भोजपुरी विशेष: जइसे वर्चुअल क्लास चलता, ओइसहीं वर्चुअल भोजन हो जाई त बड़ा मुस्किल बा

लइकन के पढ़ाई- लिखाई, कौनो गोष्ठी सभा के आयोजन, चुनाव रैली आ उद्घाटन वगैरह. वर्चुअल माने रउवा फोन से कार्यक्रम कनेक्ट क दिहल जाता. रउवा घरहीं बइठल बड़े- बड़े कार्यक्रम में शामिल हो जातानी.

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  • Last Updated: October 20, 2020, 10:44 AM IST
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ड़ा मुस्किल बा. कुल कार्यक्रम वर्चुअल हो गइल बा. लइकन के पढ़ाई- लिखाई, कौनो गोष्ठी सभा के आयोजन, चुनाव रैली आ उद्घाटन वगैरह. वर्चुअल माने रउवा फोन से कार्यक्रम कनेक्ट क दिहल जाता. रउवा घरहीं बइठल बड़े- बड़े कार्यक्रम में शामिल हो जातानी. भाषण दे देतानी. एही बीच एगो प्रस्ताव सुननी हं कि केहू अपना पूर्वज के आनलाइन/ वर्चुअल श्राद्ध करेके प्रस्ताव देले रहल ह. ईहो सुननी हं कि गया के पंडित जी लोग एकरा के खारिज क देले बा लोग. अब हमरा मन में आइल ह कि जदि वर्चुअल भोजन करावल जाउ तब का होई? मान लीं हम केहू के वर्चुअल भोजन करावतानी. त हम अपना घर में छप्पनों व्यंजन बना के आ जेकरा के खियावे के बा ओकरा के आनलाइन देखा दीं आ कहीं कि लीं, हम कल्पना करतानी कि रउवां भोजन करतानी.

त ऊ आदमी हमरा अनसा जाई आ बोलचाल त दूर के बाति बा हमरा से कुल संबंध तुरि ली. त चालाक लोगन के भी कमी नइखे.ह अइसन आदमी कहिहन कि वर्चुअल भोजन के मतलब ई ह कि हम अपना मनपसंद होटल में जाईं आ मनपसंद भोजन के आर्डर दीं. आ जब भोजन करे लागीं त रउवां के आनलाइन/वर्चुअली देखा दीं. देखीं हम हई कुल आइटन खा तानी. रउवां फलाना होटल के आनलाइन पेमेंट क दीं. एही में मुस्किल बा. मान लीं कि ऊ अइसना होटल में गइले जहां एक कप चाह पियला पर 300/ रुपया लागता. त ओहिजा एक थाली भोजन के दाम हजार रुपया भा ऊपर होई. त वर्चुअल भोजन बड़ा खतरनाक होखी. भगवान के कृपा बा कि केहू एकरा खातिर तैयार नइखे. तैयार हो जाई तबे खतरा बा.

हमनी के पूर्वज कतना बढ़िया परंपरा बनवले बा लोग कि जब केहू के भोजन करावे के बा त अपना घरे बोलाईं आ जवन रउवां बना सकेनी तवन प्रेम से खिया दीं. ओमें ना कौनो बिल देबे के बा आ ना बेयरा के टिप देबे के बा. रउवो सुरक्षित आ खाए वाला भी शुद्ध भोजन करी. एकदम घर के भोजन. तले ईहो बाति आ गइल ह कि आनलाइन/वर्चुअल शादी हो सकेला. आरे भाई कइसे हो सकेला? शादी ह कि मजाक ह. सिंदुर दान कइसे होई? परिछावन, गुरहथी वगैरह कइसे होई? अइसन प्रस्ताव राखे वाला लोग विचित्र लोग बा. वर्चुअल पति- पत्नी संबंध कइसे हो जाई? एही से जतना संभव बा ऊहे कइल ठीक बा. हर चीज वर्चुअल करावे के सोचल फिजूल बा. एक आदमी हमरा से मिलल त कहे लागल कि हर चीज फोने पर हो जाता.



