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    भोजपुरी में पढें- बिहार के राजनीति में जातिवाद- कतना पुरान ह इ रोग

    बिहार में जातिवाद के इतिहास बा?
    बिहार में जातिवाद के इतिहास बा?

    बिहार के राजनीति के चर्चा होते सुने वाला जातिगत समीकरण के बात करे शुरु क देला. वइसे इ रोग दूसरा जगहो प बा, लेकिन बिहार में कहि देला लोग कि वोट आ रिश्ता त जतिए में होई. आखिर इ जाति के राजनीति राज्य में कब से आइल.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 10, 2020, 1:15 PM IST
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    हमरा गाँव में लगभग 29 गो जाति बा. 1993 में जब अपना गाँव के बायोग्राफी लिखनी त हमरा अंदर के कवि ओह घरी कुछ बेसिए मुखर रहे आ एह 29 गो जाति लोग के कुछ एह तरे कविता में छन्द में बान्ह देलस.

    अहीर, गोड़, नोनिया, बनिया, डोम, दुसाध, चमार,
    भर, भांट, कमकर, कुर्मी, बरई और लोहार

    ततवा, तेली, तियर, बीन, नट, कोइरी, कोंहार
    महापात्र, मुस्लिम, मल्लाह, धोबी और सोनार



    नाऊ, पंडित, लाला, ठाकुर ..

    उनतीस जातियों का ये झुण्ड

    सीधा, शरीफ, हुंडा तो हुंड

    कौसड़ के दर्पण में निहार

    मन बोल रहा है बार-बार

    हे कौसड़ तुमको नमस्कार !

    गाँव-जवार के लोग हमरा से ई कविता खूब सूने. तब लइका रहनी. इंटर पास कइले रही. तब ई ना पता रहे कि एह जतिये प बिहार के राजनीति टिकल बा.

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    साँच कहsतानी जब-जब बिहार के राजनीति के बात होला, तब-तब ओहिजा के जाति में बंटल समाज आंखि के सोझा झलके लागेला. त सवाल उठsता कि का बिहारी राजनीति में जातिवाद शुरुए से बा कि आगे चल के ई बेमारी लागल? त एकर जवाब निराशाजनके लउकेला कि ई बेमारी देश के आजादी के ठीक एक साल पहिले 1946 में बिहार में बनल पहिला सरकार के समये से बा. बिहार में ई जवन पहिला सरकार बनल ओकर मुख्यमंत्री रहले श्रीकृष्णा सिंह आ उपमुख्यमंत्री के तौर प अनुग्रह नारायण सिंह. ओह घड़ी सत्ता चाहे विपक्ष दूनों के नेतृत्व सवर्ण जाति के हाथे में रहे. हालांकि ई विश्वास कइल आज के समय में बड़ा मुश्किल लागेला कि 1952 तक बिहार देश के सबसे बढ़िया शासन वाला राज्य रहे अउर एहिजा के शासन व्यवस्था में प्राचीन मगध साम्राज्य के शासन प्रणाली के अक्स लउकत रहे. मानल जाला कि सम्राट अशोक के शासनकाल में मगध में जवन अर्थव्यवस्था रहे उ एक तरह से आजु आधुनिक उदारवादी अर्थव्यवस्था के नींव हवे. एकरा प अंतरराष्ट्रीय स्तर प ढेर कुल्ह शोध आ बहसो भइल बा. बाकिर ई दुर्भाग्य बा कि अइसन गौरवशाली इतिहास आ परंपरा के रहला के बादो आज बिहार प एगो पिछड़ा राज्य के टैग चिपकल बा.

    बिहार के पहिला मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्णा सिंह 1946 से 1961 तक लगातार एह पद पर बनल रहले. बिहार में ई समय कांग्रेस के सुनहरा समय रहे. खाली बिहारे में काहे पूरा देश में ओह समय कांग्रेस के खिलाफ कवनो ओह कद के विपक्ष रहबे ना कइल. 1961 के बाद राज्य में पिछड़ी जाति के बीच राजनीतिक सत्ता के ख्वाहिश जागे लागल आ कोइरी, कुर्मी अउर यादव जाति के लोग राजनीतिक तौर पर मुखर भइल. एही मुखरता के नतीजा रहे कि दरोगा प्रसाद राय राज्य के मुख्यमंत्री बनले, एकरा से ई भइल कि पिछड़ी जाति में जवन राजनीतिक आकांक्षा अंकुरत रहे ओकरा फले-फूले के तनी खाद-पानी मिलल. बाकिर, कांग्रेस में एगो गुट जवन रहे ओकरा प सवर्ण जाति के वर्चस्व रहे, एह से कांग्रेस के पिछड़ी जाति के लोगन में असंतोष पनपे लागल. एही समय में एगो कोइरी नेता के रूप में जगदेव प्रसाद बिहारी राजनीति के फलक प अइले. उनका नेतृत्व में शोषित समाज दल नाम से एगो पार्टी बनल हालांकि ई पार्टी बाद में जाके कांग्रेस से मिल गइल आ कांग्रेस के जब सरकार बनल त इहो सत्ता में रहे. जगदेव प्रसाद के रिश्तेदार सतीश प्रसाद उनकर राजनीतिक विरासत के साथे राजनीति में आके सत्ता तक त पहुंचले बाकिर ऊ एक सप्ताह तक ही मख्यमंत्री रह पवले. दरोगा प्रसाद राय आ सतीश प्रसाद के अलावा 1990 तक अउर दूगो कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनल.

