Bhojpuri: चिरई-चुरुंग आ गोरू-माल, लोकजिनिगी के खुशहाली के सुर-ताल 

सन् 2020 में जब महामारी कोरोना का चलते लॉकडाउन के नौबत आइल, त नगर-महानगर में एगो अजबे नजारा देखे के मिलल. ओह घरी ढेर पाखी साइबेरियो से असमय आ गइल रहलन स. किछु अनेरिया कुकुरो-बिलारि के खाए-पीए के इंतजाम होखे लागल रहे.

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सन् 2020 में जब महामारी कोरोना का चलते लॉकडाउन के नौबत आइल, त नगर-महानगर में एगो अजबे नजारा देखे के मिलल. मनई त अपना-अपना घर में लुकाइल रहे,बाकिर कई गो माल-मवेशी आ जंगली जीव सुनसान सड़क पर चहलकदमी करत रहले स. मोर मगन मन से नाचत रहलन स आ कौआ-काग,गौरैया, कबूतर, पंडुक, सुग्गा, मैना, रूखी-ना जाने कहवां से आके एने-ओने चहकत रहलन स. फेरु त बहुत लोग के मन-मिज़ाज बदलल आ बालकनी में भा छत पर चिरई-चुरुंग खातिर दाना-पानी रखाए लागल. ओह घरी ढेर पाखी साइबेरियो से असमय आ गइल रहलन स. किछु अनेरिया कुकुरो-बिलारि के खाए-पीए के इंतजाम होखे लागल रहे.

एने एगो खबर देखे के मिलल कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के ऊ चहेता कुकुर मरि गइल,जवन पछिला दस साल से उन्हुका संगें रहे आ जेकरा के ऊ आपन सच्चा संघतिया बतवलन. इहवां के लोकजिनिगी के खुशहाली के सुर-ताल होलन चिरई-चुरुंग आउर गोरू-माल. इहवां के लोक भोर में मुरुगा के बांग सुनिके जागत रहे. लरिकाईं में जब हमनीं के सबक रटे खातिर भोर में उठिके पढ़ाई करीं जा,त ओह घरी नांद में गोताइल सानी-पानी में मुंह डुबवले बैल,गाइ,भइंसि के गरदांव में बान्हल घंटी समवेत सुर में एह तरी टुनटुना स,जइसे मंदिर में पूजा-पाठ होत होखे. परिवार के मए लोग पशु-पक्षी खातिर संवेदनशील होत रहे. खात खा पहिला रोटी गाइ खातिर रखा जात रहे आ आखिरी रोटी कुकुर खातिर. अंगना में भा दुआर प

बांस गाड़िके धान के झोंप बान्हि दिहल जात रहे, जवना से कि चिरई-चुरुंग आके खात रहसु आ चहचहाहट से घर-आंगन गुलजार भइल रहो. इहां तक कि चिउंटिओ के बिल का लगे सातू-गूर धरात रहे. दुआर प सरसों छिटा जात रहे आ जहां-तहां से उड़त कबूतर आके दुआर के शोभा बढ़ावऽस.

माल-मवेशी, चिरई-चुरुंग का संगें सांचो के दोस्ताना नेह-नाता होत रहे. पशु-पक्षी आ अदिमी एक-दोसरा के पूरक होत रहे. अतने भर ना, दूनों मिलि-जुलि के कुदरत के हिफाजत करत रहे आ एक-दोसरा प आपन जान छिरिकत रहे. अनबोलता जनावर मालिक खातिर अपना के कुरबान कऽ देत रहलन स आ मनइयो उन्हनीं से बिछुड़िके अतना गमगीन हो जात रहे, जइसे आपन कवनो सवांग गंवा देले होखे.

तब,अदिमी, माल-मवेशी, चिरई-चुरुंग-सभ मिलिके हरेक आफत-बिपत के हंसत-खेलत मुकबिला करत रहे. लोग-लरिकन के वियोग-बिछोह में जनावर आ चिरइयो दुख में डूबि जात रहे.

जैव विविधता हमनीं के संस्कृतिओ के हिस्सा रहल बा. अधिकतर देवी-देवता के वाहन इहे पशु-पक्षी रहल बाड़न. भोले बाबा के सवारी बा बंसहा बैल. दुरुगा माई सिंह के सवारी करेली.  गणेशजी मूस प सवार बाड़न,त लछिमीजी के प्रिय बा उरुआ. गाइ के त महतारी के दरजा हासिल बा. पितरपख में कौआ के महातम हो जाला,त दशहरा में नीलकंठ के. जिनिगी में डेगे-डेग तमाम जीव के संग-साथ जीए के होसिला देत आइल बा. तबे नू नागपंचमी के नाग देवता के पूजा होला आ लोकोकथा में नाग मनई के हितैषी के भूमिका निबाहत बा.

वनवास के दौरान रावन जब सीता जी के हऽरि ले जात बा, त बेयाकुल राम तमाम जनावर-पखेरू से जंगल में घूमि-घूमि के पूछत बाड़न-

हे खग-मृग हे मधुकर सैनी!
तुम देखी सीता मृगनैनी?

जइसे नीम के फेंड़ प चिरई चहकेले,ओइसहीं घर-आंगन में बेटियन के किलकारी गूंजत रहेला. एह से, ना कबो चिरई-चुरुंग के बसेरा नीम के गांछ काटे के चाहीं, ना कबो बेटी के कलेस देबे के चाहीं.

कतना सुचिंतित सोच छिपल बा एह लोकगीत में-

बाबा! निमिया के फेंड़ जनि काटहु
निमिया चिरइया बसेर,
बाबा!बिटिया के जनि दुख देहु
बिटिया चिरइया के नांइ,
सगरी चिरइया उड़ि जइहें
रहि जइहें निमिया अकेल.

सिरिफ अतने ना, लरिकी के तुलना अंगना के चिरई आ खूंटा में बान्हल गाइ से कइल गइल बा.एगो विदाई गीत में कहल गइल बा-

काहे को ब्याहे बिदेस रे,सुन बाबुल मोरे!
हम तो बाबुल तोरे अंगना के चिरई
भोर होत उड़ि जाय रे,सुन बाबुल मोरे!
हम तो बाबुल तोरे खूंटे के गइया
हांके जिते हंकि जाय रे, सुन बाबुल मोरे!

वियोग-बिछोह के बात पर इयाद आवत बा लरिकाईं के एगो घटना. होश सम्हारला प देखलीं कि घर के बरंडा में टांगल पिंजड़ा में लाल ठोर आ रेघारी वाली एगो हरिअल सुग्गी रहे,जवना के मीठ बोली सभके मन मोहि लेत रहे. बाकिर स्कूल के पंडी जी के जब ई बात मालूम भइल,त उहांके समुझवनीं कि चिरई-चुरुंग के कैद कइल नीमन काम ना होला. फेरु त हम घरे आवते पिंजड़ा खोलिके सुग्गी के उड़ा दिहलीं. सुग्गी जाके अंगना के मुंड़ेरा प बइठि गइल.उहवां से फेरु उड़े के कोशिश कइलस,बाकिर ओकरा से त उड़ले ना जात रहे. तलहीं एगो कौआ ओकरा प ठोर मरलस. ऊ सम्हरल चहलसि,तलहीं ना जाने केने से आके एगो बाज़ झपट्टा मारे लागल आ सुग्गी हारि-पाछिके अंगना में,

फेरु बरंडा के पिंजड़ा प बइठि गइलि. आजी हमरा के डांटत सुग्गी के हाथ में लेके पोल्हावे लगली. हमरा के काटऽ त खून ना. फटाफट घर में से मलहम ले आके लगवलीं आ अपना करनी प अफसोस करे लगलीं. ओकरा बाद रोज पिंजड़ा खोलिके सुग्गी के बहरी निकालल जाउ,ऊहो खुश होके चहकत एने-ओने फुल्के,फेरु खा-पीके खुदे पिंजड़ा में ढूकि जाउ,काहें कि केहू के ना रहला प बिलार से डर रहे. आगा चलिके एक दिन पलखत पावते बिलार झपटिके ओकर जान ले लेले रहे आ हम ढेर दिन ले आपन सुध-बुध भुलाके ओकरा शोक में डूबल रहि गइल रहलीं.

एही सिलसिला में मन परत बा सी एफ एंड्रूज के बचपन के एगो कथा. उन्हुका घर के झरोखा पर बनल खोंता में चिरई के एगो जोड़ा रहत रहे. एक दिन जब चिरई बहरी गइल रहे,त बालक एंड्रूज खोंता में झांकिके देखलन,उहवां उज्जर-उज्जर दूगो अंडा रहे. ऊ उठा लिहलन आ अपना माई के देखावे लगलन. माई डपटत अंडा उहंवें धऽ देबे के कहली,काहें कि चिरई आके जब आपन अंडा ना देखी,त ऊ रोवत-कलपत आपन जान दे दी. ऊ अंडा राखे जाते रहलन,तले चिरई आ गइल. उन्हुका के अंडा धरत देखिके चिरई चीं-चीं करे लागलि आ उन्हुका बहुत समुझवला का बादो ऊ खोंता में ना आइलि. एह घटना से आहत बालक एंड्रूज के दिल जीव-जंतुअन खातिर दया के भाव उमड़ि आइल आ ई संवेदनशीलता उन्हुका के 'दीनबंधु' का रूप में अमर बना दिहलस.

