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जतरा के पतरा: जानीं, कइसे धुआँ के करिखा बना देला माटी के सोना

निजामाबाद में बनेला दुनियाभर में मशहूर ब्लैक पॉटरी

निजामाबाद में बनेला दुनियाभर में मशहूर ब्लैक पॉटरी

दुनिया भर में मसहूर एह बरतन आ कलाकृतियन के बनौले के तरीका का हौ। आखिर अइसन कौन बाति होले जौन एके खास बना देले! पढ़ीं...

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    जतरा के पतरा के पिछली कड़ी में बाति भइल रहल निजामाबाद के करियरकी माटी के कलाकारी के, जौने के दुनिया भर में ब्लैक पॉटरी के नाम से जानल जाले। ओह बेरी बाति माटी के कलाकारी के इतिहासे-भूगोल ले सीमित हो के रहि गइल। बहुत जने पाठक लोग इहो जानल चाही जे दुनिया भर में मसहूर एह बरतन आ कलाकृतियन के बनौले के तरीका का हौ। आखिर अइसन कौन बाति होले जौन एके खास बना देले! सही पूछीं त एहमे एक-एक बरतन के बनौले के प्रक्रिया करीब चार से छह महीना के हौ। लेकिन काम चूँकि चलत रहेले त एकर केहू के पता ना चलत। पहिले पोखरा से खनि के माटी ले आवल, फिर ओके संभारल, ओकरे बाद ओहमे पानी मिला के कई दिन भिगावल आ नरम हो गइले पर काँड़ल, कँड़ला के बाद छानल ... एह तरह से लंबी प्रक्रिया के बाद जा के इ माटी काम लायक बन पावेले। माटी के चाक पर चढ़ावे लायक बनौले में ही डेढ़ से दू महीना ले लगि जाले। हालाँकि अब एहमन से कई काम खातिर मनई आपन जांगर पेरले के बजाय मसीन क इस्तमाल करे लगल हवें। एहमन कुछ मसीन त बाहर से बनल-बनावल आवेली, बाकी कुछ नया लइके सब आपन अकिल लगा के जोगाड़ तकनीक से बना लेहले हवें। बहरहाल कुछ कंपनी आ कुछ जोगाड़ तकनीक दूनो मिल के जागरूक कुम्हारन खातिर काम पहिले से काफी हल्लुक क दिहले हौ।

    केट्यो-पेट्यो लगे कुम्हार

    अव्वल त बाति खाली मटिए ले ना हौ। एहमन जेतना मेहनत लगेले, ऊ जान लेब त आप कबो कौनो कुम्हार से उनके बनौले समान के मोल-भाव ना क पाइब। अपने इहें एक ठे कहावत हौ – एक्कम बढ़इत, दुक्कम लोहार, आ केट्यो-पेट्र्यो लगे कुम्हार। एकर मतलब ई हौ कि बढ़ई आपन काम अकेल्ले करेले। लोहार के अपने काम में एगो सहजोगी के जरूरत होले। त अपने परंपरागत ब्यवस्था के तहत उनकर छोटहन भाई या बड़हन लइका उनके साथे लगल रहाला। बकिर कुम्हार क काम अइसे ना चलत। उनकर केट्यो-पेट्यो मने लइके-मेहरारू सबके यानी घर भर के जुट के काम करे के पड़ेले, तब जाके समान आपके सामने आवेले। ई करिक्की माटी वाला बरतन कइसे बनाला, एके जान लीं त रउरे एनकर मेहनते भर ना, इहो समझ जाब कि असल में टीमवर्क का होले। ई लोग लगभग पूरे परिवार समेत पोखरा से माटी खने जाला। माटी लइले के बाद ओके पहिले भिगावल जाला। भिजले से माटी फूल के नरम हो जाले। तीन-चार दिन भिगवले के बाद फिर ओके छनौटा से छानल जाला। माटी के बरतन बनौले के सर्त ई ह कि ओहमें कंकड़-पत्थर त के कहे, एक ठो किरकिरी तक नाई होखे के चाहीं। अगर रहि गैल त ऊ बरतन के सकल बिगाड़ दी। एही नाते महीन छनाई खातिर जलिया पर सूती कपड़ा या मच्छरदानी लगा दिहल जाले। ई बड़ी मेहनत के काम होले।

