर बड़ी मुश्किल से आपन जान बचइले रहलन. ई हमला के बाद उनका दिल्ली छोड़ देवे के पड़ल रहे.

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बादशाह से दोस्ती
ग़ालिब के जमाना में बहादुर शाह जफर दिल्ली के बादशाह रहलन. मिर्जा ग़ालिब उनकर दरबारी शायर रहलन. ओह जमाना में 1857 के विद्रोह भइल रहे, जेकर नेता बहादुर शाह जफर रहलें. बहादुर शाह जफर अपनहूं बढ़िया शायर रहलें. विद्रोह के बाद अग्रेज सरकार उनका के रंगून जेल में डाल देले रहे. ओहिजा चट्टानन पर आपन अंतिम समय के कई ठो ग़ज़ल लिखले रहलन. उनकर उस्ताद इब्राहिम खां ज़ौक रहलें. ज़ौक साहेब गदर तक जिन्दा ना रहलें. केतना हैरानी के बात बा कि ओह समय के सबसे बड़ इतिहास के घटना के ग़ालिब पर कौनो खास असर ना पड़ल रहे.


मीर के शायरी में वक्त के दर्द
जहां तक मीर तकी मीर के सवाल बा उहां के दर्द के शायर कहाई ला. बड़ी तुनुकमिजाज आदमी रहलन. आपन मन के खिलाफ कौनो बात बर्दाश्त ना करत रहलें. जबकि ग़ालिब मस्तमौला टाइप के शायर रहलन. उनकर सबसे बड़ देन रहे शायरी में फिलोसफी के समावेश. बाद में अल्लामा इकबाल शायरी में फिल़ोसफी के बहुते ऊंचाई तक पहुंचइलन. हालांकि उहां के इस्लाम के फिलोसफी अपनइनी. मीर आ ग़ालिब दूनो महान शायर रहन एकरा में कौनो शक नइखे. बकि ऊ लोग के शायरी में एगो बहुत बड़ा अंतर ई बा कि मीर के शायरी में नादिरशाह के हमला के समय जे भयानक नरसंहार भइल रहे ओकर पीड़ा देखाई पड़ेला. बकि ग़ालिब के शायरी में 1857 के गदर के झलक ना मिले ला. नादिरशाह के हमला के संदर्भ में मीर के कुछ शेर प नज़र डालीं जा-


दिल की बर्बादी का क्या मज्कूर है,
यह नगर सौ मर्तबा लूटा गया.

दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें
कलतक जिन्हें दिमाग़ था यां तख्तो-ताज़ का.

(इहां दिल के मतलब दिल्ली से बा)

एह तरह के कई ठो शेर मीर के शायरी में शामिल बा. नादिरशाह के हमला के बाद जब दिल्ली पूरा तरह उजड़ गइल तब मीर तकी मीर एगो लाला व्यापारी के बैलगाड़ी पर बइठ के लखनऊ पहुंचलें. ओहिजा एक जगह मुशायरा होत रहे. मीर भी ओकरा में जाके बइठ गइलें. ओह जमाना में जेकरा-जेकरा सामने शमा मने मोमबत्ती आवत रहे ऊ-ऊ आपन कलाम पढ़त रहे. जब मीर के सामने शमा आइल त लोग उनकर परिचय पूछलन. मीर जवना लहज़ा में आपन परिचय देहलन ऊ इतिहास में लिखे जाए लायक बा. मीर तकी मीर कहलन-
क्या बूदो-बाश पूछो हो पूरब के शाकिनों
हमको गरीब जान के हंस-हंस पुकार के.
दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिखाब
रहते थे मुंतखब ही जहां रोजगार के
उसको फलक ने लूट के बर्बाद कर दिया
हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के.

