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भोजपुरी में पढें - देसी सवाद आ सेहत के मौसम हवे जाड़

जाड़ा के मौसम में स्वादिष्ट आ पुष्टिकर सब्जी के आनंद आ जाला.
जाड़ा के मौसम में स्वादिष्ट आ पुष्टिकर सब्जी के आनंद आ जाला.

जाड़ में कपड़ा आ ओढ़ना के जरुरत त पड़ेला, लेकिन खाए के भी इहे मौसम ह. एही घरी नया सब्जी-तरकारी भी उगेला. इहे उ मौसम ह जब गांव में तरह तरह के गरम आ स्वादिष्ट लड्डू बनेला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 30, 2020, 3:39 PM IST
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ठंडा जइसे-जइसे बढ़े लागेला, अखबारन में ओकर एकही पक्ष के चर्चा ज्यादे होखे लागेला. चर्चा होला कि गरीबन खातिर क़हर बनि गइल जाड़ा, ठंड से जिनिगी पड़ल ठप्प, रूस (रूठि) गइले सुरूज भगवान, आदि-आदि. बाकिर जाड़ के एगो अवरू रूप बा, जेकर चर्चा लोक में त खूब होला, मीडिया में भले ना होत होखे. सवाल बा कि आखिर जाड़ के कवन खासियत बा, जवना के पीछे कम से कम भोजपुरी लोक बहुते धियान देला. भोजपुरी लोक मानेला कि जाड़ सेहत सुधारे के मौसम ह. जाड़ के दिन में प्रकृति किसिम-किसिम के सेहतमंद चीज देबेले, जइसे खूब हरियर तरकारी, साग. सेहत बनावे वाला बथुआ, पालक, टमाटर, मटर, फूलगोभी, पत्ता गोभी, गाजर, शलगम आदि-आदि एही घरी पैदा होला. हरियरकी पियाजु, जवना के पियाजु सागो भी कहल जाला, हरियर लहसुन आदि भी प्रकृति माता एही घरी देली. दुनियाभर के डॉक्टर-वैद, वैज्ञानिक आ भोजन सलाहकार (डायटिशियन) भी एह सब के गुणन के खान बतावत थाकत नइखन.

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मेथी आ दूसर साग
ओइसे त अब पूरा साल धनिया के पतई चटनी खातिर मिलता, बाकिर ओकर असली दिन जाड़हीं होला, सेहतमंद मेथियो के साग के इहे असली दिन होला. एही घरी बूंट, खेसारी, मटर आदि-आदि के सागो खूब पैदा होला. सरसों के साग के पूरा पंजाब गुणगान करेला..मकई के रोटी आ सरसों के साग के शोहरत सात समंदर पार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस तक पहुंचि गइल बा. देहि-धाजा बनावे वाला इ खानपान एही घरी ढेर मिलेला.
गांव के देशी के स्वाद याद आवेला
जब अगहन-पूष के दिन में सुरूज भगवान ओस, कुहरा आ सीति के बीच लुकाछिपी करे लागेले, ओह बीच जइसहिं उनुकर दरसन होला, पूरा सरेहि अइसे लागेला, जइसे धरती माई हरियर चदरी ओढ़ि के बइठल होखसु. बीच-बीच में सरसों के पीयर फूल, मटर के बैंगनी-सफेद फूल, पहलादा के उजर फूल अइसे लागेला, मानो धरती माई के हरियर चादरि में लागन सुनहला डिजाइन होखे. आजु से तीस-चालीस साल पहिले उपर जाताना चीजु के नाम लिहल गइल बा, ओकर देसी संस्करण बोआत रहे आ ओकर स्वाद कुछु अलगे रहत रहे. दरअसल अब देसभर के खेती-किसानी वाला शोध संस्थान आ विश्वविद्यालय हर देसी अनाज, तरकारी, साग आदि के जीन बदलि देले बाड़न स. एह से ओह सब के पैदावार त बढ़ि गइल बा, बाकिर देसी सवाद कहीं गायब हो गइल बा.