    पहिला बेर गैरकांग्रेसी जनक्रांति दल के नेतृत्व में 1967 में बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में सरकार बनल रहे. एकरा बाद 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 तक कांग्रेस के एगो धड़ा कांग्रेस (ओ) रहे, ऊ सत्ता में रहल आ मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री रहले.

    बिहार के राजनीति पर बात करत वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक श्रीराजेश मानेले कि 1970 के दशक बिहारी राजनीति के एगो बदलाव के युग रहे. 1970 के बादे से एहिजा कांग्रेस के जनाधार कमजोर होखे लागल. एकर कारण के व्याख्या करत श्रीराजेश बतावेले कि आजादी के तकरीबन ढाई दशक बीतत-बीतत राज्य में पिछड़ी जाति के बीच राजनीतिक सत्ता के आकांक्षा बलवती हो गइल रहे. कारण कि कांग्रेस में नेतृत्व के स्तर पर सवर्ण जाति के ही वर्चस्व रहे आ पिछड़ी जाति के महत्व ना दिहल जाव. एकरा से जवन पिछड़ी जाति में असंतोष पनपत रहे ओकरा के दरोगा राय आ जगदेव प्रसाद चाहे सतीश प्रसाद के उभार से बल मिलल. 22 दिसंबर 1970 के सोशलिस्ट पार्टी के कर्पूरी ठाकुर राज्य के सत्ता में अइले आ पहिला बेर के उनकर कार्यकाल तकरीबन छह महीना रहल आ फेर 24 जून 1977 से 17 फरवरी 1980 तक मुख्यमंत्री के रूप में कर्पूरी ठाकुर आ रामसुंदर दास मुख्यमंत्री रहले.

    अइसे त बिहार के राजनीतिक रूप से सबसे सजग प्रदेश मानल जाला बाकिर इहो ओतने सांच बा कि ई राज्य देश के सबसे अस्थिर राजनीतिक प्रदेश 1990 तक रहे. इहे कारण रहे कि 1961 में श्रीकृष्णा सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटला के बाद से 1990 तक राज्य में 29 साल में 23 बेर मुख्यमंत्री बदलले आ पांच बेर राज्य में राष्ट्रपतियो शासन लागल आ सबसे मजेदार बात ई बा कि ई 23 बेर बदलल मुख्यमंत्रियन में 17 बेर त कांग्रेसे के मुख्यमंत्री रहले.

    1973 में गुजरात में शुरु भइल छात्र आंदोलन जब 1974 में बिहार पहुंचल त ई कवनो राजनीतिक आंदोलन के रूप में ना रहे बाकिर 1974 में, जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में ई आंदोलन एगो जन आंदोलन के रूप में विकसित भइल आ जयप्रकाश नारायण, वी. एम. टरकुंडे के साथे मिल के सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान कइले. ई लोग 1974 में सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी आ 1976 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, दूनों गैर-सरकारी संगठन के स्थापना कइल लोग आ ई आंदोलन खाली बिहारे ले ना रहल बलुक एकरा से पूरा देश प्रभावित आ आंदोलित भइल. इंदिरा गांधी के सत्ता से बेदखल होखे के पड़ल. बिहार में, जनता पार्टी 1977 के आम चुनावो में सब चौबीसो लोकसभा सीट जीतलस अउर बिहार विधानसभा में सत्तो हासिल कइलस. बाकिर ऊ अपना भीतर के कलह से जल्दिये धराशाई हो गइल.

