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Bhojpuri Spl: पहलवानी वाला बदन, गला में सोना के सिकड़ी; कुछ अइसन रहे महेंदर मिसिर के व्यक्तित्व

पहलवानी, गीति रचना, शास्त्रीय संगीत आ अध्यात्म में एके नियर पैठ राखेवाला महेन्द्र मिसिर (Mahendra Mishra) के नामें अपना मातृभाषा भोजपुरी (Bhojpuri) से अनन्य अनुराग के द्योतक बा, काहें कि महेन्द्र मिश्र का जगहा महेन्दर मिसिर कहइला में ऊ गरब आ गौरव के अनुभव करत रहलन.

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जयन्ती (16मार्च)पर खास
पूरबी के पुरोधा महेन्द्र मिसिर
नारी-मन के जादुई चितेरा
पहलवानी के बदउलत गठल कसरती देह. लिलार से फूटत तेजस्विता के आभा. बदन पर बेशकीमती कुरता आ धोती. गरदन में सोना के चमचमात सिकड़ी. मुंह में पान के गिलौरी. अइसन विलक्षण व्यक्तित्व रहे पूरबी के बेताज बादशाह महेन्द्र मिसिर के, जेकर शोहरत देश-दुनिया के पच्चीस करोड़ भोजपुरी भाषियन आउर भोजपुरी वंशियन में आजुओ व्याप्त बा. पहलवानी, गीति रचना, शास्त्रीय संगीत आ अध्यात्म में एके नियर पैठ राखेवाला महेन्द्र मिसिर के नामें अपना मातृभाषा भोजपुरी से अनन्य अनुराग के द्योतक बा, काहें कि महेन्द्र मिश्र का जगहा महेन्दर मिसिर कहइला में ऊ गरब आ गौरव के अनुभव करत रहलन.

बालपन आ रुझान
बिहार के सारन जिला में छपरा शहर से बारह किलोमीटर उत्तर जलालपुर प्रखंड के काहीं-मिश्रवलिया गांव में 16 मार्च, 1886 के गायत्री देवी आ शिवशंकर मिसिर के दुलरुआ महेन्द्र मिसिर के जनम भइल रहे. एह कनउजिया ब्राह्मण के पुरनिया उत्तर प्रदेश के लगुनही गांव (कानपुर) से आके उहां बसि गइल रहलन. लरिकाईं बड़ा लाड़-प्यार में बीतल. स्कूली पढ़ाई के कतहीं जिकिर ना मिलेला. छपरा के नामी-गिरामी जमींदार हलिवंत सहाय से बाबूजी के नजदीकी का चलते छोट-मोट जागीरदारी हासिल हो गइल रहे.

बाकिर महेन्द्र मिसिर के मन त गांव के हनुमान जी के अखाड़ा में कुश्ती लड़े में आ किसिम-किसिम के मंडलियन के भजन-कीरतन आउर गीत-गवनई में रमत रहे. गांव के संस्कृत-पंडित नंदू मिश्र जब लरिकन के अभिज्ञान शाकुंतलम्,रघुवंशम् पढ़ावसु,त महेन्दरो मिसिर ओकर रसास्वादन चाव से करत रहलन. आगा चलिके उन्हुका रचनो पर एकर असर होखे लागल रहे.

बाबूजी के गोलोकवास का बाद जब महेन्द्र मिसिर के अंतरंगता जमींदार हलिवंत सहाय से बढ़ल, त मुजफ्फरपुर के कोठावाली के बेटी ढेलाबाई का प्रति उन्हुकर आसक्ति देखिके ऊ ढेलाबाई के अपहरण कराके सहाय जी के सउंपि दिहलन, बाकिर बाद में उन्हुका एकर पछतवो भइल रहे आ सहाय जी के मउवत का बाद ढेलाबाई के हक दियवावे में ऊ कवनो कोर-कसर ना छोड़ले रहलन.

ब्रिटिश शासन के खिलाफत
बंगाल के संन्यासी आन्दोलन से जुड़िके महेन्द्र मिसिर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह के बिगुल बजा देले रहलन. ओही घरी ऊ एगो धनाढ्य बंगाली अंगरेज के संपर्क में आइल रहलन. ऊ मिसिर जी के गीत-संगीत पर फिदा होके नोट छापेवाली मशीन मिसिरेजी के सुपुर्द कऽ देले रहे आ खुद लंदन खातिर रवाना हो गइल रहे. अंगरेजी शासन के अर्थ-बेवस्था के नेस्तनाबूत करे का गरज से महेन्द्र मिसिर नोट छापे के गैरकानूनी धन्हा शुरू कइले रहलन. जब जाली नोट के खूब पइसार-प्रसार होखे लागल ,त अंगरेजी सरकार बौखला गइल रहे आ खुफिया तंत्र के जाल बिछा देले रहे.

