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    Bihar Election 2020-भोजपुरी में पढ़ें - बिहार चुनाव क संजीवनी बूटी ह आरक्षण

    बिहार वो प्रदेसन में से ह जहां पिछड़ा वर्ग के सबसे ज्यादा नेता लोग भइल बा.
    बिहार वो प्रदेसन में से ह जहां पिछड़ा वर्ग के सबसे ज्यादा नेता लोग भइल बा.

    दक्खिन भारत के बाद बिहार में ही पिछड़ा वर्ग से सबसे ज्यादा नेता निकल ह लोग. इहां बहुत लंबा समय से जातिगत भागीदारी के बात चल रहल ह. ये बार के चुनाव में आरक्षण के नारा के का स्थिति बा.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 6, 2020, 2:35 PM IST
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    बिहार में चुनाव क बयार बा. चुनाव क बयार बहे अउर जात पात क बात न होखे अइसन संभवे ना बा. जात पात के चलते आरक्षण क सबसे बड़का असर बिहारे के राजनीति पे दिखाई देला. इहां देस के आजाद होला के बाद से पिछड़न खातिर सरकारी नौकरियन अउर शिक्षण संस्थानन में आरक्षण क प्राबधान करे क मांग उठ गइल रहे. एके उठावे वाला समाजवादियन क विचार रहे कि देस के दबल कुचलल पिछड़ा वरग के आगा बढ़वले बिना एकर चौतरफा विकास संभव ना हव. कुछ अइसने विचार देस आजाद भइला के बाद दिल्ली क कुरसी पे बइठे वाला पहिला परधानमंतरी जवाहरलाल नेहरू अउर उनकर पार्टी कांग्रेसो क रहे. एकरे चलते दिल्ली क सरकार दलित अउर आदिवासियन खातिर सरकारी नौकरी अउर शिक्षण संस्थानन में 22.5 फीसदी आरक्षण क प्राबधान त कइबै कइलस, इ दबल कुचलल वरग खातिर में संसद अउर परदेस के बिधानसभा क सीटन के भी 22.5 फीसदी आरक्षित कर देहलस.

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    समाजवादी आवाज
    आरक्षण पर ई प्राबधान से भी समाजवादी लोगन के संतोस न भइल. उ लोग देस के समूचा पिछड़ा वरग खातिर आरक्षण चाहत रहले. ऐ के लेकर उनकर आन्दोलन चलते रहल. समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया क नेताइ में समूचा उत्तर भारत से लगा के पूरब पछिम तक समाजवादी लोग समाज में बराबरी क बात उठावे लगल. दक्खिन में बिसेस कर तब के मद्रास इलाका में द्रविड़ आंदोलन अलगे जोर पकड़ले रहल. समाजवादियन क नारा रहे. संसोपा ने बांधी गांठ. पिछड़ा पावे सौ में साठ . माने कि देस में पिछड़ा वरग साठ फीसदी ह त उनकर बिकास खातिर हर भाग बिभाग में उनकर हिस्सेदारी भी साठे फीसदी होवे के चाहि, तबहिए जाके बरिसों से सतावल दुत्कारल गइल इ वरग के लोग आगा बढ़ पाई. देस आजाद होइला के दसो बरिस बादो अपवाद के छोड़ देहल जाओ त हर परदेस के पिछड़न क हालत में कौउनो बिसेस सुधार न भइल त सौ में साठ वाला समाजवदियन क नारा अउर जोर मारे लगल.
    बड़ बदलाव


    बिहार में इ नारा त एतना जोर मरलस कि एकरे चलते जगजीवन बाबू, श्रीकिसुन बाबू अउर अनुग्रह बाबू जइसन कांग्रेसी नेता के रहते पिछड़ा समाज से कर्पूरी ठाकुर, भोला पासवान शास्त्री, दरोगा राय अउर रामसुंदर दास जइसन कई नेता लोग भी बिहार क राजनीत में आपन परभाव देखावे लगलें.

    70 के दसक में पिछड़ा समाज से आवे वाला नेतन क गिनती अउर बढ़े लगल जउन सब आगा चल के बिहार में त नाम कमैबे कइलस देस भर में उनका नाम पे चरचा होवे लागल. 74 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण क संपूर्ण क्रांति क आंदोलन में बढ़ि चढ़ि के हिस्सा लेवे के चलते रामविलास पासवान, लालू परसाद, अउर नीतिस कुमार जैइसन छात्र नेतन क बिहार भर में चरचा होवे लागल. उ आंदोलन में अगड़ों जाति क नेता लोगन क भी हिस्सेदारी कम ना रहे लेकिन पिछड़ा वरग के नेता लोग ही आगा चलि के बिहार क गद्दी पर बइठल बा बिहार की ओर से दिल्ली क सत्ता में हिस्सेदारी कइलस.

