भोजपुरी विशेष: बंगाल में ठेठ बिहारी ईस्टाइल क दुर्गापूजा

बंगाल में शारदीय नवरात्र में मनावल जाए वाला दुर्गापूजा ही सबसे बड़ा पर्व ह त उहां रहे वाला बिहारी भाई लोग भला कहां पीछे रहे वाला रहलन.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 20, 2020, 9:33 AM IST
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शारदीय नवरात्र शुरू हो चुकल बा. ई नवरात्र समूचा देस में अलगे तरीका से में मनावल जाला. एमे सबका ले जादा उत्साह से बंगाल में मनावल जाला उहो पंडालन में देवी दुर्गा क मूरती बइठा के. नवरात्र में छठवां दिन से लगा के दसवां दिन तक उहवां के पंडालन में साम सबेरे दुर्गा पूजन का अलगे रंग देखाई पड़ेला. कहे क मतलब ई दुर्गापूजा ही बंगाल क सबसे बड़ा परब त्योहार ह. अऊर जब बंगाल में शारदीय नवरात्र में मनावल जाए वाला दुर्गापूजा ही सबसे बड़ा पर्व ह त उहां रहे वाला बिहारी भाई लोग भला कहां पीछे रहे वाला रहलन. उहो लोग हर गली मुहल्ला में मनावे लगलन दूर्गापूजा. उहो ठेठ बिहारी ईस्टाइल में.

सुनला में भलेहू अजब लागो कि बंगाली पूजा आ बिहारी पूजा. काहे से कि पूजा तो पूजा होला चाहे कौनो देवी देवता क होखे आ चाहे कौने परदेस में. लेकिन बंगाल में होवे वाला दुर्गापूजा में बंगाल अ बिहार का अंतर साफे दिखाई देला. अइसे त दूनो प्रांत में वैष्णव संप्रदाय के माने वालन लोगन क कमी न ह लेकिन शक्ति माने शक्ति क प्रतीक देवी दुर्गा के पूजे वाला बाबा जी लोग ही अधिक बाड़न, एहिके चलते इहां नवरात्र बहुते धूमधाम से मनवल जाला. पुराणन में अइसे त साल में चार गो नवरात्र क मान्यता ह. एमे शारदीय नवरात्र क ही सबका ले ज्यादा प्रचलन ह. एकरा बाद चैत्र नवरात्रों में लोग सब ब्रत पूजा करेला. लेकिन बंगाल में सबका ले अधिका मान शारदीय नवरात्र क ही ह.

शारदीय नवरात्र में बंगाल के सगरो नगर से लगा के सगरो गांव के गली अ मुहल्ला तक दुर्गापूजा बहुते सान से मनावल जाला. कहे क मतलब ई ह कि दुर्गापूजा ही बंगाल क सबसे बड़ उत्सव अ परब ह. जे में नवका से लेके पुरनका तक सब के सब इकरा रंग में नजर आवेला. जइसे महाराष्ट्र में गणेश उत्सव मान ह ओसे तनको कम बंगाल में दुर्गापूजा क ना ह. दोनों में अंतर बस ई ह कि महाराष्ट्र के मोहल्लन में त गणपति क मूर्ति पंडाल सजे के साथे साथ गणेश चतुर्थी के दिन घरों में मूर्ति ला के पूजल जाला और दोसरा दिन विसर्जित कर दिहल जाला लेकिन बंगाल में गली मोहल्ला में ही पंडाल में देवी दुर्गा क मूर्ति रख के चंडी पाठ होला जेमे पास पड़ोस में रहे वाला लोग सुबह साम होवे वाला पूजा, आरती-अंजलि में जुटेलन उहो पूरा भक्ति भाव से.



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जे के जौन परसाद चढावे के हव सब पूजा पंडाल में ले जाके देवी के चढालेवा. पंडाल के पुजारी भी विधिवत बारी बारी से मंदिर लेखा लोगन क समूह में संकल्प के साथे पूजा करावे लं. जे तरह बिहार व पूर्वांचल में नवरात्र में घर में चंडी पाठ बिठावे क चलन ह अइसन चलन बंगाल में ना ह. बंगाल में देवी दुर्गा के साथे लछमी, सरस्वती, गनेस अ कार्तिक क भी मूर्ति पंडाले में रख के पूजल जाला. देवी दुर्गा उहो शेर पर सवार महिसासुर मर्दनी देवी क मूर्ति ऱखल जाला. शारदीय नवरात्र क पंचमी व षष्ठी के दिने पंडाल में सब देवी देवता क मूर्ति रखा जाला. सप्तमी से लोगन क भीड़ मूर्ति और सजावट देखे खातिर पंडाल- पंडाल घूमे सुरू हो जाला. इ सब नवमी तक चलेला अउर दसमी के दिना मूर्ति के पास क नदी तलाव में विसर्जित कर दिहल जाला.

