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भोजपुरी में पढ़ें – भोजपुरिया किस्सा कहानी में पूरा संस्कृति होला

लोक के संरक्षण कहां कइल जा सकेला?
लोक के संरक्षण कहां कइल जा सकेला?

बचपन में बड़-बूढ़ से जवन किस्सा कहानी सुनल जात रहल हा वो से संस्कार बनत रहल हा. ओकरा से लोक चेतना व्यक्ति तक पहुंचत रहल हा आ व्यक्ति के चेतना फेर लोक के योग्य बनत रहल हा. इ धरोहर ह आ एही के बचवल क जरुरत बा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 4, 2020, 1:04 PM IST
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कहनी - खीसा गवईं समाज में मनोरंजन कईले आउर संस्कार के आगे बढ़वले क सबसे मजबूत आधार रहल ह. एकरा में मनई क तजुर्बा रहले की कारन एकर बहुत महत्व बा. तजुर्बा रहले की कारन एतना तकनीक अयिले की बादो एकर महत्व कम ना भईल ह. दुनिया में केतना खीसा सुनावे वाला लोग हवें जवन नद्दी की किनारे, पेड़ की छाह में, खेत की मेढ़ा पर बईठ के खीसा कहत रहलन जा आउर आज सालों बाद भी उनहन लोगन क नाम ह. लेकिन अपनी देश में खीसा कहे वाला कबहूं ओह स्तर पर ना जा पउलन जा. कारन इहे ह कि उनकरा कहनी क महत्व बतावल ना गईल. केहू समझवले/जनले क प्रयास ना कईलस. जे कहनी/बुझनी गढ़े क काम कईलस ओकरा के कवनो जिम्मेदारी ना मिलल आउर जे जिम्मेदारी लिहलस उ कबों कुछ कय ना पउलस.

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दुनिया में लोक के महत्व

दुनिया भर में लोक के देखब त भारत में लोक क महत्व ओतना ना होखे पउलस जेतना की जापान, खाड़ी क देश, पूरा यूरोप आउर रूस जईसन देश में ह. ये देशन में आप देखब की बड़े-बड़े विश्वविद्यालय में एह विषय क पढ़ाई होले. एसे उहाँ पीढ़ी बदलले की बादो जवन धरोहर क मूल स्वाभाव ह उ ना बदलल ह. एतने नाही, नई पीढ़ी तरह-तरह क प्रयोग कईके ओकरा के समय की संग्हे ले चलत ह. भारत में इ ना भयल, एसे की एकरा के बचावे खातिर कवनों संस्था कायम ना हो पउलस. बंगाली आउर मराठी छोड़ देहीं त भारत की बाकी बोली बानी क लोग अब गयल, तब गयल की हालत में ह. खासकर हिंदी की सहोदर बोलियन क हालत ढेर ख़राब हीय. एसे की येह क्षेत्र में सुनियोजित आउर संस्थागत प्रयास ना भईल. जवन संस्था बनलीं सो ओकरा में काम करे वाला लोग अईसन जुड़लन जा कि उनहन लोगन के अपना गियान की आगे केहू क कुछ आउर ना देखायल. कईगो संस्था त जाति आउर परिवार की बहरे सोची ना पउलिन स. अईसन हालत में ‘लोक’ बिलाय गईल आउर जिन लोगन से ओकरा के बचवले क उम्मीद रहे उ लोग तमाशा देखत आउर अपनी महिमा क माला पहिनत रह गईलन जा.
आप सब त जानी लां की धर्म से लेके कवनो आउर परम्परा तक के बचवले क प्रयास सुनियोजित ह. मतलब की कवनो व्यक्ति / संगठन आउर संस्था की प्रयास से ओकरा के बचावल गयल ह. अयिसहीं शास्त्रीय गायन के घराना बचवलस. जेतना नचले क कला ह, सब कवनों न कवनों घराना क धरोहर ह. कहीं कहीं त एगो कला के बचावे खातिर कईगो घराना आउर संस्थान काम करत हवन सो. इ बात माने के परी की तरीके से बचवले क प्रयास ना भईल रहल होत त आउर घराना संस्कृति ना विकसित भईल होत त शास्त्रीय संगीत/नृत्य आज लोक शैलीयन मतीन उभचुभ करत रहत. आज शास्त्रीय संगीत क जवन स्थिति देखे के बनत हिय ओमे सुनियोजित आउर संस्थानिक प्रयास क भूमिका ढेर ह.
सुनियोजित प्रयास के देखीं त एगो बात आउर ह. गायन, वादन और नचले क जेतना शैली हईं सो, ओकर कहीं न कहीं पढ़ाई-लिखाई होखे ले. गंधर्व महाविद्यालय आउर प्रयागराज क संगीत महाविद्यालय जईसन कईगो संस्था उत्तर भारत में जिम्मेदारी उठवले बाड़ी सो. देश की कईगो विश्वविद्यालय में शोध से लेके छात्रवृत्ति तक क सुविधा हवे. लेकिन इ ताज्जुब ह की लोक की एकहू शैली क कहीं कवनों संरक्षण ना ह. नाम खातिन कुछ रद्दी सरकारी संस्था जरुर काम करत हईं सो, लेकिन उनकरा बनले से लेके आज ले उहाँ खानापूर्ति से ढेर कुछ देखे के मिलल ना ह. ओकर बड़हर कारन इ ह कि लोक में जे जियत/करत रहे, लिखत-पढ़त रहे, गावत-बजावत रहे, ओकरा के कहीं जिम्मेदारी ना देहल गईल आउर जे जिम्मेदारी लिहलस उ उहाँ नोकरी कईले से आगे ना बढ़ल.

