भोजपुरी में घुमक्कड़ी विशेष : चुनार जाके हेरा गइले के मन करेला

बनारस, प्रयागराज और चुनाव के एक संगे देखल जाय त इ एगो त्रिभुज बनेला. एगो अइसन त्रिकोण जौने में तीनों कोण एक से बढ़िके एक बा. खाली भौगोलिक संरचना ही नाहीं, बल्कि साहित्य रचना में भी इहे स्थिति भी. चंद्रकांता संतति अउरी भूतनाथ के कइसे भूलल जा सकेला. इहां महाराज भर्तृहरि या भरथरी चिरनिद्रा में बाने त शानदार किला अउर अद्भुत पत्थर चुनाव के यश चमकावत हवें स.

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  • Last Updated: October 8, 2020, 3:42 PM IST
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ड़ी बोली के सही माने में खड़ी कइले यानी ओके हिंदी भाखा बनवले में जौन भूमिका आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य किशोरी दास वाजपेयी अउरी आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के बा उहे भूमिका ओके चलौले-दौरौले यानी कि लोकप्रिय बनौले में भारतेंदु हरिश्चंद्र या देवकीनंदन खत्री जी के बा. संजोग ई कि दूनो जने ब्यवसायी परिवार से रहलन. भारतेंदु जी त आपन पुरहर कारोबार छोड़ के दिन-रात एही काम में, माने हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगवलन. खत्री जी आपन कुल्ही कामकाज करत-धरत अपने कामकाजी अनुभव के अपने लेखन में बिलकुल अनूठे ढंग से इस्तेमाल क के अइसन रचना देहलन जौने के लिए देस भर में ऊ दीवानगी छा गइल कि जौन लोगन हिंदी नाईं जानत रहलन ऊ लोगन ओके पढ़े बदे हिंदी सिखलन. ऊ कौनो ब्यावसायिक ज्ञान-बिज्ञान के नाहीं, ठेठ साहित्य के रचना रहल... लेकिन अइसन जौने में सारा ज्ञान-बिज्ञान के अलावा रहस्य-रोमांच भी भरल रहल. ई ऊ रहस्य रोमांच रहल जौने के ओह समय तक यूरोपियन साहित्य में भी थोरहे नमूना उपलब्ध रहल. ई रचना रहल ‘चंद्रकांता’, ‘चंद्रकांता संतति’ और ‘भूतनाथ’.

जौन हिंदी आज देस अजाद भइले के 70 साल बाद आठो पहर पाठक के रोअना रोअति हौ आ हिंदी दिवस, सप्ताह आ पखवारा के नाम पर अरबन के वारा-न्यारा क भइले के बादो हिंदी के लेखक एह लायक ना हो पौलें कि ऊ खाली लेखन के दम पर आपन रोटी-दाल चला पावें, ऊ हिंदी अपने सुरुआती दौर में सलेब्रिटी लेखक पैदा क भैल हौ. अइसन लेखक जेके पढ़े बदे आम लोग नए सिरे से भाखा सिखले हो, हमरे जानकारी में केहू दूसर ना हवे. अब ई अलग बाति ह कि खत्री जी के ठीक-ठीक मूल्यांकन, जौने के ऊ हकदार हवें, आज ले हिंदी साहित्य में हो ना पौलस. एही नाते बहुत लोग जब ई कहेलन कि हिंदी के ओकर वास्तविक सम्मान, जौने के ऊ हकदार बा, ना मिल पौले के लिए सबसे बेसी बिद्वान आलोचक लोग जिम्मेदार बा, त हमके अचिको गलत ना लगेले. चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति आ भूतनाथ जइसन उपन्यासन के लेखक के बारे में अगर ई महसूस कैल जात हो कि ओकरे साथे आलोचना जगत न्याय ना क पौलस त जाहिर बा कि ऊ खुद आलोचना बिधा पर बहुत बड़ा सवाल हौ. अब ई बहुत लोग कहाला कि हिंदी में और सब बिधा के त बिकास भैल, लेकिन आलोचने बिकसित ना हो पौलस. एके ऊ लोगन के कोहाइल ना माने के.

