भोजपुरी में पढ़ें : माई के जिउवा गाई-अस, पूत के जिउवा कसाई-अस!

माता से बढ़ि के केहू के स्थान ना होला.
माता से बढ़ि के केहू के स्थान ना होला.

पूत कपूत भलहीं हो जासु, बाकिर माता कुमाता कबहूं ना हो सकेली. नव महीना ले कोखी में बोझा ढोवत, बीया के पउधा आ फेंड़ बनत ले, छाती के अमरित-रस से पटावत, खाद-पानी देत जवन महतारी अपना संतान बदे आपन सभ किछु गंवा-लुटा देली.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 23, 2020, 1:04 PM IST
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हाले में हमनीं के दुर्गा माई के नव गो रूप के उपासना कइनीं हां जा आ अब लछिमी माई आउर काली माई के पूजन के तेयारी में लवसान बानीं जा. दरअसल महतारी के बिना सृष्टि के सपनो में कल्पना नइखे कइल जा सकत. एगो पत्रिका जब परिचर्चा में ई सवाल कइलस कि भोजपुरी सुनते हमरा तुरंत का मन परेला, त हमार जवाब रहे—माई. महतारी हमरा के जनम देके जिनिगी देले रहली आ उन्हुका दूध के महतारी भाषा हमरा जिनिगी के जियतार बनावत रहेली. सांच पूछल जाउ, महतारी आ महतारी भाषा में बहुत गहिर-गझिन संबंध-सरोकार रहल बा. दुनिया में सभसे पावन आ महान जेकरा के मानल गइल बा, ऊ हऽ माई, मातृभूइं आउर मातृभाषा.

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बाजारवाद के असर
तथाकथित भूमंडलीकरण-बाजारवाद के एह दौर में मानवीय मूल्यों आउर रिश्तो-नाता के धन-दउलत आ मतलब के तरजूई पर जोखल जा रहल बा. नेह-नाता में जतना गिरावट आजुकाल्ह आइल बा, ओइसन साइते कबो आइल होई. आजु सभसे अधिका उपेक्षित, अपमानित आ जर्जर बुजुर्ग बाड़न आ ओहू में महतारी के तौहीन सर्वाधिक चिन्ता-चिन्तन के विषय बा. पूत कपूत भलहीं हो जासु, बाकिर माता कुमाता कबहूं ना हो सकेली. भोजपुरी हलका के एगो मशहूर लोकोक्ति हऽ--'माई के जिउवा गाई-अस, पूत के जिउवा कसाई-अस!'
लोककथा में माई


एह बिसे में एगो नामी लोककथा कहात आइल बा. एगो मेहरारू अपना मरद के इम्तिहान लिहल चहलस कि ऊ केकरा के बेसी परेम करेला--अपना मेहरारू के, आकि अपना माई के? ऊ अपना मरद से कहलस कि अगर ऊ ओकरा से सांचो पियार करेला, त अपना माई के करेजा ले आके ओकरा के देउ! मेहरारू के बहकावा में आके निरदई मरद आस्ते से अपना माई के कतल कऽ दिहलस आ करेजा काढ़िके
हुलसत मेहरारू का लगे ले जाए लागल. तलहीं ओकरा एगो पत्थल से ठेस लागल आ ऊ मुंहें का भरे गिरि परल .ओही घरी माई के करेजा से दु:ख जतावत आवाज आइल-'बेटा! हमार बाबू! कतहीं चोट त ना आइल?' आ मेहरारू के परेम में पगलाइल ओह आन्हर जवान के आंखि खुलि गइल.

माई के करेजा बेधत नवजवान
आजु देश के कतने नवजवान मेहरारू भा दउलत के निसा में अपना गाइ-अस महतारी के करेजा काढ़त बाड़न भा ओकरा के टुकी-टुकी करत बाड़न, बाकिर देस-विदेस में बसल अपना बचवन खातिर माई के बाया ओइसहीं छछनत-तरसत रहेला. जवन माई अपना अनबूझ बबुआ-बबुनी के मूत से तर बिछवना के अपना ओरि कऽके उन्हुका तरफ सूखल कपड़ा रात-रात भर बदलत रहेली, जवना से कि ओह लोग के ठंढ मत लागे पावो, ऊहे बबुआ लोग माई के ओल्ड होम्स में भेजिके तड़पावे-छछनावे के नीखि दे रहल बा आ रोजे कई-कई बेरि मूवे खातिर अलचार करि रहल बा. कतना उदार,बाकिर कतना अलचार बाड़ी माई ! बेटी त महतारी के तकलीफ किछु हद ले बूझबो करेली, बाकिर कमासुत बबुआ लोग माई के असह दु:ख-दलीद्दर आखिर कब बूझी?

