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भोजपुरी विशेष - बनारस रफ्तार में नाही रस में चलेला

भोजपुरी विशेष - बनारस रफ्तार में नाही रस में चलेला

सदगति के शहर बनारस के आपन गति ह अउर वही से ताल मिला लिहले पर रस मिलेला.

सदगति के शहर बनारस के आपन गति ह अउर वही से ताल मिला लिहले पर रस मिलेला.

इ बनारस हौ भइया. भीड़ भड़क्का त हौ इहां, लेकिन एही में मजा ल. बंबई गयल हउवा कि नाही? जइसे उहां के लोकल में लोग धक्का क मजा लेलन, ओेइसय बनारस के समझ ला. तब बनारस क मजा पइबा.

बनारस के कबीरचउरा इलाके में पिपलानी कटरा पर पप्पू क अड़ी सबेरे सबेरे महल्ला के चहपियवन से जमल हौ. एही बीच दुकानी के भीतर बेंच पर बइठल दुइ नवजवान बे्रड-मलाई भिड़उले के बाद डकार लेत क कहत हयन, ’’वाह गुरु, मजा आपवार गयल. अइसन ब्रेड-मलाई नाही खइले रहली एकरे पहिले. काली क थकान मिटि गयल. सड़क पर चलब त नरक बा इहां. कमाल हौ यार, पता नाही इहां क लोग कइसे चलयलन. इहां त नौ दिन चले ढाई कोस वाली हालत बा.’’

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पप्पू कोइला के भट्ठी पर चाय उबालत हयन. चाय क इ अड़ी इलाके में प्रसिद्ध हौ. बनारस में अस्सी पर भी पप्पू क अड़ी हौ. दूनो पप्पू अलग-अलग हयन. लेकिन दूनो चाय ही बेचयलन. पिपलानी कटरा वाले पप्पू के अड़ी पर गरमी में लस्सी भी बिचाला. पढ़ाई के दौरान आपन निवास कबीरचउरा महल्ला में ही रहल. सबेरे क शुरुआत पप्पू के अड़ी से होय. तबला सम्राट गोदई महराज, किशन महराज से लेइके नामी कथक नर्तकी सितारा देवी तक से मुलाकात एही अड़ी पर भयल हौ. अब इ तीनों कलाकार दुनिया में नाही बायन, लेकिन सबकर स्मृति अबही भी दिमाग में मौजूद बा. पप्पू महल्ला में पप्पू भइया के नाम से मशहूर हयन. महल्ला क लोग दुकानी पहुंचतय खाली एतना भर कहियय -पप्पू भइया. बस उ समझि गइलन कि एन्हय चाय क कवन खुराक देवय के हौ. केहूं के कड़क, त केहूं के चीनी कम त केहूं के फीकी चाय चाहयला. पप्पू के दिमाग में सबकर पसंद दर्ज हौ.

सबेरे सबेरे पप्पू क चाय अउर चाय के बाद सड़क ओह पार छन्नू क पान घुलउले के बाद पंडित किशन महराज के अखबार लेइके ओही कुर्सी लगाइके बइठि जाय. कई सारा लोग ओनसे मिलय सबेरे ओही ठिअन पहुंचि जाय. बगलय में पंडित जी क घर भी रहल.

चाय - मलाई और अड़ी

पप्पू के अड़ी पर जब से चाय, ब्रेड-बटर के अलावा मलाई-ब्रेड क नाश्ता बिचाए लगल, तब से दुकानी पर भीड़ बढि गयल हौ. महल्लय में खुद क तबेला हौ, अउर सबेरे ताजा सुच्चा दूध दूहि के दुकानी पर आइ जाला. बड़ा से डेगा में दूध खउलल करयला, मलाई एक जगह जुटाइ लिहल जाला. जबतक ताजा मलाई क स्टॉक रहयला, बे्रड-मलाई बनयला. मलाई क स्टक खतम त फिर ग्राहकन के दूसरे दिना क इंतजार करय के पड़यला. एह के नाते ब्रेड-मलाई क मुरीद लोग सबेरय दुकानी पर धमकि पड़यलन. ब्रेड-मलाई पहिले महल्ला में प्रसिद्ध भयल, ओकरे बाद धीरे-धीरे एकर प्रसिद्धि महल्ला से बहरे कहां-कहां तक पहुंचि गयल, एकर हिसाब नाही बा. छोटे आकार क ब्रेड पहिले भट्ठी पर तबीयत से सेंकि जाला. सेंकला से ब्रेड कुरकुरा होइ जाला. ओकरे बाद ब्रेड के ऊपर ताजा सुच्चा दूध से निकलल ताजी मलाई क तह बिछावल जाला, बल्कि लादल जाला. कहय क मतलब ब्रेड पर मलाई बिछावय में तनी-सा भी कंजूसी नाही होत. अधिक से अधिक जेतना मलाई आइ जाय, ओतना. दिल्ली वाली हालत नाही हौ कि होटले में चावल मांगा त प्लेट पर फइलाइ के देइ देइहय, अउर बटोरि द त चार चम्मच से जादा चावल नाही रहत. ब्रेड पर भरपूर मलाई बिछउला के बाद ऊपर से चीनी क भुरभुरा. चीनी न चाही त पहिलय बताइ द. मलाई-ब्रेड तइयार, अउर मुंहे में पानी.

