• Home
  • »
  • News
  • »
  • bhojpuri-news
  • »
  • भोजपुरी में पढ़ें - का होई कोरोना काल के बाद

भोजपुरी में पढ़ें - का होई कोरोना काल के बाद

कोरोना से इ सीखे के मिलल हा कि दूसरो के ध्यान राखे के पड़ी.

कोरोना से इ सीखे के मिलल हा कि दूसरो के ध्यान राखे के पड़ी.

हमनी के प्रेम कइल छोड़ देले बानी जा. प्रेमे सब बेमारी के ईलाज बा. प्रेम रही तबे ' वसुधैव कुटुंबकम ' के रहस्य समझ में आई. प्रेम खाली आदमी के आदमी से ना. पशु, पक्षी आ प्रकृति से भी.

  • Share this:
पता ना कोरोना के ओह पार कब पहुँचब जा ? कब मुक्ति मिली एह बलाय से? कोरोना वैक्सीन के लेके तरह-तरह के कोशिश आ दावा त होते बा बाकिर अभी बहुत कुछ साफ़ नइखे. एगो रिपोर्ट के मानीं त अगर दिसंबर में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैक्सीन के मंजूरी मिल जाता त अगिला साल जनवरी-फरवरी में वैक्सीन के पहिला खेप आ सकsता. बाकिर ई आम आदमी तक आ ओकरा पॉकेट के पहुँच तक कब पहुंची, ई कहल अभी जल्दीबाजी होई. बे नू कॉलर ट्यून में अमिताभ बच्चन लगातार बोल रहल बाड़न- नमस्कार, हमारा देश और पूरा विश्व आज कोविड-19 की चुनौती का सामना कर रहा है. कोविड-19 अभी खत्म नहीं हुआ है, ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम सतर्क रहें. इसलिए जब तक दवाई नहीं, तब तक कोई ढिलाई नहीं.

ये भी पढ़ें : भोजपुरी विशेष - बनारस रफ्तार में नाही रस में चलेला

माने कोरोना से सावधानी बरते के सलाह लगातार दीहल जा रहल बा. बार-बार ई बतावल जा रहल बा कि कोरोना से बचाव खातिर जरूरी बा, नियमित रूप से हाथ धोअल, मास्क पहिरल आ आपस में उचित दूरी बना के रखल. बार-बार समुझावल जाता – ‘’ दो गज दूरी, मास्क है जरूरी. खांसी बुखार या सांस लेने में कठिनाई होने पर हेल्पलाइन नंबर 1075 पर संपर्क करें.’’

खैर, हर बुरा समय के एगो सीमा होला. इहो जाई. जइबे करी. आ जब ई इतिहास हो जाई त पीछे पलट के हमनी के एह महामारी के देखब जा त बहुत कुछ लउकी.

अंतरराष्ट्रीय शांति
आज हम कोरोना के ओह पार देखत-सोचत रहनी ह. हमरा अपना कविता के एगो टुकड़ा ईयाद आइल ह. कविता के शीर्षक बा अंतरराष्ट्रीय शान्ति. ओकर शुरूआती अंश बा - बबुआ रे, ई देश-विदेश काहे बनल ?काहे बन्हाइल बाँध सरहद के ? दुनिया के ऊपर एके गो छत -आसमान आ एके गो जमीन-धरती। के कइलस टुकड़ा-टुकड़ा. झगड़ा के गाछ के लगावल? के बनावल नफ़रत के किला ?. का दो, धरती माई हई। माईयो टुकी-टुकी ? एह टुकी-टुकी में हीं सारा समस्या के जड़ बा. टुकी-टुकी में वर्चस्व के लड़ाई बा. अहंकार, शक्ति-प्रदर्शन, धोखा, गद्दारी, जमाखोरी, साजिश, सियासत सब एह टुकी-टुकी में बा. ' वसुधैव कुटुंबकम ' खाली नारा में बा आ मानवता में बानर नर से आगे निकल गइल बाड़न.

चीन के चेहरा देखीं. देखीं का, कोरोना शब्द बोलते भा सोचते चीन के क्रूर चेहरा नज़र का सामने नाचे लागता. चीन के चाल आ चक्रव्यूह सउँसे दुनिया समझ गइल बा. तनिक विचार करीं, चीन कोरोना वायरस के संक्रमण से जुड़ल सूचना दबवलस काहे? दबवलस त दूर, अब त ई सभे जानिये गइल बा कि कोरोना वायरस के उत्पत्ति चीन के प्रयोगशाला बुहान इंस्टीच्यूट आफ वायरोलाजी में ही भइल बा. मतलब ई एगो मानव निर्मित वायरस बा. अइसन काहे कइलस चीन ?... बात उहे, टुकी-टुकी वाला बा. चीन धरती के बाकी टुकड़ा के गैर समझलस, दुश्मन समझलस, बाजार समझलस. ' वसुधैव कुटुंबकम' के राज, रहस्य आ सुख ओकरा भेजा में घुसबे ना कइल.
का इ कुदरत के क्रोध ह

