भोजपुरी विशेष: स्वामी विवेकानंद के अद्भुत विशेषता

स्वामीजी जब स्कूल में पढ़त रहले तबे से उनुका में ई गुण विकसित हो गइल रहे. दू सौ- चार सौ पेज के किताब पढ़ल उनुका खातिर दस मिनट के खेल रहे. एक बार जवन किताब पढ़ि लेले उनुका दिमाग में ऊ हमेशा खातिर अंकित हो जाले.

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  • Last Updated: October 15, 2020, 3:06 PM IST
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स्‍वामी विवेकानंद के बारे में एगो घटना सुनीं. एगो पुस्तकालय से पढ़े खातिर ऊ हजार पेज के एगो किताब मंगवले. एक घंटा का बाद ऊ किताब पुस्तकालय में लौटा दिहले. पुस्तकालय के इंचार्ज (लाइब्रेरियन) चकित. अरे भाई स्वामीजी ई किताब पढ़ि लिहले का? स्वामी विवेकानंद के आदर से आजुओ स्वामीजी कहल जाला. एह लेख में भी अब उनुकरा बारे में स्वामीजी कहिके लिखल जाई. त किताब ले जाए वाला आदमी कहलसि कि हं, स्वामीजी कौनो किताब एक घंटा में पढ़ि लेले. लाइब्रेरियन कहले कि अरे भाई, ई किताब हमहूं पढ़ले बानी. हमरा त पढ़े में एक महीना लागल रहे. जबकि हम रोज एके डूबि के पढ़ीं. किताब जमा क के अगिला दिने लाइब्रेरियन स्वामीजी के निवास स्थान पर पहुंचले. स्वामी जी लाइब्रेरियन के बोलवले आ आवे के कारन पुछले. लाइब्रेरियन आपन उत्सुकता जाहिर कइले.

स्वामीजी के आश्चर्य भइल. लाइब्रेरियन से कहले कि एमें आश्चर्य के कौन बाति बा? जब रउवां एह किताब के पढ़ले बानी त कौनो प्रसंग हमरा से पूछीं. लाइब्रेरियन संकोच करत कई गो प्रश्न पुछले. स्वामी जी किताब में छपल हू-ब-हू बात बता दिहले आ ओकर व्याख्या भी क दिहले. सांझि हो गइल रहे. लाइब्रेरियन जब अपना घरे लौटे लगले त रास्ता में स्वामीजी के एगो भूतपूर्व स्कूल टीचर मिलि गइले. जान- पहिचान के कारन हालचाल भइल. लाइब्रेरियन स्कूल टीचर से आपन आश्चर्य के बाति बतवले. स्कूल टीचर कहले कि स्वामीजी जब स्कूल में पढ़त रहले तबे से उनुका में ई गुण विकसित हो गइल रहे. दू सौ- चार सौ पेज के किताब पढ़ल उनुका खातिर दस मिनट के खेल रहे. एक बार जवन किताब पढ़ि लेले उनुका दिमाग में ऊ हमेशा खातिर अंकित हो जाले.

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स्वामीजी जब युवावस्था में अपना गुरु रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में अइले त गुरु उनुका से भगवान के बारे में खूब रुचि से बात करसु. स्वामीजी के ओह घरी घर के दीहल नांव रहे नरेंद्र. स्वामीजी अपना गुरु से पुछले- “रउवां भगवान के देखले बानी?” रामकृष्ण परमहंस कहले- “हं देखले बानी. ठीक ओही तरे भगवान के देखले बानी जइसे तोहरा के देख तानी.” स्वामी जी पुछले- “हमहूं देखि सकेनी?” त गुरु कहले- “बिल्कुल देख सकेल. बाकिर ओकरा खातिर साधना करे के परी. ऊ साधना तोहरा के हम सिखाइब.” गुरु के देखरेख में स्वामीजी कठिन साधना कइलन आ भगवान के साक्षात दर्शन कइलन. स्वामीजी 11 सितंबर 1893 के दिने शिकागो (अमेरिका) में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में जब भाषण दिहले त पूरा दुनिया में उनुकर चर्चा भइल.
स्वामीजी अपना भाषण में कहले कि हमरा गर्व बा कि हम ओह धर्म के प्रतिनिधित्व करे आइल बानी जवन सहिष्णुता आ सार्वभौमिक स्वीकृति के पाठ पढ़ावेला. जवन कुल धर्म आ देश के सतावल लोगन के शरण देला. भगवद्गीता के उदाहरण देके कहले कि भगवान कृष्ण कहले बाड़े कि, जे हमरा लगे मन- प्राण से आवे के ठान लेले बा, चाहे ऊ कइसनो होखो, हम ओकरा लगे पहुंचि जानी. जइसे अलग- अलग नदी कहां- कहां से आके समुद्र में समा जाली सन, ओही तरे अलग- अलग धर्म के एक ही उद्देश्य बा- ईश्वर में मिलि गइल. धर्म के माने होला प्रेम, सौहार्द्र आ गरीब, लाचार के मदद. स्वामीजी के अपना देश भारत आ भारतीयता पर गर्व रहे. स्वामीजी के सबसे बड़ योगदान बा वेदांत दर्शन के आम आदमी के भाषा में व्याख्या.