सी आई डी के जटाधारी प्रसाद आ सुरेन्द्र नाथ घोष के अगुवाई में खुफिया तौर-तरीका से छानबीन चलत एरहल. जटाधारी प्रसाद त गोपीचंद बनिके तीन बरिस ले मिसिर जी के नोकर रहल आ भरोसा जीतिके मए जानकारी हासिल करत रहल. फेरु त 16अप्रैल, 1924 के निसबद रात में छापा मारिके नोट के गड्डी आ मशीन का साथे महेन्द्र मिसिर आ उन्हुका चारों भाई के गिरफ्तारी हो गइल.पटना हाईकोर्ट में ममिला के सुनवाई लगातार तीन महीना ले चलते रहि गइल. मिसिर जी के वकील रहलन विप्लवी हेमचन्द्र मिश्र आ नामी स्वाधीनता-सेनानी चितरंजन दास.आखिरकार दस साल के जेहल के सजाइ सुनावल गइल रहे आ महेन्द्र मिसिर के बक्सर कारा में बंदी बनाके भेजि दिहल गइल रहे. बाकिर मिसिर जी के व्यक्तित्व के जिंदादिली कारा अधिकारी, बंदियन आ मए मुलाजिमन के मन मोहि लेले रहे आ तीन बरिस पहिलहीं उन्हुका जेहल से मुकुती मिलि गइल रहे. जेहले में रहिके ऊ सात कांड में 'अपूर्व रामायण ' के रचना कइले रहलन,जवना के भोजपुरी के पहिलका महाकाव्य मानल जाला.

सिरिजन-संसार
अइसे त महेन्द्र मिसिर तीन गो नाटकन का अलावा कृष्ण गीतावली, महेन्द्र प्रभाकर, महेन्द्र रत्नावली, महेन्द्र चंद्रिका, महेन्द्र कवितावली वगैरह का संगहीं अनगिनत फुटकर गीतन के रचना कइले रहलन, बाकिर उन्हुकर प्रसिद्धि पूरबी गीतन के बेताज बादशाहे का रूप में मिलल.कोलकाता, बनारस, मुजफ्फरपुर के नामी गिरामी तवायफ उन्हुका के आपन गुरु मानत रहली स आ ताजिनिगी उन्हुके गीत गवली स.
एक तरफ उन्हुका हरमुनिया, तबला,पखावज, मृदंग, बांसुरी जइसन अनगिनत वाद्य यंत्रन पर अधिकार रहे,त दोसरा ओरि ठुमरी, ठप्पा, ग़ज़ल, कजरी, दादरा, खेमटा वगैरह राग-रागिनियनो पर महारत हासिल रहे. इहे कारन बा कि उन्हुकर हरेक रचना संगीतात्मकता से ओतप्रोत होत रहे, जवन सहजे जन-जन के कंठहार बनि जात रहे.

रोमानियत के रंग: वियोग के दंश
उन्हुका पूरबी गीतन में त रोमानियत के रंग आ वियोग के मर्मस्पर्शी छटा देखते बनेला.
'अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया रे, ए ननदी दियरा जरा दे', 'सासु मोरा मारे रामा बांस के छिउंकिया, ए ननदिया मोरी रे, सुसुकत पनिया के जाय', 'पानी भरे जात रहलीं पकवा इनारवा, बनवारी हो, लागि गइले ठग-बटमार', 'आधी आधी रतिया के पिहिके पपिहरा, बैरिनिया भइली ना, मोरा अंखिया के नींनिया बैरिनिया भइली ना ', 'पिया मोरा गइले सखी पूरबी बनिजिया, से देके गइले ना, एगो सुगना खेलवना से देके गइले ना '-- जइसन अनगिनत गीत पथरोदिल वालन के मोम मतिन पघिलावे के सामरथ राखत बाड़न स. बुझिला ढेलाबाई आ बाकी तवायफन के बाथा-कथा से उन्हुका अइसन गीत रचे के प्रेरना मिलल होई. सही माने में ऊ नारी-मन के जादुई चितेरा रहलन.

महेन्द्र मिसिर जियतार गीतन का जरिए कपोल कल्पना के जगहा खुरदुरा जथारथ के बानी देले रहलन. जब उन्हुकर भरोसेमंद नोकरे गोपीचंद उन्हुका साथे दगाबाजी कइले रहे, तब उन्हुकरा आंतर से मरमभेदी गीत गूंजल रहे-

पाकल-पाकल पनवा खियवले गोपीचनवा
पिरितिया लगा के ना,
मोहे भेजले जेहलखनवा रे
पिरितिया लगा के ना!