एतना सुनते लोग उछल के खाड़ा हो गइलन. छौ लाइन में दिल्ली पर नादिरशाह के हमला के पूरा बयान आ गइल रहे आ उनकर परिचय भी शामिल हो गइल रहे. ई छोट-मोट शायर के वश के बात ना रहे. लोग पूछलन कि रउआ मीर तकी मीर बानी का? मीर सहमति से माथा हिला देहलें. बस ओहिजा हंगामा मच गइल. ई खबर लखनऊ के नवाब आसिफुदौल्ला के पास पहुंचल. नवाब साहेब तुरंते मीर साहेब के लावे खाती डोली भेजलन. उनका के अपना दरबार में रख लेलन. उनकर भारी-भरकम वज़ीफा तय भइल. हालांकि कुछे समय बाद मीर तनी सा बात प खिसिया के आसिफुदौल्ला के दरबार छोड़ देले रहलन.

गालिब के शायरी में हालते हाजरा
जाहां तक गालिब के सवाल बा उनकर पूरा दीवान छनला पर मुश्किल से एगो ग़ज़ल में 1857 के गदर के दरबार प असर के झलक मिले ला लेकिन ओकरा में मुगल दरबार के बदहाली के बात बा गदर के कौनो जिक्र नइखे. ऊ गज़ल के दू ठो शेर सुनल जाए-
ज़ुल्मतकदे में आज शबे-ग़म का जोश है.
इक शम्मा है दलीले-सहर सो खमोश है.

दाग़े-फिराको-सोहबते-शब की जली हुई
इक शम्अ रह गई है सो वो भी खमोश है.

ई ग़ज़ल में 13 ठो शेर बा लेकिन ओकरा में खाली दरबार के रौनक खत्म होइला के पीड़ा बा. स्वतंत्रता संग्राम के कौनो जिक्र नइखे. एतना महान शायर भला आपन समय के ऐतना बड़ घटना से अप्रभावित कइसे रह सके लन. एहिजा उनकर महानता पर प्रश्नचिन्ह लगावल जा सके ला. सच बात त ई बा कि ग़ालिब आपन पेंशन चालू करावे खातीं अंग्रेजन के खुश करे वाला रचना भी कइले रहलन. एकरा के उनकर अवसरवादिता कहल जाए चाहे व्यवहारिकता लेकिन एहिजा उनकर व्यक्तित्व तनी कमजोर दिखाई पड़त बा. जाहां तक मीर के सवाल बा उहां के आपन जीवन में कभी समझौता ना कइनी. भूखे रह गइनी. पाई-पाई के मोहताज़ हो गइनी लेकिन आपन स्वाभिमान के कहीं गिरवी ना रखनी. दरबारो में रहनी त अपने शर्त पर.

इहां बात अपना समय-काल परिस्थिति पर शायर के नज़र के बा. ओकर जागरूकता के बा. सामयिकता के बा. समाज के साथ ओकर जुड़ाव के बा. एह मामिला में मीर गालिब से बहुते आगे देखाई पड़े लन. ई बात कहे के मतलब ग़ालिब के कद छोट करे के कोशिश नइखे. गालिब के शेरन में बहुते गहराई बा. कला के लिहाज से देखल जाए त ओकर कवनो जोर नइखे. उनकर शेर जेतना बार पढ़ब नया-नया माने निकली. उनकर कई गो शेर बा जेकरा पर उर्दू के विद्वानन के बीच अभियो बहस होखे ला. कहे के मतलब ई बा कि शायर के नज़र कल्पना लोक में केतना विचरण करत बा आ आपना आसपास के दुनिया से केतना मतलब रखत बा. ई शायर के व्यक्तित्व के समझे के एगो कसौटी होखे के चाहीं. देखल जाव त आजो उर्दू के बहुते शायर आपन रूमानियत से आगे ना निकल पावे लन. उहो पुरान जमाना के रूमानियत. देश-दुनिया से उनका कवनो मतलब ना रहे ला. उर्दू जेतना मीठ भाषा बा ओकर रचनाकारन के समाज से सरोकार राखे के चाहीं. रूमानी शायरी एतना हो चुकल बा कि ओकरा में कहे खातिं कुछ बाकी नइखे बचल. लेकिन ई बात कोई समझे के तैयार होखे तब त बात बने.
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