दरअसल हमनी के प्रेम कइल छोड़ देले बानी जा. प्रेमे सब बेमारी के ईलाज बा. प्रेम रही तबे ' वसुधैव कुटुंबकम ' के रहस्य समझ में आई. प्रेम खाली आदमी के आदमी से ना... पशु, पंक्षी आ प्रकृति से भी. त अब चिचिअइला आ छाती पिटला से का होई कि प्रकृति के हमनी के दोहन कइनी जा. ओकरा साथे अन्याय कइनी जा, ओकरे सजा मिल रहल बा. गगनचुंबी टॉवर के पॉवर देखावे में संवेदना के महल खंडहर बन गइल, ओकरे सजा मिल रहल बा. जीवन से प्रेम गायब हो गइल त एह सूखल ढाँचा में ' स्ट्रांग इम्यून सिस्टम ' रहो त रहो कइसे. फेर त कोरोना डायन खातिर जिनिगी के डंसल बहुत आसान बा. ई अलग-अलग रूप में आवते रही.

विद्वान लोग के मत बा आ इतिहासो साक्षी बा कि हर महामारी के बाद हमनी के जागेनी जा. जागल बानी जा. जगला पर कुछ समीकरण बदलेला. कुछ मान्यता टूटेला. कुछ नया सामने आवेला. ई महामारी या त्रासदी कवनो पहिला बेर त आइल नइखे. प्लेग, ब्लैक डेथ आ स्पैनिश फ्लू के समय भी दुनिया हिल गइल रहे. ओही तरे महामारी के बाद आर्थिक संकट के खड़ा भइल भी कवनो नया नइखे. चिंता, आर्थिक संकट के साथे साथ ओह संकट से समाज में उपजे वाला विषमता आ करप्शन के बा. चिंता, अपना सपना के मेहनत के कढ़ाही में रोजे पकावे वाला मजदूरन के अनाथ होके एने ओने छिछिअइला के बा.

कोरोना कवनो जाति, धरम, अमीर, गरीब के ना ह. तब्लीगी जमात के वजह से भारत में कोरोना के मरीज बढे के बात मिडिया में खूब गरमाइल रहे. निःसंदेह दोषी के सजा मिले के चाहीं. बाकिर एकरा चलते हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य ना फइले के चाहीं. सउँसे दुनिया में रोयेला आदमी त रुलाई एके जइसन होला. लोर के स्वाद एके जइसन होला. हंसी आ ठहाका भी एके जइसन होला. मानवीय अनुभूति के मानवता के आधार पर समझे के जरुरत बा. जात-पात, धर्म, भाषा, देश, क्षेत्र, सरहद के आधार पर ना. एह से, संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठ के मानवतावाद पर जोर देवे के होई. दुनिया के तमाम देशन के बीच निहित स्वार्थ से ऊपर उठ के एगो नया समीकरण आ संतुलन पर जोर देवे के होई. तबे मानव जाति के अस्तित्व पर से खतरा टली. अरे, जब अदिमिये ना रही त कवँची सरहद, कवँची सेना, कवँची बाज़ार, कवँची व्यापार. रही जीव तबे नू पीही घीव.

अइसहूँ कोरोना काल इ त समझाइये देलस कि आदमी के तीने गो जात बा- रेड जोन वाला आदमी, ऑरेंज जोन वाला आदमी आ ग्रीन जोन वाला आदमी....एही आधार पर एह काल में आदमी के साथे व्यवहार भइल भा होता. भारत के हर आदमी ग्रीन जोन वाला आदमी बन जाय, हम त भगवान से इहे गोहरावत बान. त ए चनेसर चाचा, अभी विश्व कल्याण के भावना से काम करे के जरुरत बा. अइसन पहल पहिलहूँ भइल बा. संयुक्त राष्ट्र, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अउर विश्व बैंक ... के जनम संकट काल ( द्वितीय विश्व युद्ध ) के बादे भइल बा....एहू महामारी के बाद कुछ तब्दीली आई. वैश्विक स्तर पर कुछ नया उपाय होई.

फिलहाल त मास्क पहिनी आ सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करीं सभे. जब ईश्वर के करुणा बरिसी त कोरोना छुछुन्नर के कहीं जगह ना मिली. अभी इम्तिहान के घडी बा.
सुई के टिक-टिक मत देखीं. एहतियात के साथे काम में लागल रहीं. भोर होई आ कुहासा फाटी.

(लेखक मनोज भावुक सुप्रसिद्ध भोजपुरी साहित्यकार हैं )

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज