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भोजपुरी विशेष-जानी चुनारगढ़ के इतिहास जहां केहू टिक न पौलस

भोजपुरी विशेष-जानी चुनारगढ़ के इतिहास जहां केहू टिक न पौलस

काशी आ प्रयागराज के बीच में गंगा तट पर बनन इ किला अपने आप में  घूमे के दिव्य जगह लगेला.

काशी आ प्रयागराज के बीच में गंगा तट पर बनन इ किला अपने आप में घूमे के दिव्य जगह लगेला.

चुनारगढ़ के बाबू देवकी नंदन खत्री रहस्यमय किला बना दिहने. चंद्रकांता संतति में एकर जिक्र कइके एहेके आधुनिक युग में मशहूर कइने, लेकिन इ किला के इतिहास अपने आप में कम बड़ रहस्य ना ह.

चुनार के इतिहास में सही पूछीं त राजा भरथरी, बिकरमादित्त आ नैना जोगिन के जौन गुत्थी बा, ऊ बड़ी उलझाऊ हवे. ओह पूरी उलझन के चर्चा पिछली कड़ी में हो चुकल बा. लेकिन महराज बिकरमादित्त के बाद से लेके 11वें सताब्दी तक के इहाँ के इतिहास लगभग अंधेरा में हवे. एह बात के कई ठे पुरातत्ती साखी हवे कि ईसा के एक सताब्दी पहिले से इहाँ किला आ कसबा दूनो रहल. लेकिन महराज बिकरमादित्त के बाद एह किला पर केकर कब्जा रहल आ एह जवार के राजा के भैल, एकर कौनो साफ-साफ साखी नइखे. एह बारे में जौन भी जानकारी बा, ऊ सब आधी-अधूरी हवे. एकरे बाद के तीन-चार सौ साल के जौन इतिहास बा, ओहू में बड़ा गैप हवें. 11वीं सदी में आके एह किला पर महराज पृथ्वीराज के अधिकार भैल. इतिहासकारन के एक बर्ग अइसनो बा जौन ई मानाला कि एकर निर्माणे 11वीं सताब्दी में भैल. ई निर्माण महराज सहदेव करवले.

के रहले सहदेव आ स्वामीराज
इतिहासकारन में बहुत लोग इहो मानेलन कि चौथी-पाँचवीं सताब्दी तक आवत-आवत एह पूरे जवार में कौनो राजसी अनुशासन ना रहि गैल रहल. इहाँ हर तरह के डोर ढीला पड़े लगल रहल. एसे कौनो किला-महल के केहू पुछवार ना रहि गैल रहल. एही के नतीजा ई भैल कि खाली चुनारे ना, कई गो औरी किला महल के भी इहाँ कौनो लेखा-जोखा ओह बीच के ना रहि गैल. 11वीं सताब्दी में सहदेव महराज जौन कइले, ऊ बस एक तरह से एकर फिर से उद्धार रहल. बकिर ई सहदेव महराज के रहले, कहाँ के रहले एह सब बारे में कौनो साफ जानकारी कहीं ना मिलेले. हाँ ई जरुर हौ कि चुनार से संबंधित कई पुरालेखन में आ इहाँ तक कि चुनार से जुड़ल सब इतिहास वाले बिरतांतन में भी उनकर नाम जरूर मिलेले. हो सकेला जे इनकर कहीं पूरा बेवरा भी हो, लेकिन अबहिन तक ओकर साफ जानकारी केहू के ना हवे.
इहाँ के इतिहास के क्रम में अइसने एक ठू और राजा आवेलन. उ हवे स्वामी राज. उनहू के बारे में कौनो साफ जानकारी ना बा. लेकिन उनकर जिकर पुरालेख, आ इतिहास के बेवरा से लेके मिर्जापुर के गजेटियर तक में मिलेले. स्वामीराज जी के नाम के उल्लेख किला के मुख्यद्वार के उप्पर लगल एक ठे पुरालेख में भी हौ. संस्कृत में लिखल गइल ई पुरालेख अब बहुत साफ ना रहि गइल बा, लेकिन एसे ई साफ हो जाला कि एह किला पर पृथ्वीराज के बाद उनकर अधिकार रहल. मुस्किल ई ह कि स्वामीराज के बारे में भी महराज सहदेव के लेखिन नाम के अलावा और कौनो बेवरा ना मिलेले. एह बेवरन से ई एतना जरूर पता चल जाले कि सहदेव पृथ्वीराज चौहान से पहिले के हवें आ स्वामीराज उनके बाद के. ई दुनो जनी के बीचे में एह किला पर पृथ्वीराज चौहान के अधिकार रहल.

