Bhojpuri: कैंसर दीही, दांत गिराई भाई जी, भुलाइयो के खैनी मत खाईं जी!

भइल ई कि अधेड़ उमिर के एगो धोती-कुरता-बंडी पहिरले कवि मंचे पर कविता के आनंद लेत खइनी बनावत रहलन. पहिले देरी ले तरहत्थी पर रगरलन,फेरु उहंवें बइठल-बइठल फटके लगलन. बगल में बइठल एगो सूटधारी के जब छींक आवे लागल,त ऊ आपत्ति करत कहलन, 'भाईजी, ई का करत बानीं?' पढ़ीं आगे का जवाब मिलल...

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भोजपुरी के एगो अंतरराष्ट्रीय स्तर के जलसा चलत रहे. साहित्य-संस्कृति से गहिर सरोकार राखेवाला देशी-विदेशी बुद्धिजीवियन के जमावड़ा रहे. कविसम्मेलन के आखिरी सत्र जारी रहे. सभे केहू किसिम-किसिम के कविता सुने आ सराहे में मगन रहे. मंच पर नामी-गिरामी कवि-कवयित्रियन के भरमार रहे. कविता पर 'वाह-वाह','का कहे के' जइसन शाबाशी के सुर गूंजत रहे. तलहीं मंच के एगो हिस्सा से हल्ला-गुल्ला होखे लागल.

भइल ई कि अधेड़ उमिर के एगो धोती-कुरता-बंडी पहिरले कवि मंचे पर कविता के आनंद लेत खइनी बनावत रहलन. पहिले देरी ले तरहत्थी पर रगरलन,फेरु उहंवें बइठल-बइठल फटके लगलन. बगल में बइठल एगो सूटधारी के जब छींक आवे लागल,त ऊ आपत्ति करत कहलन,'भाईजी, ई का करत बानीं?'

'खइनी बनावत बानीं. रउओं लेबि का? 'ऊ सहज ढंग से जवाब दिहलन.
'ई त हम देखते बानीं कि रउआं खइनी बनावत बानीं! बाकिर हमरो इहे सवाल बा,
का इहवां खइनी बनावल उचित बा? का रउआं एह मंच के गरिमा के इचिकियो खेयाल नइखे?'सूटधारी मने-मन खिसिआत पुछलन.

'उचित-अनुचित रउएं ढेर बुझाला का?'
'हमरा कहे के माने ई बा कि स्टेज से बहरी जाके रउआं खइनी बना आ खाके इहवां आ जइतीं!'
'हम काहें कतहीं जाईं! जेकरा दिक्कत बुझाता,ऊ खुद इहां से हटि जाउ भा मंच से उतरि जाउ!'

सूटधारी पिनपिना गइलन आ उहां से उठिके सोझे अध्यक्ष जी का लगे जाके शिकाइत करत कहलन,'अध्यक्ष जी,हऊ देखीं! मंच पर हऊ अदिमी सुर्ती बनावत बा आ सबके डिस्टर्ब करत मंच के गरिमा के ठेस पहुंचावत बा.'

'आरे भाई,काहें खिसिआत बाड़ऽ? इहवां खइनी कवनो निसा ना मानल जाला. ई त भोजपुरियन आ भोजपुरिया संस्कृति के पहिचान ह!' फेरु ऊ ओने मुंह कऽके कहलन,'आरे भाई,खइनी बनाके तनी हमरो के दीहऽ!'

फेरु का रहे! सूटधारी पिनपिना के उहवां से भागत कहलन,'जेकर ईस्सर अइसन, ओकर दलीद्दर कइसन!'
आग बबूला होत सूटधारी संयोजक से जाके शिकाइत कइल चहलन, बाकिर उन्हुकर ई देखिके घोर अचरज भइल कि ऊहो खइनिए बनावत कविता सुनत रहलन. जहवां सइ गो कसाई, उहवां एगो के का बसाई! उहां त गोल के गोल मथमहोरे रहे!

