भोजपुरी में पढ़ें: बड़ा अंतर बा पहले के बइठकी अउरी कोरोना काल के बइठकी में

अब समय आ गईल हिय की किसान की समझ आउर समय क देशहित में उपयोग कायल जाय.
अब समय आ गईल हिय की किसान की समझ आउर समय क देशहित में उपयोग कायल जाय.

भोजपुरी शब्द के कई गो माने होला. बैइठकी के इस्तमाल होत रहल हा मिल के बइठे-बतिआवे खातिर. अब त बइठकी माने कवनो काम धंधा नइखे. शब्द के संगे अर्थव्यस्था के एही पहलु पर लेखक विचार करत हवें.

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  • Last Updated: September 22, 2020, 11:12 PM IST
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ज टीबी, मोबाईल, इंटरनेट की जमाना में गाँव क बारे में सोचले पर बड़ा ताज्जुब होखेला कि जब इकुल ना रहल होई तब लोग कईसे जियत रहल होइहें. आजो अपनी देश में अईसन बहुत गांव हवें जहाँ इकुल ना ह. त उहां क लोग कईसे काम करत होइहे, इ बात समझे वाली ह. किसान के बाझल रहले क सबसे बड़हर माध्यम खेती ह. लेकिन आप सब जानीला कि खेती-किसानी बरहो महीन्ना ना होखे ले. जईसे की फसल खेत में लग गईल त किसान के तनी फुरसत रहे ले. खाद-पानी, कोड़ल-सोहल जईसन छोटमुट काम त चलेला. रोपनी आउर कटिया जईसन किसान बाझल ना रहेला.

रोपनी-कटिया में त किसान एतना बाझ जाला कि केहू पहुना आ जाला त उनके समय पर दाना-पानी देहल मुश्किल हो जाला. लेकिन कटिया-रोपनी क समय छोड़ दिहीं त बाकी समय किसान के तनी फुरसत रहेले. ओह फुरसत के समय के ‘बइठकी’ कहल जाला. मतलब की येह बखत में कवनो ख़ास काम ना होला. आउर आप त जानी ला कि गोरु-चउवा खियावल, बान्हल-छोल किसान खातिन ख़ास काम में ना आवेला. इ त नियमित जीवन क हिस्सा ह.

‘बइठकी’ सबद क दूगो मतलब होला. एगो त मतलब इ ह कि ‘काम ना बा त ‘बइठकिये’ बा. दूसरका ‘बइठकी’ क मतलब इ ह कि अपना फाफर समय में किसान गावल-बजावल करेला. कहनी-खीसा सुनेला आउर सुनावेला. कई ममला में त इ समय अपनी संसकिरती के नयका लईकन के समझावे-सिखावे वाला होला. किसान जेतना अपना बाप-दादा से पावेला, ओकरा से अधिका अपनी लईका आउर समाज के देके जाए के चाहेला. ओकरा जीवन क इहे सफलता ह कि ‘कुछ नया ना बनवलन त पुरानका में से कुछ गववले नायिखें.’ एमे केहू-केहू समझदारी से कुछ बडहरो क देला, जईसे की भिखारी ठाकुर जी कयीलिन.



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त ‘बइठकी’ में किसान अपना समय क उपयोग कई तरह क रचना करे खातिर करेला. चाहे इ कहीं कि किसान खातिन इ समय बहुत जादा रचनात्मक होखे ला. जईसे की एह बेला में किसान बहुत काम अईसन करेला जवन ओकरी सकेती में जिए वाला जीवन के बहुत बढ़िया बना देवेला. आज की जबान में कहीं त ‘बइठकी में किसान आपन छोटमुट काम खुद से क के दुसरे असरा पर ना जिएला.’

इतिहास देखब त किसान बहुत पाहिले से अपनी करनी पर जियत ह. बहुत कम अईसन काम ह जेकरा के करे खातिर उ केहू दूसरा के याद करेला. जब आज मतीन साधन ना रहे तब एगो छोटको किसान अपनी मेहनत से खुद की संगे-संगे दस आउर लोगन क पेट भरत रहे. आपन हजामत बनावे वाला नाऊ से लेके धोबी, कोहाँर तक के बन देत रहे, जेकरा से खेती-बारी ना करे वाला लोग आपन साल भर क खर्ची ले लेत रहलन जा. लेकिन आज सब काम नगदी होखे लागल. एसे केतनी फयदा-नुकसान बा, इ बात सोचे वाली ह.