दसमी के दिन पंडाल में सुहागन औरत लोग एक दूसरा के सेनुर लगावेला जेके उहा क भासा में सिंदूर खेला कहल जाला. ई लेख के सुरू में जब बंगाल में बिहारी दुर्गापूजा का बात आइल रहे त ओकरे चलते बंगाल में दुर्गा पूजा क महातम अउर लोगन क भक्ति भाव बतावल जरूरी रहे जेसे कि बंगाली अउर बिहारी लोगन के दुर्गापूजा क अंतर साफ समझे में आ सके. बिहार और पूर्वांचल के अधिका लोग बंगाल में रहिके उहवां के रंग में ही रंग गईल अउर घरे में चंडी पाठ ना बइठा के अपना अपना इलाका के गली मुहल्ला में पंडालन में सजावट के साथ दुर्गापूजा करे लागल. बिहारी पंडालन में बंगाली पंडालन में बजे वाला खास तरह क वाद्य यंत्र ढाक भी बजेला जेके ढाकिया नाच नाच के बजावेला लेकिन जौन भक्ति भाव समूचा दुर्गापूजा परब में बंगाली पंडालन में  देखाई देला उ बिहारी पंडालन में गायब रहेला.

जहां बंगाली पंडालन में दिन भर ढाक अउर घंटा के अवाज से भक्ति क माहौल बनल रहेला उहवां बिहारी पंडालन में ढाक- घंटा क अवाज खाली सुबह साम पूजा अउर आरती के समय ही सुनाई पड़ेला. बाकी दिन लाउडस्पीकर पर कानफाड़ू फिल्मी गाना ही बजत रहेला. बंगाल क पूजा में देवी के हर दिन भोग लगेगा अउर देवी क उहे भोग- परसाद मुहल्ला के लोगन के हर दुपहरिया भोजन होला. भर दुर्गा पूजा सायदे कौउनो घर में दुपहरिया क भोजन बनत होई लेकिन बिहारी पंडालन में भोग के रूप में भोजन त दूर सायदे केहू केहू के परसादों मिलत होई.

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एकरा अलावा बंगाली समाज क पूजा पंडाल और ओकरा आसे पासे भर दुर्गापूजा भर सांझ से लगाके देर रात तक छोटकन से बड़कन तक क कौउनो न कौउनो सांस्कृतिक आयोजन रोज होला. एकरा में धुनुची प्रतियोगिता अउर जात्रा देखे क मौजे कुछ अलगे होला. सांझ क आरती जब होला तब हाथ में धुना लेके औरत –मरद, लइका -लइकी सबही झूम झूम के नाचे ला ढाक अउर घंटा के ताल पे. कई पंडालन में एकर प्रतियोगिता भी होला जेमे दोनों हाथ, मुंह और माथा पर धुना रख के नाचे वालन लोगन के देखते बने ला. ऐही तरह खुला मंच पर लोगन के भीड़ के बीच में होवे वाला बंगाल क लोकनाट्य कला, जात्रा का मंचन भी दुर्गापूजा में होवे वाला बिसेस कार्यक्रम होला जेके बंगाली के अलावा गैर बंगाली भाई लोग भी खूबे चाव से देखे ला.

दोसरा ओर बिहारी समाज के पंडालन में सांस्कृतिक आयोजन के नाम पे खाली आरकेस्ट्रा क कार्यक्रम होला उहो गिनल चुनल पंडालन में. जेमे किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, मुकेश, लता- आशा के अवाज में फिल्मी गाना गावे वालन कलाकारन के अलावा अइसन कउनो बिसेस लस ना होला कि लोगन के अपना ओर खीच सके. इहां एगो बात बतावल बहुते जरूरी है बिहारी और पूर्वांचली समाज दुर्गापूजा भलेहू अपना ईस्टाइल में मनावत होखे जेकरा से बंगाली समाज क कउनो लेवल देवल ना होखे लेकिन देश विदेश के कौउनो कोना होखे दुर्गापूजा अपने विधि विधान और परंपरा से मनाए वाला इ समाज क पूजा पंडालन में अब बिहारी भाई लोगन वाला देवी क जयकारा भी बिना लाज संकोच के लगावल जाला.

पहिलवां बंगाली भाई लोग देवी क जयकारा. मां दुर्गा की जय .. लगावत रहल. अब हर पंडाल में .बोलो बोलो दुर्गा माई की. क जयकारो सुनाई पड़ेला. इ बिहारी समाज खातिर जरूरे माथा ऊंचा करे वाली बात ह. एकरा अलावा एक गो अउर बात बतौले बिना बंगाल क नवरात्र क कथा कहानी पूरा न होई. बिहार व पूर्वांचल सहित देश क दोसरा भाग  में जइसे वैष्णव परंपरा के माने वाला लोग शारदीय नवरात्र में राम के पूजेला अउर रामलीला का समापन रावन क पुतला जला के करेला वइसन बंगाल में न होला. बंगाल में वैष्णव संप्रदाय में कृष्ण के माने वाला लोग अधिक हउवन. वइसे कोलकाता समेत मय बंगाल में छितराइल मारवाड़ी अउर पंजाबी समाज के लोग आपन आपन इलाका में दसहरा के दिन रावन का पूतला फूंकेला उहो बिना रामलीला कइले.
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