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ई तिनहुन में से कौनो के स्तर के उपन्यास ओह जोनर में कौनो दूसरे भाखा में ना पावल जाले. आ अगर भित्तर एह उपन्यासन के तह तक पइठ के देखीं आ ओही समय के दुसरी भाखा, खासकर अंगरेजी में रचल जा रहल साहित्य पर नजर डालीं त आपके एहमन खाली अय्यारी ना, कई अउरी चीज़ लउकाई. ई कुल्ही रचना 19वीं सताब्दी के अंतिम अउर बीसवीं सताब्दी के पहिले दसक के हईं. गौर करब त पाइब कि ई समय यूरोपियन समाज के लिए भी बहुत बड़े संघर्स के समय रहल. खाली सामरिक ना, ज्ञान-बिज्ञान के मामले में भी और इहे वजह रहल जौने के नाते खत्री जी अपने ढंग से यूरोपियन समाज के भारत के ओर से बौद्धिक जवाब देत रहलें. ई दुनहुन के तिलिस्म आ अय्यारी खाली मनोरंजन के बिसयबस्तु ना रहल. असल में किस्सागोई के बिसेसज्ञ मनई बदे केहू के आपन समर्थन आ बिरोध दुनो जतावे बदे एक्के तरीका रहाला आ ऊ हो कहानी गढ़ल.


अइसन अजब-गजब कहानी गढ़ा ना पौले रहती सन अगर खत्री जी नौगढ़ आ चकिया के जंगलन के खाक ना छनले रहतन. जंगलन के अपने ठेकेदारी के सिलसिले में खत्री जी एह जंगलन के चप्पा-चप्पा से परिचित हो गैल रहलन. बनारस से बहिराते ओहू जमाने में सबसे पहिले बाबा कीनाराम के आसरम पड़त रहे. इहे ऊ समय हौ जब बनारस में लाहिड़ी महाशय साक्षात रहलन. रहस्य-रोमांच के केतना किस्सा-कहानी सुनत-पढ़त खत्री जी बड़हल भइल होइहे एकर अनुमान रउरे लोगन अइसहीं लगा सकीले. ई किस्सा कहानी कुल मिल के खत्री जी के मनपाखी के ओह समय कौने ढंग से उड़ावे लगल होइहे जब बिंध्याचल जी के गोदी में बसल चुनार के रहस्यमय जंगलन. पहाड़न, नदियन अउर झरनन से उनकर सामना भैल होई.

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एन्ने कासी आ ओन्ने प्रयागराज मने दुन्नो ओर दुइ बड़हन आ ऐतिहासिक रूप से बहुते महत्वपूर्ण महानगर पड़ि गइले से चुनार के जस वैसहीं बिला गइल जइसे गंगा जी आ जमुना जी के बिच्चे पड़ि के सुरसती जी बिला गइली. अगर अइसन न होखत आ आपन पर्यटन बिभाग तनी निमने ओह जसगाथा के प्रचार-प्रसार क पौले रहत त चुनार अकेलहीं लाखन टूरिस्ट हर साल जोहावे भर के औकात रखे वाली जगहि हौ. पर्यटन के अइसन अचिके कौनो आयाम होई जौन चुनार में न हो. कामकाजी जरूरत त खैर अपनी जगह, बकिर हमके लगाला कि खत्री जी घुमक्कड़ो बहुत जबर आ मौलिक रहल होइहें. रहस्य-रोमांच भी उनकर ओतने प्रिय सगल रहल होई. न रहतन त ए तर से निम्मन घुमक्कड़ी ना क पौले रहतन आ न अइसन जबर उपन्यासन के आइडिया उनके मन में आइल रहत. एकर पूरा माहौल उनके इ चुनार आ चकिया उपलब्ध करौले.