अंगरेजी क वरिष्ठ पत्रकार, सहकर्मी, मित्र एम.आर. नारायणस्वामी एक दइया हमरे संगे बनारस गइलन. बनारस क ओनकर पहिली यात्रा रहल. सबेरे क चाय पप्पू के अड़ी पर भयल. पहिले मलाई-ब्र्रेड, फिर चाय. नारायणस्वामी मलाई-ब्रेड खाइके उछलि पड़लन. चार दिना बनारस रहलन, हर रोज सबेरे मलाई-ब्रेड क नियम बनि गयल. ओकरे बाद उ कई बार बनारस गइलन. कुछ बार त हम साथे रहे, कुछ बार उ अकेलय रहलन. लेकिन जेतना बार उ बनारस क यात्रा कइलन, पप्पू क ब्रेड-मलाई अउर चाय नाही भूलइलन.

नवजवानन क अनुभव

अब वापस दूनो नवजवानन पर. दूनो नवजवान भी पहिली बार पप्पू के अड़ी पर पहुंचल रहलन चाय के तलाश में. मलाई-ब्रेड बनत देखि के आर्डर देइ देहलन. दूनो क पहिला अनुभव रहल. ब्रेड के साथ जब ओकर दुगुना मलाई गला के नीचे उतरल त नवजवानन क करेजा तर होइ गयल. अनायासय बोलि पड़लन कि “काली क थकान उतरि गयल. वाह बनारस.”

पप्पू क उमर ओह समय 25-30 के बीच रहल होई. काने में दूनो नवजवानन क अवाज गयल त चाय क पुरवा पकड़ावत क पूछि बइठलन, “का भयल भइया, आप लोग कहां से आयल हयन. बनारस पहिली बार आयल हउवा का?’’ ओहर से जवाब आयल, ‘‘हा भइया बनारस पहिली बार हौ. लेकिन शहर क जवन हालत बा कि इहां त चलब मुश्किल बा. काल सारनाथ से होटल तक आवय में पूरा तीन घंटा ट्रैफिक में धूर, धुंआ खाए के पड़ल. दिमाग पगलाइ गयल. एहसे कम समय में परसो इलाहाबाद से बनारस आइ गयल रहे. लेकिन तोहरे मलाई-ब्रेड से थकान दूर होइ गयल. अइसन मलाई-ब्रेड नाही खइले रहली. बनारस से सारा गिला-शिकवा दूर.’’

अब पप्पू क बारी, “का करबा, इ बनारस हौ भइया. भीड़ भड़क्का त हौ इहां, लेकिन एही में मजा ल. बंबई गयल हउवा कि नाही? जइसे उहां के लोकल में लोग धक्का क मजा लेलन, ओेइसय बनारस के समझ ला. तब बनारस क मजा पइबा. इहां कदम कदम पर मस्ती मिली आप के. रफ्तार चहबा त न मिली. बनारस अपने रस में चलयला. पुराना शहर हौ न. आदमी एतना बढ़ि गयल हउअन, कहां जइहय सब. बाबा विश्वनाथ क कृपा से चलत हौ बनारस. इहां आवा त टाइम लेइके आवा. कत्तौ जाए के होय त टाइम लेइके निकला. गाड़ी-घोड़ा शहर के बहरय छोड़ि द. अराम से मस्ती में घूमा. आजू क शहर थोरौ हौ इ, जब मोटर-गाड़ी नाही रहल तब क हौ. गंगा जी गइला कि नाही? जइह त पक्का महाल से होत गली-गली जइह. असली बनारस देखय क मिली. बनारस गली क शहर हौ. केतना दिना हउवा अबही?’’ पप्पू थोड़य में बनारस क बखान कइ देहलन. दूनो नवजवान जी जी करत चाय खतम कइलन, अउर अड़ी से निकलि गइलन.