गोरू-माल आ चिरई-चुरुंग से जुड़ल अनगिनत कथा लोकसाहित्य के अनमोल निधि बाड़ी स. ओह चिरई के कथा कइसे भुलाइल जा सकेला, जवना के ठोर के दाल गिरिके खूंटा में अंटकि गइल रहे आ ऊ बढ़ई से लेके राजा,रानी,सांप,लाठी,आगी, समुंदर-सभसे मदत खातिर निहोरा कइले रहे. आखिरकार खूंटा अपने आप फाटि गइल रहे आ ओकर दाल के दाना हासिल हो गइल रहे. कतना जीवट के होलन पशु-पक्षी, जे मनई के मदत करत करेलन आ पर्यावरण के हिफाजत में अगहर भूमिका निबाहेलन.

इन्हनीं का संगें कई गो लोकबिसवास आ लोकाचारो जुड़ल बाड़न स. घर के मुंड़ेरा प बइठि के अगर काग बोले, त कवनो प्रिय मेहमान के आवे के शुभ संकेत मानल जाला.फेरु त काग से उचरे खातिर निहोरा कइल जाला आ ओकरा के दूध-भात खिआवे आउर ओकर ठोर सोना से मढ़वावे के वादा कइल जाला. दोसरा ओर, जब केहू के कपार पर कौआ चोंच मारि देउ, त ओह मनई के मउवत के खबर ओकरा आपन खास बेकति तक पहुंचावल जाला आ जब ऊ रो-धो लेला,तब ई मानल जाला कि गरह कटि गइल.

एही तरी खंजन चिरई, जवना के भोजपुरी इलाका में खंड़लिच कहल जाला,जातरा पर लउकि गइल शुभ आ मंगलकारी मानल जाला. 'पद्मावत' के रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी के त अतना ले कहनाम रहे कि कमल के फूल मुंह में लेके फन कढ़ले सांपो प बइठल खंड़लिच लउकि जाउ,त देखनिहार के धन-दौलत,राजपाट जरूरे भेंटाई-

पन्नग पंकज मुख गहे, खंजन तहां बईठ,
छत्र,सिंहासन, राजधन,ता कहं होइ जो डीठ.

जवना  फेंड़ प बकुला बइठि जाला आ जवना घर प गिद्ध बइठि जाला, ओकर बिधनस के घोषणा हो जाला.बाकिर गिद्ध-चिल्होर के त सरल-गलल मांस खाके वातावरन के साफ-सुथरा बनावेवाला जनमजात सफाईकर्मी मानल जात रहल हा.

बाकिर हमनीं के कीटनाशक के इस्तेमाल कऽके गिद्धन के मुआ घलनीं जा. घर-घर में फुदुकेवाली बाभन चिरई फुरगुद्दी लोप होखे का कगार पर बिया,तबे नू ओकरा संरक्षण खातिर बीस मार्च के दुनिया गौरैया दिवस मनावेले. ट्रैक्टर, ट्राली, थ्रेसिंग मशीन हर-बैल के खातमा कऽ दिहलस. जइसे लरिकिन के कोखे में भ्रूण हतिया होत बा, ओही तरी जर्सी गाइ के बछरू बधल जात बाड़न स. कबो खेत-खरिहान-दुआर के रौनक रहल बैल आजु कसाइयन के हाथ में जाके बधात बाड़न स. बाग-बगइचा-लखरांव उजड़ि गइला प कोइलर के कूक अब सुनात नइखे. बानर गांवागाईं आके काटत-झपटत तबाही मचावत बाड़न स.

कतहीं लीलगाइ फसलन के बरबाद करत बाड़ी स, त कतहीं टिड्डियन से जनमानस त्रस्त बा.

आजु जरूरत एह बात के बा कि जनजीवन के आफत-बिपत-महामारी से बचावे खातिर कुदरत का प्रति दिल से संवेदनशील भइल जाउ,पर्यावरण के हिफाजत कइल जाउ आ चिरई-चुरुंग, गोरू-माल खातिर नेह-छोह के भाव जगावल जाउ. तबे हमनीं के जिनिगी जियतार बनल रही, नाहीं त ई दुनिया-जहान भूत के डेरा बनिके रहि जाई. (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)