सांचो, भोजपुरिया समाज में खइनी के पइसार जन-जन में साफ झलकेला. जहवां पहुंचे भोजपुरिया, उहवां पहुंचे खइनी. उहे खइनी, जवन कतहीं सुर्ती कहाले, त कतहीं तमाकू. लोग कहेला कि सुर्ती खाते मन-मिजाज में फुर्ती आ जाला.

संस्कृत साहित्यो में तमाकू के चरचा आवेला. कहल गइल बा कि जइसे गंगा के तीन गो धार त्रिवेणी भा त्रिवाहिनी कहाला, ओही तरी तमाकू के तीन गो धार होला. पहिलका धार होला खइनी खाके थूकेवालन के. दोसरका धार हुक्का गुड़गुड़ावे वालन के होला. तिसरका धार नाक में नस लेबेवालन के बा. एह तरी तमाकू खाइल,पीयल आ सूंघल जात आइल बा. संस्कृत के ऊ रोचक श्लोक बा-

कचित् थुकिया, कचित् हुकिया
कचित् नासाग्रगामिनी,
तमालस्य त्रयं धारा
यथा गंगा त्रिवाहिनी!

कइसन कल्पना बा कवि के! पतितपावनी गंगा के तुलना तमाकू से! हालांकि भोजपुरिया इलाका में तमाकू के खेती ना होला. ई उपजेला बिहार के वैशाली, पच्छिमी उत्तर प्रदेश आ दोसर हलका में, बाकिर जहवां-जहवां भोजपुरिया जालन,खइनी उहवां पहिले पहुंचि जाला.
पहिले बूढ़ पुरनिया मरद-मेहरारू हुक्का में तमाकू भरिके आगी धऽके गुड़गुड़ावत रहत रहलन. लोग चुनौटी में एक ओरि चूना राखेला आ दोसरा ओरि टूंगिके खइनी. खइनी खाएवाला बायां तरहत्थी पर खइनी धऽके ओमें पहिले चूना मिलावेला,फेरु दहिना हाथ के अंगूठा से खूब मीसि-मीसिके मिलावेला. आखिर में दूनो तरहत्थी से ताल मिलावत फटकेला. तब जाके खइनी खाए खातिर तय्यार हो जाला आ चुटकी से ओठ-दांत का बीचे दबा लिहल जाला. खाएवाला कहेला कि जब अस्सी हाली चुटकियाके खइनी-चूना मीसल जाला आ नब्बे बेर ताल देके फटकल जाला, तब जाके जानदार खइनी बनेले-

अस्सी चुटकी, नब्बे ताल
तब देखऽ खइनी के हाल!

बाकिर आजु के पीढ़ी के ई फार्मूला पसन नइखे. ऊ त कहेलन कि चूना के फटकिके बहरिआवे के जरूरत नइखे. अस्सी चुटकी त दीं, बाकिर ताल मत दीं,तब खइनी के करामात देखीं-

अस्सी चुटकी, ना दे ताल
तब देखऽ खइनी के हाल!

खइनी के अतना शोहरत मिलल रहे कि अदिमी त अदिमी, चिरई-चुरुंगो पर खइनी के असर देखावल गइल रहे. एगो भूअर रंग के पीयर ठोर वाली चिरई मइनी के भूअर रंग के खइनी से जोड़िके एगो लोकगीत लरिकन के जबान पर चढ़ल रहे-

मइनी खाले खइनी
बकुलवा खाला पान,
मइनी के सात बेटा
सातो पहलवान
मइनी चलेले उतान!

स्कूल में जब मैना,सुनैना दूगो बहिन पढ़त रहली लो,त लरिका ओही गीत में जोड़-घटाव कऽके दूनो के रिगावऽ स-

मइनी खाले खइनी
सुनइनी खाले पान,
बस्ता में दूनो
राखेले पीकदान
दूनों चलेले उतान!