    माटी छनले के बाद पूरी मटिया एक जगह सहेज के ओके थोड़े देर कठेस होए के छोड़ दिहल जाला। काहे से कि बिलकुल गील माटी से कुछ बनौला पर ऊ अपने दिहल गइल आकार में देर तक बनल ना रहि पावत। ओकरे तनी कठेस भइले के बाद फिर ओके गोड़े से काँड़ल जाला। ई कँड़ाई बहुत देर तक करे के पड़ेले, तब तक जब तक कि माटी के अंदर मौजूद पूरी हवा न निकल जा। अगर माटी के अंदर हवा रहि गइल त पकावे खातिर आगी में डरले पर ओकरे फुटि गइले के डर रही आ बनू गैल त बहुत दिन कामे ना आई। मटिया काँड़े वाला ई कमवा काम के हिसाब से माटी तैयार करे बदे कबो कबो कई बेर करे के पड़ि जाले।

    एह पूरी तैयारी में पखवारा से लेके महिन्ना तक लगि जाले। एकरे बाद जाके माटी कहीं चाक पर चढ़ावे लायक होले। चाक पर एके मनचाहा आकार देहले के बाद फिर ओके झुरवावल जाला। पहिली झुराई में पूरा ना झुरवावल जाले। एके अइसन झुरवावल जाला कि बनल बरतन या कलाकृती में आधा नमी बचल रहे। मने कि आधे झुरा आ अधवा ओदे रहे। जब ऊ आधा झुरा जाला तब ओके फिर से चाक पर चढ़ावल जाला। फेर लोहा के सुतुहा से ओकर छिलाई होले। छिलाई के बाद फिर पथरे से ओकर घोटाई कइल जाले। बरतन या कलाकृती के उप्पर जौन फिनिसिंग आवेले ऊ असल एही घोटैये से आवेले। घोटाई के बाद फिर एहपर काबिस लिपाला। काबिस एकठे खास तरह मसाला हौ। चाहीं त एके देसी ढंग से तैयार कइल गइल रंग कहल जा सकाला। ई मसाला या रंग भी कुम्हार लोग अपनहीं बनवे लन आ एहू के बड़ी लमहर प्रक्रिया हौ। आम के छाल, रेहि, पीली माटी, लाल माटी, अड़हुस आ बाँसे के पतई आ खरा सोडा आदि मिला के एके पानी में डाल दिहल जाला आ कई दिन भिगावल जाला। फिर एकर कुटाई, घोटाई, छटाई, छनाई, घोराई... ई कुल भइले के बाद तब जाके एकर लेप बनेले। ई लेप ओह बरतन या कलाकृती पर लगाला। ई लेपवे ऊ चीज हौ, जौने से ओहमें जबर्दस्त फिनिसिंग आवेले। एह काबिस लेप के बर्णन किताबिन में करीब अढ़ाई से तीन हजार साल पहिले तक से मिलाला।