बहरे से जाए वालन के बनारस क यातायात वाकई परेशान करयला. लोगन के आश्चर्य होला कि बनारस क लोग कइसे घरे से निकलयलन, कइसे कामकाज करयलन. एक जगह से दूसरे जगह जालन कइसे? लेकिन बनारस इ सारा सवाल के दरकिनार कइके जीवन जीयय क आदी होइ चुकल हौ. बनारस अपने रस में चलयला, बनारस क लोगन बदे जाम जीवन क हिस्सा बनि गयल हौ. जाम मतलब यातायात जाम, बोतल वाला नाही. बनारस में बोतल के बदले बूटी जादा छनयला. बनासी लोग जाम में भी मस्ती कइ लेलन. पीछे से गाड़ी में धक्का लगला पर भी लड़ाई-झगड़ा नाही. बस “वाह रजा, देखत ना हउवा, भिड़ाइ देत हउवा,’’ मुस्कियात क एतना कहि के आगे बढ़ि जालन. मस्ती ही बनारसी लोगन क असली पूंजी हौ. तबय त हर बनारसी कहयला -थोड़य खाय बनरसय रहय.

बनारस क यातायात सुधारय क बड़ी कोशिश भयल. शहर क भीड़ कम करय बदे नई काशी तक बसावल गयल. लेकिन बनारस पर कवनो फरक नाही पड़ल. बनारस क लोग गोदौलिया, चैक, पक्का महाल अउर गंगा घाट के बिना नाही जी पउतन. दिन में एक बार त गोदौलिया अउर गंगा घाट जाए के चहबय करी. बनारस अपने तई ही चलयला. बनारस में जेतना मोटर-गाड़ी, भीड़ बढ़ि गयल हौ, ओतना क झेलय क क्षमता शहर क नाही हौ. पहिले कचहरी से गोदौलिया, मैदागिन अउर लंका तक सिटी बस चलय. हम सब गांव से शहर आई त काॅलेज पहुंचय बदे कचहरी से सिटी बस लेई. लेकिन आज गोदौलिया तक साइकिल रिक्शा नाही जाइ पावत हयन. भीड़ बहुत बढ़ि गयल हौ. सन 1950 में बनारस शहर क आबादी 362,923 रहल. आज 2020 में आबादी बढ़ि के 1,664,942 होइ गयल हौ. यानी पांच गुना से जादा. एकरे अलावा हर साल लगभग 60 लाख देसी-विदेशी सैलानी भी बनारस आवयलन. यानी लगभग 16 हजार सैलानी प्रति दिन.

सबकर काम-धंधा हौ. शहर में इहां से उहां आवय-जाए के पड़यला. आवय-जाए बदे आज के तारीख में केहू अइसन नाही बा जेकरे छोट-बड़ गाड़ी न होय. एतना आदमी, एतना गाड़ी जब सड़क पर उतरिहय त बनारस क गलीनुमा सड़़किन क का हाल होई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में जापान यात्रा के दौरान जापानी प्रधानमंत्री के साथ एक समझौता पर हस्ताक्षर कइले रहलन. इ समझौता बनारस के स्मार्ट सिटी बनावय बदे रहल. एह दिशा में काफी काम भी भयल, लेकिन बनारस क भीड़ कहां उठाइके लेइ जाबा. एनएच-29, एनएच-2, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और जीटी रोड जइसन राजमार्ग वाराणसी से जुड़ल हयन. चार-चार ठे रेलवे स्टेशन हयन. हवाई अड्डा बा. बहरे से आवय वाला लोग फटाक से बनारस पहुंच जालन, लेकिन बनारस पहुंचला के बाद कहां जइबा? जाम में त फंसही के पड़ी. फिलहाल बनारस के जाम क कवनो ठोस समाधान नाही हौ, अउर न त एकर कवनो अबही उम्मीद ही देखात बा.

Tags: Article in Bhojpuri, Traffic Department, Varanasi news

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