पहिले जवन देसी टमाटर रहे, ओकरा स्वाद में तनी खटतुरुसपन रहे. ओह घरी कांच टमाटर के आगि पर पका के धनिया के पतई आ हरियर लहसुन डालि के जवन चटनी बनत रहे, ओकर जे सवाद लेले होई, ओकरा पता बा कि ऊ कइसन रहे, अबो कांच टमाटर मिलेला, बाकिर ओह में ऊ सवाद नइखे, अब कांच होखे भा पाकल, हर टमाटर मीठे लागेला.

इहे हाल पालकी के सागो के हो गइल बा, पहिले जवन देसी पालकी मिलत रहे, ओकर रूप दोसर रहे. ओकर डांटी लाल रहत रहुए..पतई ओकर तिनकोनाह होत रहुए. अब उ पालकी खोजि के रऊंआ थाकि जाइबि, सायदे मिल पाइ.जाहिर बा कि ओकरो सवाद में अलगे किसिम के सवाद होत रहे. आजुकाल अब देसी बूटो-मटर गायेब हो गइल बा. एकरा वजह से ओकरो सवाद में देसीपन नइखे रहि गइल.

जाड़ के इंतजार
तीन-चार दसक पहिले तक एह सवाद के हर भोजपुरिया आदी रहे. जाड़ के दिन के लोग इंतजार करत रहे, सेहत बनावे खातिर. जइसहिं जाड़ आवत रहे आ सेहतमंद साग, तरकारी मिलल सुरू होखे, तब ओकर इंतजाम होखे लागत रहे. इंतजाम त अबो होला, बाकिर ओकरा में सवाद ना रहेला.
सोठ, मेथी आ चउरठ के लड्डू
जाड़ के दिन में भोजपुरी समाज में घर-घर तिसी, सोंठ, मेथी के भूंजल चउरठ के संगे गुर के पाग में लड्डू बनत रहल हा, जवना के पौष्टिकता के अब दुनिया भी मानि लेले बा. अब त कोलेस्ट्राल ठीक रखे खातिर, मधुमेह कंट्रोल करे खातिर, कैल्शियम खातिर एह सब खाना के सेहतमंद मानल जा रहल बा. धेयान देबे के चाहीं कि ई सब चीजु जाड़हिं के दिन में मिलेला, बनेला आ खाइल जाला. देहाति में सेहत खातिर एगो बरहमासा बा.ओकरा में कहल बा.
अगहन तेल, पूष दूध, माघ-मास घीव-खिंचड़ खाय

यानी जब ठंड आपन असर अगहन महीना में देखावे लागे त तेल के मालिश के संगे ओकर भोजन में इस्तेमाल बढ़ा देबे के चाहीं. एही तरि जब जाड़ आउर बढ़ि जाइ त अइसन पूष महीना में रोजो दूध के प्रयोग बढ़ा देवे चाहीं, जब माघ में ठार पड़े लागे यानी कसि के ठांढा पड़े लागे, तब खिचड़ी में खूबे घीव डालि के खाए के चाहीं.

सवाद आ सेहत के दिन जाड़ के सवाद के लवटा खातिर कइ गो संस्था अब काम कर तारी स. अब गांवन में कइ लोग देसी पालकी, टमाटर आ लहसुन के खोजल सुरू कइ देले बा. देसी बिया यानी बीज के मार्फत सवाद के संगे देसी आ पारंपरिक सेहत के लवटावे के कोसिस बढ़ि गइल बा. लोग देसी बीज बैंक बनावले बा. जाड़ के लेके भोजपुरी समाज में एगो कहाउत खूबे प्रचलित बा.
लइकन के छुअबि ना, जवान गुरू भाई.
बुढ़वन के छोड़बि ना, कतनो ओढ़िहें रजाई.

माने कि लइकन से जाड़ महाराज के संहतियाई होला, जवान लोगन के उ गुरूभाई मानेले, बाकिर बुढ़ लोगन के उ खूब सतावेले, चाहे ऊ लोग कतनो रजाई-दुलाई ओढ़सु लोग. बाकिर एकरो काट मौसम में मिलेवाला सेहतमंद साग, तरकारी से मिलेला. कहे के मतलब ई बा कि जाड़ से डेराईं मति. ठंडा के दिन में मिलेवाला आपाना सरेह के हरियरी, तरकारी, घीव-दूध आ तिसी के संतुलित इस्तेमाल करीं. पुरानका सवादक के खोजीं आ आपाना संस्कृति के यादि करीं.
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