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पीड़िया के भोजपुरी गीत - कवन फूलवा फूलेला अधि अधि रे रतिया

पीड़िया के व्रत करे वाली बहिनि सब किसिम-किसिम के अल्पना-डिजाइन बनावत रहे लोग.
पीड़िया के व्रत करे वाली बहिनि सब किसिम-किसिम के अल्पना-डिजाइन बनावत रहे लोग.

पीड़िया के ढेरे लोग भुला गइल बा. भाई-बहिनि के प्यार के एह तेवहार पर राखी भारी परि गइल बा. दुनियाभर में जाहां आपना परंपरा के खोज में समाज जुटल बा, हमनीं के भुलात जानीं बा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 15, 2020, 1:20 PM IST
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पूरबी उत्तर प्रदेश, बिहार आउर झारखंड के गांवन में आजु बहिनि लोग पीड़िया के व्रत कइले बाड़ी. भाई-बहिनि के तेवहार राखी के कथा-कहानी से इतिहास भरि गइल बा. सिनेमा के भी एह तेवहार से ढेरे छोह बा. बाकिर कमे लोग जानता कि पीड़िया का होला. भारतीय समाज में भाई-बहिन के प्यार के देखे होखे त एह तेवहार के गीतन के सुने के परी.

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लंबी परंपरा
खेती-किसानी के परंपरा संगे भारतीय समाज आपन विकास यात्रा जारी रखले बा, एह वजह से हर तेवहार में ओह समय के खेती-किसानी के चटख रंग गहराई से लउकेला. एह वजह से भारतीय तीज-तेवहारन में लोको के रंग खूबे बा. जानकार लोगन के कहनाम बा कि पीड़िया व्रत भी शास्त्रीय रूद्र व्रत के ही लोक रूप ह. जवना में भाई के बधाई खातिर बहिनि सब करीब एक महीना तकले अपना घर में अमावस्या, एकम, दूज के रात में गाय, बछरू भा बाछी के गोबर से पीड़िया लगावेली लोग.
पीड़िया एक तरह से गोबर के पिंडी घर के कवनो दीवार में लगावल जाला. एकर शुरूआत होला गोवर्धन के दिन, जवना के भोजपुरी समाज गोधन कहल जाला, जवन दीवाली के अगिला दिन मनावल जाला. गोधन के बारे में सब जानता. ओहि गोबर के ले जाके बहिनि सभ निर्धारित कवनो घर के दीवार में पीड़िया लगावेला लोग. जवना बहिनि के जाताना भाई होला, ओतना ऊ पीड़िया दीवाल में लगावेला लोग. एह पीड़िया के रूप ओइसने होला, जइसन यज्ञ-उपनयन में शंकर भगवान के पिंड रूप में बनावल जाला.


पीड़िया लगावत खानी लइकी सभ खास किसिम के गीत गावेला..जइसे
कवन फूलवा फूलेला अधि अधि रे रतिया
पछिलि भइली रतिया
कवन फूलवा फूले भिनसार ए हरि
चंपा फूलवा फूलेला अधि अधि रतिया
पछिलि भइली रतिया
बेइल फूलवा फूले भिनुसार ए हरि
कवन भइया जागसु अधि अधि रे रतिया
पछिलि भइली रतिया

प्रेरक कथा
पीड़िया लगावे वाली बहिनि सभ गोवर्धन पूजा के दिन से कार्तिक के पूर्नवासी के दिन तक के छोटकी कहानी सुनेला लो..ओकरा बादे मुंह धोवे ला लोग. पीड़िया करे वाला लइकी सभ जब ले कहानी ना सुनि लेला लोग, तब ले चाहो ना पियेला लोग, खाना-नास्ता त बाद के बात बा.
छोटकी कहानी घर-परिवार के कवनों बूढ़-पुरनिया सुनावेली. ई कहानी ठेठ भोजपुरी में बा.. जवना में दूगो सखी के कहानी बा... एह कहानी के एगो सखी जहां भांट के बेटी हइ त दोसरकी राजा के बेटी यानी राजकुमारी हई. एह कहानी के शुरूआत होला. - राज की बिटिया, भांट की बिटिया दूनों जानी पीड़िया लवली हा, केहू अड़ार कोन, केहू भंड़ार कोन.

कहानी में राजकुमारी हर दिन काथा सुने के पहिले मुंह जुठिया लेली आ भांट के बेटी रोज कहानी सुनेली.एकर असर ई होला कि भांट के भाई पर कवनो खातारा ना होला. जबकि राजकुमारी के भाई पर खतरा आ जाला. ई कहानी आखिर में संदेस देले कि राजकुमारीयो जब कथा सुने लागेली त उनुका भाई पर आइल खतरा टलि जाला.. अगहन के अन्हारा यानी कृष्ण पक्ष के एकम के दिन से छोटकी कहानी के जगहि बड़की कहानी ले ले. एहू में दूगो सहेली के काथा बा. जवना में एगो रानी हई आ दूसरकी दासी हई. छोटकी कहानी नियर रानी के बच्चा मरि जाला आ दासी के बच्चा सब जियाछ हो जाला. एह कहानी के शुरूआत अइसे होला.  - अमवसा के राति ह, परूआ के दिन ह, गाय-डाढ़ि लावेनी, भइंसी पखेइनीं..

चूंकि रानी कहानी सुने से पहिले मुंह जुठिया लेली त उनुकर बच्चा सब मरि जाता, जबकि दासी हर काम के पहिले काथा सुनेली त उनुकर बच्चा जियाछ होला.एहू कहानी के संदेस बा कि जे कथा सुनेला, सरधा राखेला, ओकरे बाल-बच्चा, भाई जियाछ होला. ओकरे बढ़ंती होला.