    फेर जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति से बिहार में नेतृत्व के एगो नया पीढ़ी उभर के सामने आइल. एकरा में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रविशंकर प्रसाद, रामविलास पासवान रहले.
    ई नयका पीढ़ी समाजवादी विचारधारा के रहे, एकरा प राममनोहर लोहिया अउर जेपी के प्रभाव रहे अउरी इनका प्राथमिकता में जाति के बंधन तूड़े के भाव रहे. 1980 के दशक के अंत होत-होत एह लोग के विचारधारा दरके लागल रहे. 1989 में जब केंद्र में वीपी सिंह प्रधानमंत्री बनले त जनता दल सरकार जब मंडल आयोग के रिपोर्ट लागू कइलस त एकर जोरदार समर्थन बिहार में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार आ रामविलास पासवान कइले.

    ठीक एकरा बादे बिहार में लालू प्रसाद यादव के उभार भइल. ऊ 10 मार्च 1990 के मुख्यमंत्री बनले. बिहार के राजनीति में लालू यादव सर्वाधिक चर्चित नेता भइले. ऊ अपना भदेस रहन-सहन, बोल-चाल आ मसखरापन से खासा लोकप्रियता हासिल कइले. पिछड़ा वर्ग के बिहार के सबसे बड़ नेता के रूप में उभरलें. ई बात सही बा कि बिहारी राजनीति में सवर्ण जाति के वर्चस्व तूड़े में लालू प्रसाद के महती भूमिका बा, साथहीं उनका के राज्य में सामाजिक न्याय के प्रणेता भी मानल जाला. बाकिर एकरा साथे उनका प राज्य में लचर शासनव्यवस्था, विकास के गति के रोके वाला आ भ्रष्टाचार के बढ़ावा देवे वाला मुख्यमंत्री के रूप में भी जानल जाला. चारा घोटाला के आरोप लगला के बाद लालू प्रसाद अपना राजनीतिक रसूख के बल पर खुद मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे के अपना पत्नी राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनवले. बाकिर उनकर आ राबड़ी देवी के संयुक्त 15 साल के कार्यकाल के ‘जगंलराज’ के तौर प परिभाषित कइल गइल. एह ‘जगंलराज’ के बदनूमा दाग से 2020 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल आ ओकर नेता आ लालू के लाल तेजस्वी यादव के सामना करे के पड़ल. 2005 तक राष्ट्रीय जनता दल के राज्य में शासन रहल. राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री रहला के बादो एह पूरा 15 साल के अवधि के लालू राज के रूपे में जानल जाला.

    एह बीच में राज्य में कांग्रेस एकदम हांसिया प आ गइल आ भारतीय जनता पार्टी कबो अइसन स्थिति में ना आ पवलस कि ऊ अपना बूता प सरकार बनो सको. 2005 में लालू-राबड़ी के तीन गो कार्यकाल के बाद बिहार में फेर एगो राजनीतिक बदलाव के बयार बहल आ विधानसभा चुनाव में नतीजा त्रिशंकु विधानसभा के उभरल. जॉर्ज फ़र्नांडिस के साथे नीतीश कुमार जनता दल (यू) बना के सत्ता में अइले. बाकिर सरकार बनावे खातिर नीतीश कुमार के ढेर पापड़ बेले के पड़ल. 24 नवंबर, 2005 के भाजपा के समर्थन से नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बनले. ऊ बिहार के राजनीति के अपराधमुक्त करे आ विकास के रास्ता प चलावे के वादा कइले.

    हालांकि नीतीश के मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार में शासन व्यवस्था सुदृढ़ भइल, सड़क-बिजली के दशा-दिशा सुधरल, शराबबंदी, सामाजिक विकास के कामो भइल, बिहार के नकारात्मक छवि में सुधार आइल बाकिर बिहार के सबसे बड़ समस्या जवन रहे औद्योगिक आ कृषि जनित उद्योग के स्थापना कइल चाहे बिहार के बंद औद्योगिक ईकाई सब के फेर से खोलवावे के दिशा में उनकर कवनो ओइसन योगदान नइखे लउकत जवना के बारे में कहल जाव. एकरा वजह से बिहारी युवा सब के रोजगार खातिर दोसरा राज्यन में पलायन जारी रहल. 2020 के विधानसभा चुनाव में विपक्षी पार्टी राजद जब 10 लाख सरकारी नोकरी के चुनावी वादा कइलस, त एह चुनाव के एक तरह से कहल जाव त रुख मुड़ गइल. हालांकि जवन रुझान लउकता ओकरा अनुसार जवन मतदाता लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन देखले बाड़े उ लोग राजद के वोट नइखे दिहले बा बाकिर जवन युवा पीढ़ी बा ओकर वोट राजद के झोली में गइल बा.
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