    आखिर दक्खिन के बाद बिहारे से पिछड़ा समाज के एतना नेतन के निकले क का कारण हो सकत हौ. एकर सबिसे आसान बिसलेण सायद इहे होई कि बिहार में अगड़ा पिछड़ा क बीच क खाई का चौड़ाई ढेरे जादा रहल होई. एपर 60 के दसक में समाज में बराबरी के लेके समाजवादी आंदोलन अउर 90 में मंडल आयोग क सुपारिस लागू कइले क विरोध होवे के चलते ही बिहार क राजनीत पिछड़ा समाज के नेतन क मुट्ठी में चल गइल ह. इहे कारण ह कि 77 में जनता पार्टी क सरकार बनले पर बिहार क गद्दी कर्पूरी ठाकुर के हाथे लगल. जबकि 74 के आंदोलन अउर 77 के चुनाव में जाति बिरादरी कौउनों चुनावी मुदद् न रहे. मुद्दा रहे बिहार समेत देस भर में फैइलल भ्रष्टाचार अउर ओपर परदा डाले खातिर आपातकाल लगावल. तबहू विधायक दल क नेता बनले कर्पूरी ठाकुर उहो अगड़ा समाज से आवे वाला सत्येंदर नारायाण सिन्हा के हरा के. 90 में त मंडल आयोग के लागू होवे के पहिले ही बिहार क गद्दी खातिर दलित समाज क रामसुंदर दास अउर पिछड़ा वरग क नेता लालू परसाद के बीच लड़ाई रहे. चंद्रशेखर खेमा से रघुनाथ झा के खड़ा होवे के चलते विधायक दल क नेता अउर एकरा चलते मुख्यमंत्री लालू परसाद बनले.
    मंडल के जादू
    उहे साल परधानमंत्री बिसनाथ परताप के मंडल आयोग क सुपारिस लागू करे के चलते त राजनीत क हवा पूरिये तरह बदल गइल. पहिले मंडल बनाम कमंडल भइल फेरो सत्ता में जादा हिस्सेदारी पावे क चाह में मंडल बनाम मंडल भइल . जेकरा चलते लालू राबड़ी के बाद बिहार क गद्दी खातिर नीतिसे कुमार क नाम सबसे ज्यादा पसंद कइल गइल. 2005 में गद्दी सम्हरते नीतिस कुमार आरक्षण क राजनीत के एगो दोसरा ओर ले गइलं. अगड़ा पिछड़ा क राजनीत त उ मुसलिम समाज में भी ढूका देहलें. उनकर सरकार में पसमंदा माने कि मुसलिम समाज क पिछड़ा वरग के आरक्षण क लाभ दिवाए क प्राबधान कइल गइल. एकरा पहिले पूरा मुसलिम समाज के ही पिछड़ा कहल जाओ लेकिन धर्म क आधार पर आरक्षण क प्राबधान ना होवे के चलते एकर लाभ मुसलिम समाज क ना मिले. कहे मतलब बिहार क आरक्षण क राजनीत मुसलिम समाज के भी अगड़ा पिछड़ा में बांट देहलस.

    नीतीस के दांव
    एकरा अलावा नीतिस पिछड़न अउर दलितन में भी विभाजन करा देहलें. पिछड़ा में अति पिछड़ा अउर दलित में महा दलित के वरग बना के इ समाज के जादा दबल कुचलल वरग के लोगन के आरक्षण क लाभ दिआवे की राजनीत में नीतिस कुमार सफलो भइलें. वइसे अति पिछड़ा समाज के सबसे पहिले लाभ दिवाए क परयास कर्पूरी ठाकुर क रहल जे 1978 में मुंगेरी लाल आयोग क सुपारिस लागू कइले जेमे पिछड़ा वरग के 20, महिला के तीन अउर अगड़ा समाज क गरीब लोगन खातिर तीन फीसदी क आरक्षण क प्राबधन रहे. एकरा अलावा पिछड़न के 20 में से अति पिछड़ा वरग खातिर 12 फीसदी क आरक्षण रहे. वइसे एकरा चलते अगड़ा समाज उनसे नाराजो हो गइल अउर उनकरा के बिहार के गद्दी से हटा देहल गइल. लेकिन उनके हटावे क खुरपेंच करे वाला नेतन के दलित समाज क नेता रामसुंदर दास के ही मुख्यमंत्री बनावे के पड़ल.

    कबके बीज कब कटाइल फसल
    बाद में सर्वोच्च न्यायालय से अगड़ा समाज के गरीबन खातिर आरक्षण के प्राबधाने खारिज हो गइल जेकरा चलते कर्पूरी सरकार क इ फैसला भी ठंडा घर में डाल देहल गइल. लेकिन बिहार क राजनीति में कर्पूरी ठाकुर आरक्षण क जौन बीया बो गइल रहलें ओकर फसल पिछड़ा वरग क नेता लोग 1990 के बादे से आजो काटत ह अउर आगेहू काटे क आसा बा. तबे त 74 के आंदोलन में छात्र नेता के तौर पर नाम कमाए वाला समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी कहे लं कि बिहार क राजनीत में उनकर जोगदान केहू से कम नाही ह लेकिन उनकर सबसे उपर वाला कुरसी पर बइठल संभब ना हौ काहे से कि बिहार क राजनीत में पिछड़ा वरग क हनक अब सायदे कब्बो खतम होई.

    (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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