Bhojpuri: विरह के चासनी में सउनाइल बिरहा, सुनें खातिर बेयाकुल हो जाला लोग!

बिरहा रचे आ गावे के एगो लमहर परिपाटी रहल बा. तबे नू हजारन साल से ई वाचिक परंपरा में रचात आउर गवात आइल बा. बिसराम के बिरहा इतिहास रचले बाड़न स आ दुकतना पीढ़ी से उन्हुका बिरहा के धाक जमल रहल बा.

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बिरहा आ लोरकी एगो जाति विशेष के कंठ से फूटल अइसन रसदार लोकगीत ह,जवन सउंसे भोजपुरिया समाज के कंठहार बनि गइल बा. लोरकी त एगो अइसन वीरगाथा काव्य ह,जवन लोरिकायन लोकमहाकाव्य के हिस्सा होला आ ई वीर लोरिक आउर संवरू के अतुलनीय वीरता-पराक्रम के कहानी सरस काव्य में कहेला. दोसरा ओर एकरा से ठीक उलुटा, बिरहा में विरह के पराकाष्ठा होला आ ई तन-मन में अइसन पीर जगावेला,जवन बेरि-बेरि आंतर के उदबेगत रहेला. ई बात सर्वविदित बा कि कविता के जनम मानवीय करुना से भइल रहे आ कौंच चिरई के बध देखिके आदिकवि वाल्मीकि के मुंह से कविता फूटि परल रहे. तबे नू महाकवि सुमित्रानंदन पंत

कविता के 'आह से उपजल गान' बतावत कहले रहलन-

पहिल कवि होई रहल वियोगी 

आह से उपजल होई गान,
निकलिके अंखिया से चुपचाप 

बहुत होई कविता अनजान.

(हिन्दी से अनूदित)



मरद-मेहरारू भा परेमी के एक-दोसरा खातिर आंतर में उठेवाला उदबेग जब लोकधुन प एह किसिम से रचाला कि ढेर देरी ले दिल के कचोटे बेगर ना रहे,त ऊ रस में डूबल लोककाव्य बिरहा कहाला आ ओमें लोकसंवेदना के अनूठा भाव भरल रहेला. बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्रो के कहनाम रहे-

जामें रस किछु होत है, ताहि सुनत सब कोय,

भाव अनूठो चाहिए, भासा काहू होय.

इहे वजह बा कि चाहे कवनो भाषा-भाषी होखसु,बाकिर जब बिरहा गावेवाला के टांसी जइसहीं कान में परेला,सुनेवाला के आल्हर करेजा साले लागेला आ सउंसे काम-धाम छोड़िके ऊ बिरहा सुने बदे बेयाकुल हो जाला.

बिरहा रचे आ गावे के एगो लमहर परिपाटी रहल बा. तबे नू हजारन साल से ई वाचिक परंपरा में रचात आउर गवात आइल बा. बिसराम के बिरहा इतिहास रचले बाड़न स आ दुकतना पीढ़ी से उन्हुका बिरहा के धाक जमल रहल बा.

लोरकी गावेवाला जहवां दूनों कान में आपन तर्जनी अंगुरी डालिके वीरत्व भाव से लोरिकायन के गाथा गावेला, उहंवें बिरहा गवैया के बायां तरहत्थी बांया कान प दहिना हाथ ललकार के मुद्रा में आगा बढ़ल रहेला. कसरती-पहलवानी देह-धाजा वाला गवैया जब धोती-कुरता में सजि-धजिके पगरी बन्हले साज-बाज वालन का संगें मंच के शोभा बढ़ावेला, त सुननिहारन के भीड़ ठकचि जाले. जवना घरी संचार आ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कवनो अता-पता ना रहे,मन के रंजित करे के उतजोग ना रहे, तब रात-रात भर बिरहा गावे-सुने के कार्यक्रम चलत रहे आ बिरहा गवैयन के दंगलो होत रहे. जब तवा वाला कुकुरमुंहा रेकार्ड के चलन भइल,त ओकरा प सूई धऽके लाउडस्पीकर पर गवाएवाला बिरहा के धूम मचे लागल आ शादी-बियाह,पर-परोजन के मोका प बिरहा के धुन घर-अंगना से लेके खेत-खरिहान ले गूंजे लागल. फेरु कैसेट आ डीवीडी प्लेयर के जबाना आइल,बाकिर पहिले वाली बात ना रहल. बिरहा का बहाना से अश्लीलता आ फूहरता परोसाए लागल. फेरु त लोक के एह अनमोल धरोहर के आस्ते-आस्ते लोप होखे लागल.