खैरुद्द्दीन सुबुक्तगिन

आ बाद में पृथ्वीराज चौहान के ही उत्तराधिकारी लोग ई पूरा जवारे खैरुद्द्दीन सुबुक्तगिन के हाथे बेच दिहलन. बहुत लोगन के अनुमान हौ कि स्वामीराज बाद में सुबुक्तगिन पर हमला क दिहले. एह हमला में ऊ जीत गैलन आ एह तरह से एहपर स्वामीराज के कब्जा भैल. लेकिन स्वामीराज के कब्जा भी एहपर बहुत दिन रहि ना पवलस. स्वामीराज के बाद एह पर सहाबुद्दीन के कब्जा हो गैल. सहाबुद्दीन के भी इहाँ के गजेटियर आ और कागजन में साफ-साफ जिक्र ना मिलेले. लेकिन बिद्वान लोग के अनुमान हवे कि ई सहाबुद्दीन असल में सहाबुद्दीन गोरी हवें, जौन अफगानिस्तान से लेके बंगाल के मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी तक के परास्त क दिहले रहलन आ एह पूरे इलाका पर आपन कब्जा जमा लिहले रहलन. ओही पूरे कब्जा में ई किला भी आ गैल रहल. लेकिन सहाबुद्दीन कबो इहाँ रहलन ना. उ इहाँ आपन तीन गो प्रतिनिधि नियुक्त क देहले रहलन आ उहे लोग उनके ओर से इहाँ के उनके जागीर के सारा काम देखत रहलन. ओह तीन में दू त बिदेसी रहलन, लेकिन एक गो देसी बहेलिया रहलन. वह बहेलिया के परिवार के कब्जा किला पर त नाहीं, बकिर इहाँ के जागीर पर अंग्रेजी सासन तक रहल. उनकर कब्जा इहाँ से तब खतम भैल जब 1772 में अंग्रेजी सासन किला के साथे-साथे ओसे जुड़ल जागीर पर भी आपन पूरा कब्जा जमा लिहलस. एह बहेलिया के साथे-साथे एगो सनीदी और एगो अफ्रीकी भी सहाबुद्दीन के ओर से इहाँ के हजारी यानी कि गवर्नर बनावल गैल रहलन. लेकिन उ लोग के का भैल एकर कौनो जानकारी इहाँ अब केहू के नइखे.

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चुनारगढ़ के निर्माण कला भी बहुत सुंदर हवे.


जानवर भारी परले बाबर के सैनिकन पर
बकिर ई सारा इतिहास जब इहाँ अभिलेखन में तलासल जाले त ओकरे साफ-सुथरा छाप के बजाय खाली परछाहीं मिलेली. अभिलेखन में ई सब खाली बिंदु के रूप में दर्ज हवें. एक से दुसरे बिंदु के मिलावल आ मिला-मिला के कौनो ठीया ले पहुँचल आसान बाति ना बा. हमके लगेले कि अगर एकरे कुल्ही बिंदुअन के मिला के सगरो परछाहीं पकरले के कोसिस कइल जा त इहाँ के इतिहास भी देवकीनंदन खत्री जी के चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति आ भूतनाथ जइसन उपन्यासन के कहानी से अचिको कम दिलचस्प ना निकरी. हालांकि ई काम एतना आसान ना बा जेतना आसानी से हम लिख दिहली. एके माटी खन के निकारे बदे केहू भगीरथ महराज जइसन बड़हन तपसी के जरूरत बा जे पहिले बामन महराज के कहानी के रूपक के तूर के ओकर अभिधा वाला अरथ निकारे बदे तैयार हों आ फिर ओसे आगे बढ़ें. काहें से कि सिद्धांत इहो बा कि बामन महराज कौनो धरती-ओरती नपले के बाति असल में रूपक हौ. एकर असल अरथ ई हौ कि बामन महराज बलि महराज से उनके बड़हन राजतंत्र के बीचे में बस एगो झीन के लोकतांत्रिक गणराज्य बनवले के अनुमति लेहले रहलें आ बाद में ई गणराज्य क बिचार अइसन फइलल कि चारो ओर गणराज्ये के माँग होखे लगल.