भाई के बधाई और खुशहाली के तेवहार पीड़िया में बहिनि सब आपाना भाई के संख्या के हिसाब से पीड़िया लगावेला. पीड़िया लगावत खानी जवन गीति ऊ लोग गावेला ओह में लोक के रंग आ दैनिक जीवन के संघर्ष भी खूबे बा.जइसे एह गीत के देखीं.
कवन बहिना जागसु भिनुसार ए हरि
पूरूब जइह भइया पछिम जइह
ले अइह ए भइया टिकरी मिठइया
नइखे मिलत ए बहिनि टिकरी मिठइया
पुरूब गइनी बहिनि पछिम गइनीं
जनि भूख ए बहिनि पीड़िया बरतिया
कइसे छोड़िं भइया तोहरे बरतिया
मंगिया के जुड़ हउए, कोखि के जियछिया
ई त हउए तहरो बरहिया

अगहन के अन्जोरा यानी शुक्ल पक्ष के दिन जवना घर में पीड़िया लगावल जाला, ओकरा आंगन के लिपाई-पोताई होला. दीवार पर चित्रकारी होला.तीस-चालीस साल पहिले माटी के घर-दीवार होत रहल हा. त ओकरा के पहिले लिपाई होत रहे, फेरू दीवाल पर चूना पोति के ओकरा पर एगो खास किसिम के झाड़ के पत्ती के पीसि के ओकर हरियर रंग के पोताई होत रहे. ओकरा बाद ओह पर पीड़िया के व्रत करे वाली बहिनि सब किसिम-किसिम के अल्पना-डिजाइन बनावत रहे लोग.

ओह दिन लइकी सब व्रत करेला लोग. व्रत में एक बार दुपहरिया बाद रसियाव खाइल जाला. ई रसियाव नवका गुड़ आ चाउर से बनेला. जवना गांव में उखि होला, उहवां उखि के रस यानी कचरस में ई रसियाव बनेला.

ओह दिन व्रत वाला लइकी सब सजे-संवरेला लोग. भाई के ओरि से बहिनि के एह दिन आपाना सामर्थ्य के हिसाब से कपड़ा-गहना के उपहार मिलेला. एह दिन खासतौर पर बहिनि खातिर चिउरा-मिठाई खरीदाला. अगर बहिनि बियाह के बाद ससुरा चलि गइल बाड़ी त उनुका ससुरा ई सब जाला. व्रते के दिने महीना भर से लागल पीड़िया के छोड़ावल जाला. एह मोका पर एगो गीति देखीं. एह व्रत आ भाई के बेहतरी खातिर बहिनि के चिंता आ प्यार का होला, एह गीति में देखे के मिली. बियाहुत बहिनि के पीड़िया के ही दिने ससुरा से बोलावा आवता त ऊ कइसे चिंतित हो तारी..देखीं एह गीत में..
लावे के त लवनी पीड़ियावा
राम छोड़ावहिं के बेरिया
असकहिं ससुर अकुतइल हो
राम छोड़ावहिं के बेरिया
भेजि दिहलन एकम दूजि दिनवा हो
राम छोड़ावहिं के बेरिया
असकहिं अकुतइल हो राम
छोड़ावहिं के बेरिया

एह गीत में बहिन के दर्द देखीं. आ राउर आंखि में लोर ना आ जाइ त कहीं. पीड़िया के व्रत की रात को व्रती बहन सभ जागरण करेली लोग. एह जगराता में भी भाई-बहिनि के प्रेम कइसन बा, भाई, बहिन खातिर काताना चिंतित बा, एह गीत में देखीं. एह गीति के राति खा जगराता में
बहिन सभ गावेला लोग.
सांझ के पहरा, सुरूज जाले बहरा
उगहु ए सुरूज, बारब दियरा
उगे के त उगबो फलाना भइया के अंगना
सांझ के पहरा, सुरूज जाले बहरा

ओकरा बाद पीड़िया के भिनुसारे एगो दउरी में रखि के दहवावे ले जाइल जाला. ओके कवनो भाई के कपार पर धइ के ले जाइल जाला. ओह खातिर भाई के नेग मिलेला. पीड़िया गांव के पोखरा भा गांव के लगे वाली नदी में दहवावल जाला. दहवावे जात खानीं आगे-आगे दउरा लेके भाई चलेला आ पीछे-पीछे व्रती बहिन सभ. आ गीति गावत जाला लोग.
नदिया किनारे धोबिया लुगा धोवे जाले
मलहवा नइया खेवले से
केकरि बहिनिया दहल जाली ए हरि
रोवलन फलाना भइया मुख धरि गमछिया
हमरी बहिनिया दहल जाए ए हरि
हंसल फलाना जीजा मुख धरि गमछिया
फलाना के बहिनिया दहलि जाली ए हरि

पीड़िया के ढेरे लोग भुला गइल बा. भाई-बहिनि के प्यार के एह तेवहार पर राखी भारी परि गइल बा. दुनियाभर में जाहां आपना परंपरा के खोज में समाज जुटल बा, हमनीं के भुलात जानीं बा. बाकिर उमेद बा कि जइसे-जइसे हमनीं के आपन जरि के खोज में आगे बढ़बि जा, आपन संस्कृति के पीड़िया जइसन चटख रंग सब यादि आवत जइहें स.
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