भोजपुरिया समाज के पलायन शुरुए से चरचा में रहल बा. आर्थिक रूप से पिछड़ल भोजपुरिया नवही कमे उमिर में घर-परिवार बसाके रोजी-रोटी का फिराक में परदेस में (खास तौर से कोलकाता, आसाम,उड़ीसा) चलि जात रहलन आ गांव प रहि जात रहली कमसिन उमिर के अकसरुआ मेहरारू, जेकरा दुख-तकलीफ आ आफत-बिपत के कवनो ओर-छोर भा अंत ना रहे. ओही अनकहल पीर के दास्तान बिरहा का मार्फत कहाए लागल, जवना में दरद-बाथा का संगहीं संजोग सिंगार आउर समाज के तींत-मीठ सांचो के रसदार बोल फूटे लागल. आगा चलिके ओही कथानक पर पूरबी रचिके महेन्द्र मिसिर 'पूरबी के पुरोधा' कहइलन आ लोकनाटक 'बिदेसिया' के सिरिजना कऽके

भिखारी ठाकुर 'भोजपुरी के शेक्सपियर आ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र' के खिताब पवलन.

विरह के ऊहे गहिर-गझिन लोकसंवेदना बिरहा के जान रहल बा,जवन एकरा के मानवीय करुना से लोककाव्य का रूप में प्रतिष्ठित करत बा. एह संदर्भ में लोकसाहित्य के अध्येता कृष्णदेव उपाध्याय जी लिखले बानीं-'बिरहा विरह से जनमल बा, जवना में सामाजिक वेदना के अपना वेदना का संगें कहल जाला आ सुनेवाला मनोरंजन के साथे-साथ छंद, काव्य, गीत आउर रस के आनंद लेला. '

अब बिरहा के किछु बानगी देखल जाउ. पहिले कांचे उमिर में बियाह हो जात रहे,बाकिर गवना खातिर लमहर इंतजार करेके परत रहे. अइसने एगो बियहल-दानल लरिकी के मन के पीर केहू नइखे बूझत आ ओकर पिअरात देह देखिके पिअरी रोग बतावत बा,बाकिर असली कारन त ई बा कि ओकर बियाह का बाद अबहीं ले गवना ना भइल. ओकरा जबान प त दिन -रात बस पिया के नांव बा आ ओही वियोग में ओकर करेज कुहुंकत रहेला-

पिया-पिया रटत पीयर भइली देहिया 

लोगवा कहेला पिंडरोग, 

गउवां के लोगवा मरमियो ना बूझे 

भइल गवनवा ना मोर!'

मेहरारू के अपना मरद प नाज़ बा आ मरद अपना मेहरारू प जान छिरिकत बा. दूनों के एक-दोसरा प समरपन देखते बनत बा.

जइसे दरियाव में चेल्हवा मछरी सोभेले, लड़ाई के मैदान में तरुआर सोभेला,ओइसहीं सभा में मरद के पगरी आ सेज पर मेहरारू के लिलार के टिकुली

शोभायमान होले. बिरहा में उपमा-उपमान के अनुपम छटा देखते बनत बा-

जलवा में सोभे जइसे चेल्हवा मछरिया, 

रनवा में सोभे तरुआर, 

सभवा में सोभे रामा सैंया के पगरिया 

सेजिया प टिकुली हमार!

बाकिर बिरहा में खाली पति-पत्नी के विरह-वियोगे भर नइखे उकेराइल. पुरुष प्रधान समाज में बेटियन के असुरक्षा हरदम चिंता-फिकिर के विषय रहल बा आ बिरहा में एहू पच्छ पर प्रतीकात्मक ढंग से गहिर भावबोध के पांती सिरिजाइल बा-

पिसना के परिकल मुसरिया-तुसरिया 

दूधवा के परिकल बिलार,

आपन-आपन जोबना सम्हरिहऽ बिटियवा 

रहरी में लागल बा हुंड़ार!