जब आधुनिक कहल जाए वाले अर्थ में इहाँ के साफ-साफ दर्ज इतिहास के बात कइल जाले त ओकर सुरुआत 16वीं सदी से होले. ओह समय 1529 में चुनारगढ़ पर बाबर के कब्जा भैल आ ओहीं से एकर सामरिक महत्त सुरू हो गैल. हालांकि इहाँ तक पहुँचले में बाबर के कई गो सैनिक, इहाँ तक कि सिपहसालार भी खेत हो गइलन. आ दस्तावेजन के बाति मानल जा त ई लोगन के खेत करे वाला कौनो सेना या प्रतिस्पर्धी ना रहे. कहल ई जाला कि ज्यादातर सैनिकन के जंगली जानवर खा गइलन. बाबर क हजारन सिपाही मारल गइलन, एकर सनद अबहिनो इहाँ मौजूद बेहिसाब कब्र हवे, जौन इहाँ जंगल-पहाड़ में चारो ओर फैलल हई. हालाँकि एहपर भरोसा करे लायक हमके कम्मे लगाला. काहें से कि एकरे पहिलो लोग इहाँ आइल-गइल, लेकिन ओके कौनो जानवर ना मरलन. खाली बाबर के सैनिकन के ही खातिर जंगली जानवर एतना जंगली काहें हो गइलन? हो सकाला कि ई बात कौनो छोटहन राजा या असंगठित जनतंत्र से हरले के नाते आपन इज्जत बचावे बदे बाबर के सिपाही लोग फैलौले हो आ जोद्धन के जानवर बता दिहले हो. खैर, दस्तावेज वाला इतिहास त अइसहीं चलाला न, त उ अगिली जानकारी अइले तक इहे मान के चली.

बाबर भी एह किला पर कब्जा के बाद बहुत दिन जीवित ना रहि पौले. 1930 में उनकर देहांत हो गैल आ फिर उनके सल्तनत के भी कब्जा एहपर बहुत दिन रहि ना पवलस. कुल जमा दू साल, एकरे बाद 1532 में उहाँ शेरशाह सूरी के हमला में इहाँ बाबर के पूरी छावनी बरबाद हो गैल. शेर शाह सूरी, जौन ओह समय शेर खान के नाम से जानल जात रहले, ऊ इहाँ आपन डेरा जमा लिहले. बाबर के ऊ सिपहसालार, जौन इहाँ के हजारी यानी कि गवर्नर भी रहलन आ शेर शाह के हमला में खेत हो गइल रहलन, उनके बेवा मेहरारू से शेरशाह निकाह क लेहले. ओकरे बाद कुछ दिन ऊ इहाँ रहबो कइले. लेकिन इहाँ से ऊ आपन हरम आ खजाना दुनो लेके रोहतास चलि गइले. एह किला के अंदर तुर्की हमाम आ सिलहखाना शेर शाह के ही बनवावल हवे, जौन गिरल-परल हालत में अबहिनो देखल जा सकेले.

शेरशाह के रोहतास गइले के मूल में भी एगो बड़ा जुद्ध हौ. असल में हमायूँ जइसही थोरे मजबूत भइले ऊ एहपर फिरसे अपने कब्जा के जुगत सुरू क दिहले आ 1536 में ऊ चुनारगढ़ के चारो तरफ से घेर लिहले. एकरे बादो शेर शाह एहपर आपन कब्जा छोड़े बदे तैयार ना भइले. इतिहास के बिरतांत ई हौ कि हुमायूँ एह किला के चार महिन्ना ले घेरले रहि गइले. सेरसाह तबो समर्पन ना कइले. लेकिन एही बीचे हुमायूँ गंगाजी के रास्ते से इहाँ आपन नौसेना बोला लिहले. तब जाके दुनो के बीचे कुछ सर्त आ ओहपर समझौता भैल. ओह समझौता में तय भैल कि शेर शाह चुनारगढ़ छोड़ दिहे आ आगे से अइसन कौनो जगह पर निगाह ना डरिहे जहाँ बाबर के पुरान कब्जा रहल. बदले में हुमायूँ इहो मनले कि ऊ बंगाल पर कौनो हमला ना करिहे. आज के बिहार तब बंगाल के हिस्सा रहल. एही समझौता के तहत शेरशाह अपने अलटन-पलटन के साथे रोहतास कूच कइले आ चुनारगढ़ फिरसे हमायूँ के कब्जा में आ गैल.  लेकिन हमायूँ के कब्जा एहपर बहुत दिन रहि ना पौलस. काहे से कि हमायूँ खुदे अपने बचन पर टिकल ना रहि पौले.

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महाराज विक्रमादित्त से लेकर देवकीनंदर खत्री तक सबकर नाम किला से जुड़ल हव.


