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भोजपुरी विशेष - घरनी से घर सोचेला, ना घरनी, घर रोवेला

भोजपुरी विशेष - घरनी से घर सोचेला, ना घरनी, घर रोवेला

कहावत कवनो समाज के सोच आ व्यवहार के भी प्रकट करेले.

कहावत कवनो समाज के सोच आ व्यवहार के भी प्रकट करेले.

भोजपुरी लोकोक्ति में नारी के जवन सम्मान दिहल गइल बा ओहस पता चलेला कि भोजपुरीभाषी समाज में नारी के का स्थिति रहल हा. हालांकि सचाई इ ह कि जवना समाज में नारी के सम्मान ना रही उ तरक्की ना क सकेला.

लोकोक्ति में लोकसाहित्य के जान-परान बसेला. एकरा इस्तेमाल से कथन के असरदार आउर बेशकीमती बनावल जाला. हरेक लोकोक्ति में एगो मजेदार कहानी लुकाइल रहेले. चूंकि एकर जुड़ाव आम अदिमी से होला, एह से सहजता एकर खासियत होला. चिरसंचित गियान के अंजोरा ले आवे में एह लोकोक्तियन के अगहर भूमिका रहल बा.

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प्राचीन परिपाटी
लोकोक्तियन के परंपरा बहुते प्राचीन ह. वेद उपनिषदो में इन्हनीं के प्रचुरता पावल जाला. संस्कृत में ई सूक्ति का रूप में मौजूद बाड़ी स. सुन्नर रीति से कहल गइल उक्तिए सूक्ति भा सुभाषित कहाला आ इहे कहनाम जब आम अदिमी के बेवहार में आवे लागेला, त ऊ लोकोक्ति बनि जाला. कवनो हलका विशेष में प्रचलित लोकोक्ति ओह इलाका के पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक आउर सांस्कृतिक स्थितियन पर गहिर रोशनी डालेले. कम-से -कम शब्द में गझिन आ गम्हीर बात कहिके गागर में सागर भरे के काम लोकोक्ति के होला.

बिनु घरनी घर भूत के डेरा
अलगा-अलगा भोजपुरी हलका में मेहरारू के केन्द्र बनाके खूब लोकोक्ति सिरिजाइल बाड़ी स. ई कतहीं हास-परिहास त कतहीं व्यंग का मार्फत गहिर आ घवाहिल चोट करेली स.औरत के शील-सुभाव, सोच आउर ओह लोग कइल मरदानी अनेति-अतियाचार के कथा कहेली स ई लोकोक्ति.
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ' के संगें सुर में सुर मिलावत इहंवों स्त्री के घर के शोभा मानल जाला.मेहरारू बेगर समाज के हाल बिना मेह के दंवरी लेखा हो जाला. खाली अतने ना, नारी के अभाव में घर सूनसान मुर्दघटिया-अस लागेला. चारू ओरि अन्हरिया पसरि जाला. घर के हिफाजतो त घरनिए करेली,एह से कहल गइल बा-
बिनु घरनी घर भूत के डेरा
भा
घरनी से घर सोभेला,
ना घरनी, घर रोवेला.

खेती-किसानी खातिर जइसे बैल जरूरी होला (आजु-काल्ह के बात दीगर बा,जब बैल के खेती से काटि दिहल गइल बा),ओइसहीं औरत के बिना घर चलावल मसखरी कइल कहाई-
बिनु बैलन खेती करे, बिनु भैयन के रार.
बिनु मेहरारू घर करे, चौदह साख लबार!

ना नइहरे सुख, ना ससुरे सुख
बाकिर मेहरारू के चुपचाप सहनशील सुभाव से अनबोलता मानि लिहल गइल. खिलाफत ना करे के अलचारी सोझबक गाइ बना दिहलस. बिना ओकर राइ जनले जेने मन करे, ओनिए हांकि द,भा जवने खूंटा में चाहऽ, ले जाके बान्हि द! तबे नू छोहाइयो के लरिकी के 'हमार बाछी !' कहल जाला-हमार बाछी त गाइ हई, जेनिए हांकि द, ओनिए चलि दीहें!

चाहे नइहर होखे भा ससुरा, हरेक जगहा औरत का जिम्मे बस काम आउर काम, बाकिर तबो ओह काम के कवनो मोल नइखे. सुख-चैन के एको छन ओकरा नसीब में ना होला-
नइहर जो बेटी, ससुरा जो
जांगर चलाके सगरे खो!

एही बात के एहू तरी कहल जाला-
बेलदार के बेटी,
ना नइहरे सुख , ना ससुरे सुख!