पिछलकी सदी के अस्सी के दशक में बिरहा रचे-गावे वालन में एगो नांव लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुंचल रहे आ ऊ नांव रहे बालेश्वर के. बालेश्वर के बिरहा खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से यश भारती सम्मान मिलल रहे आ ऊ ताजिनिगी बिरहा के पर्याय बनल रहलन.

एगो बिरहा में ओह बलमा के गुमशुदगी के जिकिर होत बा, जे बलिया के ददरी मेला में भुला गइलन आ मेहरारू जोहत-जोहत हलकान बाड़ी-

हमार बलिया बीचे बलमा 

हेराइल सजनी!

अइसहीं, सिंगार-पटार से जुड़ल कहवां के का-का मशहूर ह,एहू पर एगो बिरहा के बड़ा शोहरत मिलल रहे-'नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के--!'

ऊ भगवान से इहो विनवत बाड़न कि रोज फजीरे केकरा से भेंट होखे आ केकरा से ना होखे. एमें ऊ चरितर के बात करत बाड़न, जवना में तिरियोचरितर के चरचा आवत बा. उन्हुकर साफ कहनाम बा कि मतलबी संघतिया से बेहतर बा दुसमनी साधत दुसमन-'दुसमन मिले सबेरे, मगर मतलबी यार ना मिले---!'

बिरहा के एगो खासियत इहो होला कि एकरा में जगह-जगह सूक्तिपरकता के दर्शन होला आ ई सूक्ति गंवई जिनिगी के मीठ-तींत-खटतुरुस अनुभव से जुड़ल होली स. जइसे खेत में रहर के खूंटी छोड़ि दीहल जाउ,त ओमें घुन लागि जाई. जइसे घइली में धइल आटा-सातू में घुन लागि जाई. ओइसहीं नइहर में परल-परल बहू में आ परदेस में अकसरुआ रहेवाला मरद में घुन लागि जाला. का गजब के परतोख दिहल गइल बा एह बिरहा में-

खेतवा में घुनेला रहरी के खुंटिया 

गगरी में घुनेला पिसान,

पियवा जे घुनेला ओही कलकतवा में 

नइहर में बहुआ नादान!

बिरहा में सउंसे जनसमुदाय के, लोक के सोच के अनुगूंज होत रहे आ ओमें जिनिगी के साइते अइसन कवनो पच्छ होखे, जवना के चित्र जियतार ढंग से ना उकेराइल होखे.

बाकिर जवना तरी बाजारवादी मतलबी आ सवारथी सोच परंपरा आउर लोकसंस्कृति के, लोकसंवेदना के लीलत जा रहल बिया,

ओही तरी लोप होत जा रहल बा बिरहा,फगुआ, चैता,कजरी, बारहमासा वगैरह के. महंगी का मारे बढ़त जद्दोजहद, आपाधापी आ अपसंस्कृति के पइसार एकरा लोप के मूल में बा. ना ऊ सौन्दर्यबोध बांचल बा, ना देखे-परखे के ऊ पारखी नज़र. फेरु का बिरहा, का जोगीरा आ का कजरी! एगो बिरहा के पांती में कहल गइल बा-

महंगी का मारे अब बिरहा बिसरि गइल 

भूलि गइल कजरी, कबीर, 

देखिके गोरिया के मोहनी मूरतिया 

अब उठे ना करेजवा में पीर.

शहरी ढकोसला, बनावटीपन आउर मृगमरीचिका का पाछा पागल उत्तर आधुनिक समाज बिरहा से दूर होत जा रहल बा. ऊ प्लास्टिक के फूल खातिर दीवाना बा. जॉर्ज ग्रियर्सन कबो बिरहा के जंगली फूल कहले रहलन, बाकिर एकइसवीं सदी के भौतिकवादी समाज ओह कुदरती फूल के कीमत का बूझीं? (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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