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भोजपुरी विशेष - जलुआ : मेहररुई दरबार के एगो जियतार स्वांग परिपाटी

भोजपुरी विशेष - जलुआ : मेहररुई दरबार के एगो जियतार स्वांग परिपाटी

बरात गइला के बाद पुरुष वर्ग से  खाली घर में रतजागा करे वाली महिला लोगन के आयोजन ह ई.

बरात गइला के बाद पुरुष वर्ग से खाली घर में रतजागा करे वाली महिला लोगन के आयोजन ह ई.

गांव के परंपरा के हिसाब से जब घर से सब पुरुष लोग बराति चल जाला त घर में खाली मेहरारू जाला लो. अइसना में आपन मनसाइन करेके खातिर आ सुरक्षा खारित रतिजगा करेला लोग. एहि में स्वांग होला एही के जलुआ नाम दिहल गइल बा.

कोरोना काल के शादी-बियाह एगो नए अंदाज में शुरू हो गइल बा. बेगर बैंड-बाजा आ बिना बरियात के बियाह. समाज में बदलाव का मद्देनजर अब बरियात में धड़ल्ले से लरिकियो - मेहरारू लोग जा रहल बा आ डीजे के धुन पर मेहरारुन के नाचो आम बात हो गइल बा. बाकिर किछुए बरिस पहिले ले अपना इहां ई परिपाटी ना रहे. बरियात में लरिका, बूढ़, जवान-सभके सभ मरदे जात रहे आ नारी के बरियात में जाए के मनाही रहे. जमींदारी आ सामंती राज में औरत के आबरू बचावे का दियानत से बुझिला अइसन होत होखे. नतीजा ई होत रहे कि सउंसे टोल-परोस भा गांव के गांव खाली हो जात रहे आ गांव में ओह रात बांचि जात रहे लोग मेहरारू आउर लरिकी. अइसना माहौल में घर-दुआर के रखवारी जरूरी रहे आ ओही खातिर रात-रात भर रतजगा होत रहे. ओह रतजगा के आकर्षण का केंद्र में होत रहे डोमकच.
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हंसी-ठिठोली भरल स्वांग
जलुआ - डोमकच, जवन कहीं-कहीं डोमकछ भा डोमकथो कहात रहे, एगो हंसी-ठिठोली भरल जियतार स्वांग होत रहे.ओह नाट्य कला के खूबी ई रहे कि मए स्वांग मेहरारू आ लरिकिए लोग अभिनीत करे आ उहां मरद-लरिकन के प्रवेश पर पाबंदी रहे.

ना कवनो मंच के जरूरत पड़े, ना कवनो खास साज सज्जा के. एह स्वांग में मरदन के खूब खिल्लियो उड़ावल जात रहे

आ अइसन कऽके मेहरारू लोग अपना दमित इच्छा के पूर्तियो करत रहे. पुलिस, दरोगा, डाक्टर, नर्स, मरद-सभ मेहरारुए बनत रहली आ खूब धांसू ऐक्टिंगो करे लोग. एने मेहरारू के दिन चढ़ल बा, पेट से बाड़ी ऊ. ओने मरद गांव छोड़िके परदेस जाए लागत बा.मेहरारू हाथ जोड़िके निहोरा करत बाड़ी-
पियऊ, ना जा तूं पुरुब का ओर,
पुरुब का देस में टोना बहुत बा,
पानी बहुत कमजोर!

बाकिर मरद भला काहें के माने जाउ! ऊ कलकत्ता चलि जात बा आ उहवां कवनो शहरी छोकरी के जाल में अझुरा के रहि जात बा. फेरु लरिका जनमे, नार काटे के स्वांग होता. अकेल औरत लरकोरी होके किसिम-किसिम के सांसत झेलत बिया.

गांव के लुच्चा-लफंगा ओकरा पर डोरा डालत बाड़न स. कतहीं पुरुष मानसिकता प करारा व्यंग, त कतहीं अकसरुआ औरत पर आवेवाली आफत-बिपत के मरम बेधेवाला चित्र. आगा चलिके भिखारियो ठाकुर एही कथ प 'बिदेसिया 'के सिरिजना कइलन. डोमकच के छोट-छोट टुकड़ा वाला स्वांगन में कतहीं मेहरारू के दुरदसा झलकत रहे, त कतहीं पुरुष प्रधान समाज के करतूत के झांकी. देखेवाली औरत ओह सभ में अपना जिनिगी के झलक पावत रहली. कबो-कबो नाटक के बात उन्हुका दिल में कचोटे लागल रहे.ओह घरी के समाज के ऐनक होत रहे डोमकच.