बाकिर मिसिर के सोहबत से तुकबंदी करेवाला गोपीचंद हाजिरजवाबी के परिचय देत बोलल रहे-

नोटवा जे छापि-छापि गिनिया भंजवलऽ ए महेन्दर मिसिर,
ब्रिटिश के कइलऽ हलकान ए महेन्दर मिसिर,
सगरे जहनवा में कइलऽ बड़ा नाम ए महेन्दर मिसिर,
पड़ल बा पुलिसवा से काम ए महेन्दर मिसिर!

बाकिर ऊ अइसन काहें कइले रहलन?अपना देशभक्ति आ राष्ट्रीयता के खुलासा करत मिसिर जी के साफ कहनाम रहे-

हमरा नीको ना लागे राम, गोरन के करनी
रुपया ले गइले, पइसा ले गइले, ले गइले सब गिन्नी,
ओकरा बदला में दे गइले ढल्ली के दुअन्नी,
हमरा नीको ना लागे राम, गोरन के करनी!

ओइसे त महेन्द्र मिसिर के जनप्रिय गीत जन-जन के जबान आ लोकसुर में आजुओ मौजूद बाड़न स, बाकिर सौभाग से उन्हुका गीतन के संग्रह 'कविवर महेन्द्र मिसिर के गीत-संसार ' शीर्षक से डाॅ सुरेश कुमार मिश्र के संपादन में 2002में प्रकाशित भइल. फेरु उहें के संपादकत्व में 'महेन्द्र मिसिर की प्रतिनिधि कविताएं ' छपल. महेन्द्र मिसिर अपना जिनिगिए में किंवदंती बनि गइल रहलन.उन्हुका प तीन गो भोजपुरी उपन्यास रचा चुकल बाड़न स- 'फुलसुंघी '(पाण्डेय कपिल),'महेन्दर मिसिर '(रामनाथ पाण्डेय),'पूरबी के धाह'(जौहर शफियाबादी),बाकिर उन्हुका कृतित्व के मूल्यांकन अबहुंओं शेष बा. एह दिसाईं 'महेन्द्र मिसिर:विविध आयाम ','महेन्द्र मिसिर:भोजपुरी गीतकार 'के मार्फत ठोस शुरुआत हो चुकल बा. साहित्य अकादेमी से 'भारतीय साहित्य के निर्माता ' श्रृंखला में प्रकाशित एह पांती के लेखक के विनिबंध (मोनोग्राफ) अखियान करे जोग बा, जवन खास तौर पर सराहल जात रहल बा .एने नवही अनुवादक गौतम चौबे 'फुलसुंघी 'के अंगरेजी में जीवंत अनुवाद कइले बाड़े.

लोक साहित्य के अमूल्य निधि

महेन्द्र मिसिर साढ़े साठ साल के उमिर में ढेलाबाई के कोठी में बनल शिव मंदिर में 26 अक्तूबर, 1946 के आखिरी सांस लेले रहलन, बाकिर पूरबी के ऊ अनमोल रतन लोककंठ से फूटिके जन-जन के मन-परान के हरदम झंकृत करत रही.लोकधुन पूरबी में रचल उन्हुकर अमर गीत लोक साहित्य के अमूल्य निधि बाड़न स. परिपाटी आ लोक से अरजल गीत-संगीत के अनवरत साधना से महेन्द्र मिसिर जवन नायाब धुन तइयार कइलन, ऊ उन्हुकर आ खाली उन्हुके मौलिक धुन होके रहि गइल.

आजु उन्हुका के पूरबी के जब जनक, प्रवर्तक भा पुरोधा कहल जाला, त एह कथन में कतहीं से अतिशयोक्ति ना,उन्हुका साधना का प्रति मान-सम्मान के भाव परिलक्षित होला.वरिष्ठ कथाकार-समालोचक डॉ जवाहर सिंह ठीके लिखले बाड़न-'ऊ अपना कविता आ गीत से भोजपुरी के एगो मानक रूप बनवलन.उन्हुका गीतन में शब्द के रूक्खड़पन हृदय के रस में घुलिके संगीत के लयकारी में बदल जाला आ रागरागिनी के कलकलछलछल प्रवाह में कजरी आउर पूरबी में ढलि जाला.मिसिर जी भोजपुरी भाषा के नया संस्कार, शब्द के कोमलता आउर ध्वनि-संगीत के मधुरता देले रहन.' (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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