त ‘बइठकी’ में किसान जवन सबसे बढ़िया काम करेला उ ह ‘रचना’. घरे-बहरे उपयोग में आवे वाली कईगो समान उ खुदे बना देला. खटिया-मचिया से लेके डाली-दउरी, बेना-खटोला-खटोली खुद बना लेला आउर दुसरहूँ क बना देला. अब आप समझ सकीला की किसान क ‘बइठकी’ ओकरा खातिर का होले. एतने नाही- किसान एही समय में गीत लिखेला, गावेला, निरगुन-भजन लिखेला, गावेला. कईगो गाँव में त लोग सनीच्चर के ‘बइठकी’ (गीत-गवनई क काम) लगावेला. एकरा में गाँव क लईका-जवान-बुढ़, सभे भाग लेवेला.

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कईगो किसान एही बइठकी में घर बना लेत रहलन जा. अब आप त समझ सकिला की जब पईसा कम रहे, लोगन की पासे जेतना रहे, लोग ओतने में खूब नीमन अदमी मतीन जियत रहलन जा. लेकिन आज जब पईसा बहुत बढ़ गयील बा त कुल काम नगदी होत बा. कुछऊ काम ह त पईसा क जरुरत बा. अब दिकत इ ह की खेती-किसानी में ओतना फयदा होत नईखे. बीया, खाद बहुत महंग बा. पाहिले खेत बदल के बीया काम में लावत रहलन जा. लेकिन आज सरकार एतना कंपनी खोल दिहले बा की एक से बढ़के एक बिया मिलत बा. ख़रीदे खातिन पईसा ह त आप ख़रीदा.

खरचा बढ़ले क कारन इ दवाईया हो गईल बा. बिना दवाई डलले फसल क एगो दाना घर में ना जाए पावत ह. अईसना हालत में किसान परशान बा. एह परशानी में सरकार से कुछ बढ़िया कईले क उ उम्मीद लगउले बा त उहो बाउर नईखे. लेकिन ओकर बात केहू समझत-सुनत नईखे. उलटा बात कहले पर सरकार ओकरा के डंडा लेके पोंकियावे लागत बा त, इ ठीक नईखे.

देश-दुनिया क बड़हर अर्थशास्त्री आउर खेती-किसानी क बारे में खोज-बीन करे वाला लोग इ कहत हवें की ‘किसाने ह जवन देश में पईसा-रुपिया नहियों रही त खाना सबके खिला सकेला. देश क डोलल अर्थव्यवस्था उहे ठीक क सकेला. लेकिन इ काम तबे हो सकेला जब ओकरा के जरुरी मदद मिले. जईसे खाद-बीज समय पर मिले के चाही. फसल पक गईल त बेचे खातिर जगह बने के चाही. जेतना खरचा फसल लगावे में होत बा ओकरा से तानी अधिका बेचले पर मिले के चाही. इ कुल काम सरकार चाही तबे होई. अभियो समय ह की किसान के बचावल जाव.

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नहीं त सबसे बड़हर दिकत आई खईले क. पईसा से खरीद के खायल केहू से ना सपरी. गांव में जेकर बड़हर परिवार होला ओकरा खातिन एगो कहावत कहल जाला- ‘घरे ना रही त खरीदले ना पोसाई.’

अब समय आ गईल हिय की किसान की समझ आउर समय क देशहित में उपयोग कायल जाय. ओकरा पासे अईसन जोगड़ ह की उ खुद ‘आतम निर्भर ह आउर दूसरो के बना सकेला.’ खेती के आगे ना बढावल जाई त लोग गाव से सहर की ओर परात रही. एतरे परईले से दुगो दिकत हिय- गाँव में खेती-किसानी केहू करे वाला ना बची आउर सहर में भीड़ बढ़ जाई. इ भीड़ कईगो नयी दिकत पयदा करी. ओकर बड़हर नुकसान एगो इहो ह कि बइठकी में किसान क जेतनी रचना देखके मिलत रहे, आज उ टीबी आउर बहरे कमाए जाये वालन की संगे ख़तम होत बा. खेती से एक दूसरे क जवन मदद होत रहे, उ ख़तम हो गईल बा. इ बड़हर दिकत बा. अबहियें से ना चेतल जाई त आवे वाला बखत आउर डरावे वाला हो जाई. खेती किसानी से जुड़ल बहुत कुछ ह. कुल बिला जाई. फिर ताली-थाली बजावत रहब जा. कुछऊ नीमन ना होई.
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