लोक के पढ़ाई हो सकेला?

इ कहे में कवनो संकोच ना ह कि लोक में जवन कुछ बचल बा, देखात बा उ एकाधगो मनई क आपन मेहनत हिय. संग्हे संग्हे इहो कहल जा सकेला कि कुछ लोक प्रेमी लोगन की पहल पर बनल संस्थान, जईसे कि राजस्थान में रूपायन, छत्तीसगढ़ में नया थिएटर खूब काम कईले बा. इ लोग उहाँ प्रचलित कथा कहानी के देश-दुनिया में फयिलवलन जा. एसे इ कहल जा सकेला कि कुछ लोग अपनी मेहनत, लगन आउर समझ की दम पर बढ़िया काम कईले बड़न जा. लेकिन आगे ले जाए खातिन आउर धरोहर बनावे खातिन सरकार क मदद ढेर जरुरी ह. सरकार जबले ना चाही तबले लोक की कवनो विषय के पढ़ल त जा सकेला लेकिन पढ़ावल ना जा सकेला.

आज स्थिति तनी बदल हिय. कुछ संस्थान में लोक के एक-दुई पेपर के रूप में पढ़ावल जात ह. लेकिन इ प्रयास बहुत कम ह. एसे की कहावत हिय कि, ‘जवन लोक में ना ह, उ कहीं ना ह.’ अब एतना बड़ीयार विषय के एक दुई कक्षा में पढ़ावल मतलब की खानापूर्ति से ढेर कुछ ना ह. जरुरत हिय लोक पर अलग से शोध करे खातिन संस्थान खोलले क. ओकरा समझे जाने वालन के एक जगह जुटावल जाई त भारतीय कथा/कहनी क मोती निकल के बहरे आई. खोजबीन में बहुत कुछ अईसन मिली जवन अबले ना मिलल ह. एसे लोक त बढ़बे करी, भारतीय साहित्य आउर अमीर हो जाई.

लोक के संरक्षण के जरुरत

आज कई कारन से उम्मीद जगत बा. जईसे कि जबसे तकनीक आईल बा तबसे काफी कुछ नया देखेके मिलत ह. एगो त इहे बात बा कि एकरा कारन संस्थागत दलाली घटल हिय. बिचवलिया गायब होत बड़न सो आउर एगो सामान्य अदमी, जवन लोक के जियत ह, गावत ह, लोक के ओढ़त/पहिरत ह, ओकर आवाज़ लोकप्रेमी मनई ले पहुंचे लागल बा. विविधता से भरल एही देश में पांच-दस गो शास्त्रीय गायन/वादन से कईगुना जियादा लोक कला हईं सो. लेकिन उनहन क प्रचार-प्रसार आउर संरक्षन क प्रयास ना भईले से दुनिया उनकरी बारे में कुछ ना जाने ले. उ कवनो एरिया-जवार से आगे ना जा सकलिन सो. अईसन ना ह कि उनहन के बनावे/बढ़ावे वाला केहू त्यागी/तपस्वी ना मिलल. बल्कि उनहन लोगन के ठीक से संरक्षण ना मिलल. अब जरुरत बा की हर बोली-भाषा में खोजल आउर सम्हार के रखल वाला काम आगे बढ़वल जाव.
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