भोजपुरिया समाज में बेमेल बियाह पहिले आम बात रहे. जवान कनिया का संगें बूढ़ के गंठजोड़ाव आ विधवो भइला प दोसर बियाह के छूट ना. कहल जात रहे कि नारी-जिनिगी में हाथ पीयर करत खा बस एके हाली हरदी-तेल लगावल शास्त्र सम्मत होला-
तिरिया तेल ,हमीर हठ
चढ़े न दूजो बार!

नवकी बहुरिया भलहीं खूब हुनरमंद होखसु, खूब बढ़िया व्यंजन बनावसु, बाकिर उन्हुकर तारीफ कइला का जगहा ई कहल जाई कि नीमन तेल-मसाला से मजगर सब्जी बनल बा-
तेल बनावे तरकारी,
नवकी बहुरिया नाम !

माई कतनो नेह-छोह काहें ना करे, बबुआ बियाह होते गाइ नियर महतारी खातिर कसाई हो जालन-
माई के जिउवा गाई-अस
पूत के जिउवा कसाई-अस!

जुलुम का चलते पहाड़ भइल जिनिगी
औरत पर जुलुम ढावेवाला समाज कबो ओकर आजाद अस्तित्व ना माने. बियाह का बाद ओकर नांवों गुम हो जाला.कबो फलाना बहू, त कबो चिलाना के माई!केहू के नांव का संगें जोड़िके रिगावलो जाला-
अइली ना गइली
फलाना बहू कहइली!

जदी सवांग मू गइल, त मए सवख-सिंगार खतम. एकरा बादो अगर तनिकिओ साज-सिंगार कइली, त सोझे चाल-चरीत्तर पर लांछन शुरू-

जे विधवा होके करे सिंगार,
तेकरा से रहिहऽ होशियार!

जवान-जहान मेहरारू आ बूढ़ मरद के भला का तालमेल! ओइसन औरत का ओह बूढ़ के शासन में रहि सकेले?
अरवा चाउर फांकल का,
बूढ़ भतार के ठगल का!

मरद अगर कमजोर होखे, कायर होखे, त लोगन के काम-लोलुप निगाह टिके लागेले आ परस्त्री प आँखि उठावे-लड़ावेके हक मिलि जाला. फेरु त ऊ औरत लरिका से बूढ़ले सभके भउजाई बनि जाले-
अबरा के जोरू
सभके भउजाई!

तिरिया कोख कोंहार के आवा

एके स्त्री के कोख से किसिम-किसिम के संतान जनमेले-करिया-गोर, खूबसूरत-बदसूरत.एही से कहल गइल बा-
तिरिया कोख कोंहार के आवा
निकसे करिया-गोर औलाद.

जिनिगी में तजुर्बा, भोगल दुख खास माने राखेला. एही से ई बात सोरह आना सांच मानल जाला-
बांझ का जाने
परसवती के पीरा!

मान -मरजाद
घर आ समाज में पहिलकिए पत्नी के सही माने में मान-मरजाद आ सम्मान मिलेला. दोसरकी आ तिसरकी के लोग हेय दृष्टि से देखेला-
पहिली बहुरिया
दूसरी पतुरिया
तीसरी कुकुरिया!

अइसन मानल जाला कि जहंवां ढेर महरारू लोग जुटेला,उहवां खूब बतकूचन होला आ बाते-बात में झगड़ो-झंझट के नउबत आ जाला. कबो-कबो त अतना बतकही होई कि भोजनो ना बनि पाई आ मरद लोग के उपासे सूते के परी. एगो लोकोक्ति देखीं-
जवना घर में मरदा ढेर
ओह घर में बरदा उपासना,
जवना घर में मेहरी ढेर
ओह घर में मरदा उपास.

खाना ना बनावे का जरि में एह बात के होड़ो रहेला कि हमहीं काहें बनाईं,दोसर काहें ना?

नारी के लोकोक्तियन में स्त्री के दबाइल, कचराइल आउर सहनशील सुभाव के झलक मिलेला. आकार में छोट,बाकिर भाव बोध में समुंदर नियर विशाल-हती मुकी गाजी मियां, लमहर पोंछि! इन्हनीं में

मेहररुई मन के अंदरूनी हालात अल्ट्रासाउंड नियर साफ-साफ लउकी आ पुरुष शासित समाज के दबंगई भी नजर आई.आखिर 'नर से भारी नारी ' के अहमियत हमनीं के कब बूझबि जा आ लछिमी, देवी आ बेजान चीजु-बतुस के जगहा कब सही माने में जिंदा इंसान माने के मानसिकता बनाइबि जा? तबे जाके हमनीं के समाज सचहूं के तरक्की पसन समाज बनि पाई.

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri society

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