हर तबका के जोड़े के कोशिश
डोमकच कवनो इलाका में जलुआ का रूप में, कतहीं सामा-चकेवा के नांव से, त कतहीं जट-जटिन के तौर पर फइलल-पसरल रहे. एह स्वांग में हर तबका के जोड़े के कोशिश होत रहे. मूल कथा डोम-डोमिन के होत रहे. शादी-बियाह में डोम-डोमिन के अगहर भूमिको रहत रहे. चाहे डाल बनावे के होखे भा दउरा, सुपुली-मउनी बिनेके-ई कुल्हि काम डोमे -डोमिन करत रहे. एही तरी, एह स्वांग में कोंहार, कहांर, धोबी, हज्जाम, चमार, मुसहर-नेटुआ-सभ केहू के भूमिका पर स्वांग रचात रहे, काहेंकि एह सभके भागीदारी के बिना बियाह संभवे ना रहे आ एह लोग के स्वांग में अइसन केरिकेचर होखे कि देखे-सुनवाला लोग अचरज से भरि उठे. नतीजा ई होखे कि रात-रात भर डोमकच होखे आ केहू का आंखी नींन ना लागे. रतजगा कऽके अइसन मनोरंजन होखे कि कई दिन ले डोमकच के चरचा होखे.फेरु अगिला बियाह के रात के इंतजार होखे.

जियतार अभिनय
डोमकच में मेहरारू लोग बड़ा जियतार अभिनय करत रहे. बरियात में का-का खाए-पीए के मिलल, कतना मान-सम्मान आ सौगात भेंटाइल, एहू सभ पर हास- परिहास आउर व्यंग्य से लबरेज़ बतकही होत रहे.
हमरा डोमकच के एगो दृश्य आजुओ इयाद बा, जवन सभके अचरज में डालि देले रहे. एगो बरियात में सभ केहू चलि गइल रहे.एगो बूढ़ बाबा बांचि गइल रहलन. ऊ अपना पतोह लोग के बहुत परेशान करसु.
रात में जब ऊ सूतल रहलन, तलहीं एगो पुलिस आके जगावे लागल. उठिके बइठत कहीं कि लागल डांटे, 'ऐ बूढ़ाबाबा! तू अपनी बहुओं को गारी-फजीहत करता है! तुम्हारी बहू की शिकायत मिली है.चलो थाने! तुमको दरोगाजी ने बुलाया है.चल, उठ!' 'मगर सरकार, हम त... '

'चलो थाने! वहीं चलकर अपनी बात कहना!' बाबा के त बुरा हाल रहे. ऊ सचहूं थाना का ओरि चलि दिहलन. जब डेराइल पाछा चितवसु त डांट मिले-'पीछे क्या देख रहा है?चुपचाप आगे बढ़ो!' फेरु त ऊ चुपचाप गांव का बहरी निकलि गइलन. जब पाछा मुड़लन, त उहां केहू के ना देखिके चिहा गइलन. तलहीं मन परल,अच्छा! ई डोमकच वाली मेहरारू रहलि हा!ढेर दिन ले ओह स्वांग के चरचा होते रहि गइल.

बाकिर आजु ना त ऊ स्वांग बांचल बा, ना ओइसन अभिनय करेवाली मेहरारुए बाड़ी. अब त सजल-धजल मेहरारू लोग बरियात के शोभा बढ़ावत डांस करत बा. मनोरंजन के अनेक साधन का चलते आजु डोमकच नियर जियतार स्वांग के परिपाटी के लोप हो गइल बा, बाकिर पुरनकी पीढ़ी के जबान पर अबहिंयो डोम-डोमिन के हंसी-ठिठोली से भरल संवाद आके गमगीनो माहौल के सरस आउर खुशनुमा बनाइए देला.

Tags: Article in Bhojpuri, Marriage

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