एगो लघुकथा कतहीं पढ़ले रहलीं .एगो माई अपना अबोध लरिका का साथे कतहीं जात रहली. ओही घरी बुढ़िया आन्हीं आ गइल. एगो पुल पार करे के रहे .माई घबड़ाके कहली-' बेटा, हमार हाथ धऽके चलिहऽ, हाथ छोड़िहऽ मत, ना त एह बरियार आन्हीं में किछऊ अनहोनी हो सकेला.'
बेटा अउर डेरा गइल .बाकिर ऊ तनी दीढ़ होके कहलस- 'माई! हमरा कमजोर हाथ के का ठेकान कि कब छूटि जाई! एह से तूहीं हमार हाथ थाम्हि लऽ, जवना से कि हम आ हमार हाथ छूटे मत पावो.' माई कड़ेर हाथ से बबुआ के हाथ थाम्हि लिहली, बाकिर माई के बुढ़ाते बेटा निछोहीं घावे आपन हाथ छोड़ा लिहले .बेसहारा माई बस चारू ओरि चितवते रहि गइली.

नव महीना ले कोखी में बोझा ढोवत, बीया के पउधा आ फेंड़ बनत ले, छाती के अमरित-रस से पटावत, खाद-पानी देत जवन महतारी अपना संतान बदे आपन सभ किछु गंवा-लुटा देली, ओह बदनसीब माई के किछऊ पावे के हक नइखे?

'गबरघिचोर' में माई
भिखारी ठाकुर अपना नाटक 'गबरघिचोर'में मातृशक्ति के भावुक तसवीर उकेरले बाड़न. जब औलाद के काटिके तीन हिस्सा में बांटेके बात आवत बा, त मरद लोग भलहीं तेयार हो जात बा, बाकिर महतारी अपना दिल पर पत्थर राखिके कहत बाड़ी कि उन्हुका बेटा के देह पर आरी मत चलवावल जाउ आ केहू एके अदिमी के सोगहगे दे दिहल जाउ .एह से साबित होत बा औलाद खातिर दरद आ मोह-माया महतारिए में होला, केहू अउर में कबो ना.

शिवाजी आ गांधीजी के मां के योगदान
माई अपना पियार-दुलार से, मीठ डांट-फटकार से संतान के सर्वांगीन विकास में सहायक होली, सांस्कृतिक बोध करावेली आ सुसंस्कार देके कपूतो के सपूत बनावेली .अगर शिवाजी के महतारी रामायण-महाभारत के कथा सुना-सुनाके सदाचार के सीख ना देले रहिती, त का ऊ छत्रपति शिवाजी महाराज बनि पइतन? मोहनदास के गान्हीं, महात्मा आ राष्ट्रपिता बनावे के मूल में उन्हुका महतारी के भूमिका का कबो भुलाइल जा सकेला?
माई मरियम से लेके मदर टेरेसा ले ममतामयी-करुनामयी महतारिए के त रूप-प्रतिरूप झलकत बा. आजु ओह मातृशक्ति के महातम के चीन्हे आ उचित मान-सम्मान देबे के निहायत जरूरत बा, काहें कि एगो महतारी के शिक्षित भइला पर समूचा परिवार शिक्षित हो जाला .आईं, ओह माई के जिनिगी में खुशहाली ले आवे खातिर हरसंभव उतजोग कइल जाउ आ केहू के देखावे खातिर ना, सच्चा दिल से दुनिया में मौजूद एह एकलउत देवी माई के चरन में आ दिल में जगह बनावल जाउ-
'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता:
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनम:.'
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