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आज भी उनुकर स्थापित कइल- “रामकृष्ण मठ एवं मिशन”,“वेदांत सोसाइटी” आ उनुका भक्त लोगन के गठित संस्था- “विवेकानंद समिति”अमेरिका में पूर्ण सक्रिय बिया. अपना देश में भी ई कुल संस्था मूल वेदांत के व्याख्या प्रभावी ढंग से कर रहल बाड़ी सन. वेदांत सोसाइटी के स्वामी सर्वप्रियानंद के वीडियो आजुओ “यू ट्यूब” पर खूब देखल जाला. हालांकि वेदांत दर्शन के व्याख्या के शुरुआत आदि शंकराचार्य कइले. बाकिर 32 साल के उमिर में उनुकर देहांत हो गइल. ओही वेदांत परंपरा के आगे बढ़वले स्वामीजी. वेदांत के उनुकर बनावल संस्था दुनिया भर में फइला रहल बाड़ी सन. काहें से कि स्वामी विवेकानंद के 39 साल के उमिर में देहांत हो गइल. त ई दुनिया के सर्वश्रेष्ठ काम में से एगो बा. हमनी नियर साधारण आदमी जनबे ना करित कि वेदांत का कहाला आ वेदांत में का बा. वेदांत के व्याख्या का ह. एकर श्रेय स्वामी विवेकानंद के जाता.

स्वामी विवेकानंद व्यक्तित्व बहुत आकर्षक रहे. विदेश में जब ऊ व्याख्यान देबे गइल रहले त एगो मेहरारू कहलस कि स्वामीजी हमरा से बियाह कलीं. स्वामी विवेकानंद कहले कि काहें? मेहरारू कहलसि कि हमरा रउरे नियर एगो बेटा चाहीं. त स्वामीजी कहले कि हम एगो सन्यासी हईं, तूं हमरे के आपन बेटा बना ल. आजु से तूं हमार महतारी भइलू आ हम तहार बेटा. समस्या हल हो जाई. ऊ मेहरारू निरुत्तर हो गइल. एहीतरे एगो अउरी घटना बिया. एगो धनी- मानी आदमी किहां ऊ कौनो काम से गइले. ओकरा बइठका (जवना के आजकाल ड्राइंग रूम कहल जाता) में बइठल रहले. धनी- मानी आदमी निराकार ब्रह्म के मानत रहे. ऊ साकार ब्रह्म के खूब खिल्ली उड़वलसि. ओकर इशारा स्वामीजी के ओर भी रहे कि स्वामीजी भी अपना गुरु के मूर्ति के पूजा करेले.

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ऊ कहलसि कि माटी आ पत्थर के भगवान के रूप में पूजा त हास्यास्पद बा. माटी में भगवान बाड़े? जे अइसन करेला ऊ अज्ञानी बा. स्वामीजी ओकर बाति बड़ा शांति से सुनले. ऊ अदिमिया जहां बइठल रहे ओकरा पीछे के देवाल पर एगो बड़ आदमी के चित्र टांगल रहे. स्वामीजी पुछले कि ई केकर चित्र ह? ऊ आदमी कहलसि कि हमरा पिताजी के. त स्वामीजी कहले कि एह चित्र के उतारीं. चित्र उतारल गइल. स्वामीजी तर्क करे वाला आदमी से कहले कि एकरा पर थूकि दीं. ऊ आदमी खिसिया गइल. कहलसि कि स्वामीजी रउवां पागल हो गइल बानी का? हम अपना पिताजी के चित्र पर कइसे थूक सकेनी? स्वामीजी कहले कि महराज ई त एगो कागज पर बनावल रंगीन चित्र ह. ई त राउर पिताजी ना हउवन. त ऊ आदमी कहलसि कि हमरा पिताजी के चित्र हमार पिताजी के समान आदर के पात्र बा.

त स्वामीजी कहले कि एही तरे माटी या पत्थर के मूर्ति भगवान के रूप मानि के भक्त पूजा करेले सन. जइसे ई चित्र रउरा पिताजी के प्रतीक बा आ ओतने आदर के पात्र बा, ओही तरे माटी चाहे पत्थर के मूर्ति भगवान के प्रतीक बा. एकर उपहास उड़ावल नादानी बा. भगवान त कण- कण में बाड़े. ई कहल कि हेइजा बाड़े आ हेइजा नइखन, अज्ञान बा. तर्क करे वाला आदमी स्वामीजी के सामने नतमस्तक हो गइल.
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