अगिले साल मौका मिलते ऊ बंगाल के ओर कूच कइले आ जैसहीं हमायूँ वादाखिलाफी कइले शेर शाह तय क लिहले कि अब इनके सबक सिखा के रहब. ओह समय ऊ चुनारगढ़ से निकल चुकल रहले आ तब तक ऊ नदी के लड़ाई आ घेराबंदी के तरीका भी जान गैल रहले. आखिरकार एही बहाने चुनारगढ़ पर फिरसे शेरशाह के कब्जा हो गैल. 1545 में शेरशाह के निधन के बाद उनके बेटा इस्लाम शाह आ फिर उनकर बेटा आदिल शाह एके पवलन. आदिल शाह धीरे धीरे अपने के एही चुनारगढ़ किला के अंदरे सीमित क लिहले आ आपन सारा कामकाज अपने प्रधानमंत्री हेमू के सौंप दिहले.

हेमू एही चुनारगढ़ से कई ठो जुद्ध छेड़ले. इहाँ रहते हेमू दिल्ली और तुगलकाबाद के लड़ाई भी जीत लिहले रहलन. लेकिन 1575 में चुनारगढ़ पर फिरो अकबर के कब्जा हो गैल. अइसन समझल जाला कि किला के अब जौन रूप हौ, ई अकबर के ही दिहल हौ. अकबर के समय तक एह किला के कुछ हिस्सा ढहि गैल रहल. ऊ सब अकबर के समय में नए सिरे से बनवल गैल. एकरे बाद औरंगजेब के समय में उनकर गवर्नर मिर्जा बैरम इहाँ भैरों बुर्ज के लगे एगो मस्जिद बनवले. ओकरे बाद 1760 में अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमन के बाद चुनारगढ़ पर नवाब लोग के कब्जा हो गैल.

एहीं परल उत्तर प्रदेश के नेइ
नवाब लोग भी चुनारगढ़ पर बहुत दिन टिकले ना. मेजर मुनरो के नेतृत्व में एहपर ईस्ट इंडिया कंपनी के बहमला भैल. ऊ हमला हालांकि पुरहर त ना, लेकिन एक हद तक जरूर सफल भैल. ओह हमला में पूरा किला त नाहीं, बकिर चुनारगढ़ के दक्खिन पच्छू वाला हिस्सा पर मेजर मुनरो के कब्जा हो गैल. आ ओकरे बाद 1768 में पूरे चुनारगढ़ पर अंगरेजन के कब्जा हो गैल. ओही समय चुनारगढ़ के नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज के मुख्य तोपखाना बना दिहल गैल. हालांकि औपचारिक रूप से नॉर्थ वेस्टर्न प्रॉविंसेज के गठन 1836 में भैल, बकिर ओकर आर्टिलरी पहिलहीं बनि गैल रहल. एही नॉर्थ वेस्टर्न प्रॉविंसेज के आगे चलि के 1858 में नॉर्थ वेस्टर्न प्रॉविंसेज एंड अवध, आ फिर 1902 में यूनाइटेड प्रॉविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध बना दिहल गैल. अब ओही के उत्तर प्रदेश के नाम से जानल जाला. सही पूछीं त आज के उत्तर प्रदेश के नींव एही चुनारगढ़ से परल रहल. आ आज के बहुत नौजवानन के ई जान के का मालुम कि अचरज होखे, बकिर एही बीचे 1858 में खाली एक दिन के बदे प्रयागराज पूरे भारत के राजधानी भी बनल रहे. अंगरेजी फौज इहाँ से 1890 में हटावल गैल. आ ओकरे बाद एके पूरी तरह से नागरिक प्रशासन के सौंप दिहल गइल.
तब से लेके अब तक ई नागरिक प्रशासन के ही अधीन बा. हालांकि बीचे में इहाँ पीएसी क ट्रेनिंग और रिकरूटमेंट सेंटर भी बन गैल आ एही नाते ई थोड़े नक्सलियन के हिटलिस्ट में भी रहल. लेकिन एकर जानकारी भइले के बाद प्रदेश सरकार एकरे सुरच्छा के पुरहर इंतजाम कइलस. अब सुरच्छा के इंतजाम त जरूर हो गैल, बकिर एकरे बादो किला के रख-रखाव के इंतजाम अबहिनो कायदे से ना हो पवले बा. एतना ऐतिहासिक महत के किला, जौन अपने आप में न मालूम केतना हजार साल के इतिहास समेटले हौ आ जौने से कई ठे पैरानारमल इतिहास भी जुड़ल बा, जौने के अगर कायदे से कौनो रिकाड रखल जा सके त आगे चल के कबो ऊ मनोविज्ञान के शोध आ अध्ययन के बहुत बड़ा आधार बन सकाला, बतौर ऐतिहासिक धरोहर ओकरे रख-रखाव के काम भगवान भरोसहीं छुटल हौ.

Tags: Article in Bhojpuri, Chunar Fort

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