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हम कहनीं कि रउवां भोजन, पानी, लइकन के होम वर्क, केहू के सांत्वना के स्पर्श फोन से कइसे क सकेनी. त ऊ हमरा के घूरि के देखे लगले. त हमार बिनती ई  बा कि महराज जी, कौनो बाति कहे के पहिले सोचि लीं. मये धान बाइस पसेरी मत करीं. हर टेक्नालाजी में कमी रहेला. टेक्नालाजी मनुष्य जीवन के कुल काम कइए ना सकेला. ना त मशीन आ आदमी के फरक रहिए ना जाई. ई कौनो सभ्यता में आजु ले भइलो नइखे. आदमी आ मशीन के फरक हमेशा रहल बा आ रही. एही बीच में एक आदमी पूछि दिहलसि कि अच्छा श्राद्ध आ पिंडदान में का अंतर बा. त ओहिजे एगो कथित जानकार रहले. कहले कि पिंडदान ओह आत्मा के दियाला जवन पूर्ण रूप से मुक्त नइखे हो पवले. जइसे केहू के हत्या हो गइल होखे, दुर्घटना में मृत्यु हो गइल होखे चाहे आत्महत्या क लेले होखे.

आ श्राद्ध मुक्त ह चुकल पितर लोगन के कइल जाला. कहले कि श्राद्ध माने श्रद्धा. त हम एगो दोसरा जानकार से पुछलीं. ऊ कहले कि ना. अइसन व्याख्या ठीक नइखे. पिंडदान त जेकर साधारण मृत्यु होला ओकरो खातिर दिहल जाला. हं, दुर्घटना, आत्महत्या आदि से मुअल आदमी खातिर शांति आ मोक्ष खातिर अलग मंत्र आ विधि से श्राद्ध आ पिंडदान करावल जाला. मान लीं कि केहू के उमिर 60 साल बा. आ ऊ आदमी 50 साल के उमिर में आत्महत्या क लिहलसि. त दस साल त ओकर आत्मा भटकी. काहें से कि ओकर उमिर त मिलल बा 60 साल. अब ऊ सूक्ष्म शरीर में जहां तहां भटकी, दुख पाई. ओकरा मुक्ति खातिर ओकरा घर वाला जदि विधि विधान से शांति पाठ आ पिंडदान दे देता लोग त ओकरा आत्मा के कुछ शांति मिली.

कहले कि ई बाति हमनी के पुराणन में लिखल बा. त फाइनल बात ई भइल कि पिंडदान आ श्राद्ध अलग- अलग प्रक्रिया ह आ ई सब तरह के मृत लोगन खातिर कइल जाला. तले एगो अउरी बात आ गइल. एक आदमी प्रश्न पूछि दिहलसि कि अच्छा ई बताईं कि पुराणन में त ईहो लिखल बा कि जेकर इच्छा अधूरा रहि गइल बा मुअला के बाद ओकरा फेर जनम लेबे के परी. त ज्यादातर लोग त कौनो ना कौनो इच्छा लेके मुए ला. त ओकरा त फेर जनम लेबे के परी. त जानकार कहले कि हं. रउवां ठीक कहतानी. जनम त लेबहीं के परी. त प्रश्न उठल कि अइसनो केहू बा जेकरा मुए के घरी कौनो इच्छा ना होखे. त उत्तर मिलल कि हं. बहुत आदमी बाड़े. अइसना आदमी के बुझा जाला कि एह संसार में तृप्त करे वाला कौनो चीज नइखे.

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कतनो धन- वैभव, सुख के सामान जुटा लीं, कतनो प्रसिद्ध हो जाईं, कतनो विषय भोग क लीं, राउर मन तृप्त ना हो सकेला. जतने विषय सुख उठाइब ओतने ओकर आग धधकत जाई. एही से गीता में कहल बा कि कौनो इंद्रिय के वासना जब तक रउवां के अंकवारी में बन्हले रही, रउवां दुख मिलत रही. काहें से कि इंद्रिय सुख के भीतर दुख लुकाइल रहेला. सुख का संगे दुख मिलबे करी. एही से एह संसार के द्वैत कहल जाला. एह संसार में ईश्वर सुख छोड़ि के कवनो अइसन सुख नइखे, जवना में दुख लुकाइल ना होखे. ओह सुख का संगे दुख मिलहीं के बा. अवश्यंभावी. त हम ओह जानकार के मुंह से ई बाति सुनि के घरे चलि अइलीं. सोचलीं कि इंद्रिय सुख एके बार में ना जाई. इंद्रिय सुख एगो जाल ह. ओकरा के धीरे- धीरे काटे के परी. एके दिन में संभव नइखे.

त जइसे वर्चुअल दुनिया में कुल चीज संभव नइखे, ओही तरी इंद्रिय सुख एक दिन में छोड़ल संभव नइखे. बाकिर ईहो बात बा कि इंद्रिय सुख जाल ह. एकरा में जे फंसि गइल ऊ छटपटात रहेला. त एह जाल के एक- एक गो फांस काटत रहला के काम बा.
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