लरिकाईं के एगो अउर घटना खइनी से जुड़ल बा. एगो मरखहवा पंडी जी रहनीं.
लरिकन से खइनी बनवा के खासु आ गाहे-बगाहे बेंतो बरिसावल करसु. बाकिर एक दिन जब ऊ स्कूल में अइलन,त देवाल प लिखल तुकबंदी पर उन्हुकर निगाह परल.
केकर कारिस्तानी हऽ ई?ऊ एक-एक कऽके सभसे सवाल कइलन कि केकर हरकत हऽ,बाकिर किछु पता ना चलि पावल. ऊ तुकबंदी रहे-

सट-सट इहां बेंत बरिसावल छोड़ीं पंडी जी,
लइकन से खइनी बनवावल छोड़ीं पंडी जी!

अगिला दिने सांचो एगो बदलाव लउकल रहे. पंडी जी खइनी खाइल छोड़ि देले रहलन.

खइनी खाएवाला मानेला कि खइनी से ताजगी आवेला आ तन-मन तरोताजा हो जाला. नींन टूटि जाला आ दिमाग़ क्रियाशील बनल रहेला. ऊ लोग मशहूर गणितज्ञ गोरख बाबू के उदाहरण देला,जे खइनी के दीवाना रहलन आ खइनिए से उन्हुका दिमाग के तेजस्विता बनल रहल.

ऊ लोग इहो कहेला कि खइनी खाएवाला के दांत में पायरिया ना होला आ दांतदर्दो से निजात मिलेला.

बाकिर तमाकू सेवन करेवाला एह बात के भुला जाला कि खइनी मोती नियर उज्जर दांत के करिया बना देले आ एक-एक कऽके मए दांत झारि देले. मुंह के कैंसर नियर जानलेवा बेमारी एकरे देन ह. हालांकि बनल-बनावल खइनी के पुड़िया पर मुंह के कैंसर के फोटो आ हिदायत दूनों रहेला, बाकिर तबहूं 'मूरख हृदय न चेत,जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम'!

खइनी खाएवाला जहां-तहां थूकत फिरेला आ सरेआम गंदगी-प्रदूषण फइलावे में ओकरा इचिकियो अहस ना लागे. मुंह के बदबू के त कहहीं के नइखे. हालांकि गांजा एकरो से भयावह निसा ह,बाकिर गांजा पिएवाला अपना के राजा से कम ना बूझे आ खुद प इतरात कहेला-

गांजा पिए राजा, बीड़ी पिए चोर
खइनी खाला चेताया,थूके चारू ओर!

लोग कहेला कि खइनी एक-दोसरा के जोड़ेले आ एकरे मार्फत भोजपुरिया संस्कृति के फइलाव होला. खइनी बनावत देखिके अनजानो मनई दोस्ती के हाथ बढ़ावेला आ एक-दोसरा से नेह-नाता प्रगाढ़ बनावेला.
बाकिर ई कुल्हि निसाखोरन के कुतर्क होला. तमाकू कवनो हाल में सेहत, समाज आउर मनुजता खातिर वरदान ना हो सके. ई त अभिशाप ह आ अभिशापे रही. ई सुसंस्कारित समाज के ना,अपसंस्कृति आ प्रदूषण के निशानी ह. एसे एकरा से दूर रहीं आ समाज के हर तबका के दूर राखीं.
अंत में हम कहल चाहबि-

खइनी खाके जनि करीं, आपन दांत खराब
जवन दांत मोती मतिन,हो जाई बरबाद
हो जाई बरबाद, थूकि गंदगी बढ़ाइब
झरि जाई सभ दांत,बताईं, कइसे खाइब
मुंह के कैंसर के उपाय काहें के कइनी
अबहूं से हरदम खातिर अब छोड़ीं खइनी.
(लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)