ई चुनार पत्थर के समान, खेलौना, बरतन आदि आ तमाम इमारती समानन के लिए जेतना मसहूर हौ ओसे बेसी महत्वपूर्ण ई अपने इतिहास खातिर हौ. कासी से गंगा जी पार क के दक्खिन होत पच्छू ओर बढ़ीं त मुस्किल से 20 मील के दूरी पर चुनार आ जाले. बनारस में जेतना मंदिर आ घाट आपके लौकाले ऊ सब के लिए पाथर एही चुनार से गैल हवें. ई बाति खाली नेरवे भर के ना हौ, इहाँ तक कि रामकृष्ण मिशन के बेलूड़ मठ में जौन मंदिर हौ, उहो चुनारे के पथरे से बनल हौ. आ भारत के संसद भवन के निर्माण में त चुनार के पथरन क भरपूर इस्तमाल भइले हौ. आपके जान के का मालुम हैरत हो कि भारत के राष्ट्रीय चिन्ह मने असोक स्तंभ बनवे खातिर भी पाथर एही चुनार से गइल रहे. चुनार के पाथर से बनल असोक स्तंभ के एगो हिस्सा सारनाथ वाले संग्रहालय में आजो रखल हौ. सामान्य निर्माण से लेके बर्तन, खेलौना आ कलाकृति तक बनौले में एह पथरन के बहुतायत से इस्तेमाल के ऐतिहासिक साक्ख करीब तीन हजार से पावल जाले. कौनो दू राय नाईं बा कि एकरे पहिलों एकर इस्तेमाल खूब होत रहल होई.

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प्रकृति के सुंदरता एह पूरे जवार में अइसन भरल हौ कि भरल जवानी में मनई के संन्यास लेहले प बिबस क दे. इहाँ बनारस से ले के पच्छू चुनार, पुरुब चकिया आ दक्खिन रेनूकूट पार क के सींधी में सिंगरौली ले सघन आ अवरहा घुमक्कड़ी के दौरान हम ई महसूस कइले हईं कि इहाँ आके बेर-बेर जंगलवे में हेरा गइले के मन करेले. सुंदरता के देबी-देवता कुल्ही इहाँ आपन ठेहुना फोर के बइठ गइल हवन. भाई चुनार के मीते लोगन बुरा न मनिहें, बकिर हम ई कहे खातिर माफी चाहब कि सात्विक सौंदर्य के मामले में हिमालय के बात छोड़ दिहल जा त मैदानी क्षेत्र में चुनार जइसन छिनार ना देखलीं. केहू सौंदर्यप्रेमी अगर एह जंगलन में आ के हेरा जा त ओकर मन इहे करी कि ओके कबो केहू हेर न पावस.


चुनार के किला से थोरिके दूरी पर जरगों बाँध बा. इहाँ 27 गो नदी आ 77 गो नाला के पानी बटोर के ओहमें मछरी पालल जाली आ सिंचाई के काम भी होले. चुनार के किला और ए जवार के लेके खत्री जी जौन किस्सा-कहानी बुनलें, ऊ त बुनबे कइले एह किला के जे संस्थापक हवे, उनके लेके संस्कृत साहित्य किस्सा-कहानी से भरल-परल हौ. आ अधिकतर ई कुल्ही अइसने कहानी हई जौन रहस्य-रोमांच से लेके अपने समय के राजनीति के साथे-साथे अध्यात्म बोध से भी भरपूर हईं. लगभग ओही तरह से सिलसिलेवार एक से दुसरी आ दुसरी से तिसरी जुड़त कहानी के उपन्यास बनावे वाली. हाँ, एकर स्थापना महाराजा बिक्रमादित्य कइले रहलन, अपने भाई महाजोगी भरथरी जी के ठहरे बदे.

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अइसन मानल जाले कि महाजोगी भरथरी एहीं आपन देह छोड़ के महासमाधि लिहले रहले. अब का हाल बा, ना कहि पाइब लेकिन सन 2008 में आ ओकरे पहिले 1997 आ 93 में हम अपने आँखी उहाँ भरथरी महराज के समाधी पर लोगन के धूप-दीप देखावत देखले हईं. ओही जा एक जनी जोगी से भी हमार भेंट भइल रहे, जे अपना के भरथरी महराज के सेवक बतौलन. बहरहाल, एह कड़ी में हमरे खिआल से एतने बहुत बा. चुनार के बिस्तृत इतिहास, पुरातत्व आ कला पर बाति अगिली कड़िन में.

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