    नक्कासी पर भराई
    काबिस लगा के ओके फिर झुरवावल जाला। अब एके पूरा झुरवा के फिर ओहपर सरसों के तेल लगावल जाला। तेल लगौले के बाद ओके छोड़ल ना जाला। लगा के फिर ओके तुरंते सूती कपड़ा से पहिले पोछि दिहल जाला आ पोछले के बाद फिर ओके खूब रगड़ल जाला। एह रगड़लका के मजाई कहल जाला। करिखई के असली और अपने ढंग के अनूठी चमक जौन एहमे आवेले ऊ एही मजाई से आवेले। मजाई के बाद बरतन सीसा नियर चमके लगेला। अब एहपर सुरू होले नक्कासी के काम। इहाँ के नक्कासी अइसन हौ कि बड़े-बड़े कलाकार नतमस्तक हो जाएं। ई नक्कासी हर बरतन आ हर कलाकृती के जान हौ। एके खातिर बहुत तेज धार वाली लोहे के सलाई के इस्तमाल कइल जाले। एह नक्कासीदारी में फूल-पत्ती, जंगल-पहाड़ से लेके देबी-देवता के आकृति तक बहुत कुछ उकेरल जाले। बहुत लोग त खाली एही नक्कासीदारिये खातिर इहाँ से बरतन ले जालन। कई जगह जौन एकर निर्यात होले ओहू में नक्कासीदारी एकठे बड़हन कारन हौ। ई नक्कासीदरिया अइसहीं खास ना हौ। असल में नक्कासी हो गइला के बाद एके आँवा में पकावल जाला आ फिर ओहमन भराई होले। ई पकाई आ भराई भी बहुत अलग किस्म के काम हौ।
    पहिले आईं पकाई जानल जा। एकर पकाई सामान्य आँवाँ में ना होले। एके खातिर अलगे तरह के आँवाँ बनवल जाला। अइसन आँवाँ जौन चारो तरह पुरहर बंद क दिहल जाला। बरतन ओहमें डरले आ आगी जरौला के बाद फेर ओसे धुआँ निकरे ना पावत। उहे धुँअवाँ गौंज गौंज के एके एकदम करिया बना देला। एह आँवाँ में सबसे पहिले आ उपरों से गाई के गोबरे के कंडा होला। बिच्चे में लकड़ी- लौना। फिर एके उप्पर से पूरा बंद जाला आ जब बर्तन पूरा पक के तैयार हो जाला तब एहमें बकरी के झुराइल लेड़ी डारल जाले। फेर जब ई पक के तैयार होके निकराला तब ओकरे नक्कसिया में बुकनी के भराई कइल जाले। एहमन जौने बुकनिया के भरल जाला ऊ बरोब्बर मात्रा में जिंक, पारा और सीसा मिला के ओह कुल के हाथे पर रगड़े के पड़ाला। मेहरारू लोग अपने हाथे पर रगड़ के ओके अपने हथवे बरतन के नक्कासी में भरेली। ई खतरनाक काम हौ। ई सब चिजिया सेहत खातिर नोकसानदेह भइले के नाते दैनिक इस्तमाल में आवे वाले बरतन में न त नक्कासी कइल जाले अउर न ओकर भराई होले। नक्कासी आ भराई या त सजावटी सामान पर होले या ओह सामान पर जौने में बुकनी के रसायन सब रिसले के कौनो संका न हो। एतना सब कइले के बाद ई कलाकारी बजारे जाए के तैयार होले। निम्मन बाति ई बा कि अब ऑनलाइन प्लैटफॉर्मन के जरिये ई लोगन के अंतरराष्ट्रीय बजार भी मिले लगल बा।

    मसीन पर भरोसा
    अब मिट्टी फेटे आ छाने खातिर नई पीढ़ी के लोग मसीन बनवे लगल बा। जौने से माटी फेटल जाले ओके ई लोग ब्लेंजर कहाला और छाने वाली मसीनी के पग्मील कहल जाला। ई दूनो मसीन अबहिन कहीं बजारे में बनल-बनावल ना मिलेले। बस मोटर आ डराम बजारी से कीनल जाला। बाकी सब फिटिंग आ ओकर निर्माण आदि के काम अपने हाथे कोहार लोग कराला। हालाँकि अबहिन ई कौन बहुत प्रचलित ना हो पौले बा। कम्मे कोहार लोगन किहें एकर उपयोग देखल जाले। खाली ऊ लोग जेकर काम तनी बढ़ि गैल हौ। मने बड़े पैमाने पर काम करे लगल हवें लोगन। एके जे जइसन बनवल चाहे, ओइसने लागत आवेले। मने 10 हजार से लेके लाख रुपया तक लगि जाले। इलेक्ट्रॉनिक चाक दु साल पहिले सरकार के ओर से कई जनी के बँटा गैल रहल। आँवाँ भी अब लोग पुरनका ढंग के माटी वाले पर काम चलावे के बजाय नई पीढ़ी के लोग इलेक्ट्रिक फर्नेस लगावे लगल बा। ओकर लागत तीन से लेके आठ लाख तक आवाता। नई पीढ़ी में कुछ लोगन से मिलला आ ऊ लोगन के कामकाज के तौर-तरीका समझला के बाद कबो-कबो अइसनो बुझाला जे आवे वाले समय में रामजी चहले त ई कम लघु उद्योग के स्तर पर त काम करही लगिहें। बकिर पुरनकी पीढ़ी के अबहिनो मसीन आ ओकरे काम पर भरोसा ना लौकेले। बकिर पुरनका लोग इहो मानाला कि मसीन क काम एतना निम्मन ना होले। एह नाते पुरान आ सजग लोग ई काम अपने गोड़वे कइल चाहेले। छोटे पैमाने पर काम करे वाला नैकी पीढ़ी के कुछ लोग भी अबहिन ई सब जुटावल अबहिनो झमेला मानेलन।

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