भोजपुरी में पढ़ें: हर ओर से बिगड़ल हालत में अकेले किसान से ही उम्मीद बा

कोरोना के बाद से चउपट भइल माली हालत में अकेले किसान पर ही देश के भरोसा बा. किसान के सामने एगो चुनौती नइखे. बाढ़ बारिश से लेके सूखा तक मौसम के मार किसाने के झेले के बा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 24, 2020, 1:50 PM IST
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भारत में खेती किसानी का मौसम की अनुकूलता  प्रतिकूलता से बड़ा नजदीकी संबंध बा.कभी अति  वृष्टि त कभी अनावृष्टि से खेती के सेहत आ पैदावार के भविष्य दुनो तय होला. अबकी ए साल जुलाई से अगस्त के बीच पूर्वी उतरप्रदेश आ सटले बिहार में अतना बारिश भईल हा कि अरहर आ दलहनी फसल के बुआई ना हो पावल हा. कोरोना काल में अइसहीं लोगन के मुसीबत कम ना रहें. आवाजाही पर लगल रोक के वजह से किसानन के आनाज सरकार से जातना खरीदारी भईल ओकरा बाद बचल आनाज के भावे नईखे मिलत.सबसे पस्तहाली के हाल मक्का के  किसान के बा. खरीदार आधा दाम देबे के तैयार नईखन.

पिछलका साल दो हजार बाईस सौ के रेट मिल गईल रहें ऐसे किसान लोग कोरोना के पहिले जमके मक्का के खेती कईल हा लो. बाकी रबी के फसल पिछलका सीजन में अति वृष्टि की वजह से दलहनी फसल मसूरी चना त मौसम के भेंट चढ़ गईल, गेहूं अउरी मक्का के बंपर पैदावार भईल. गेहूं के खरीदारी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार कईलस. सरकारी आंकड़ा बतावता कि 2015/16 के तुलना में 2019/20 में करीब दुगना गेहूं के खरीद सरकार एह साल कईलसा. ऐह मामला में मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा आ उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा खरीदारी ये परदेसन के सरकार कईल हा. ऐसे कोरोना काल में किसानन के कुछ हद तक राहत भी मिलल.

सरकारी आंकडा़ ई भी बतावता कि एह दौरान धान के समर्थन मूल्य पर खरीदारी 70% जयादा भईल हा. सन 2015/16 तक जहां 7308416 टन धान के खरीदारी भईल ओकरा तुलना में सन 2019/20 में 124,16252 टन धान के खरीद  भईँल. जबकि शांता कमेटी के अनुमान रहें कि कुल पैदावार के 6% से जायदा सरकार हर साल खरीदारी ना क पावें. एह दौरान मौसम के मिजाज में अजब गजब बदलाव देखे के मिलल. पिछलका रबी सीजन में असमय खूब बारिश भईल ऐसे में गेहूं आ मक्का के फसल छोड़ के बाकी दलहनी फसल के खूब नुकसान भईल. एही समय कोरोना महामारी के चपेट में पूरा अर्थव्यवस्था मंदी के शिकार हो गईल.



एह साल के पहिला तिमाही में जहां23.9% के गिरावट दर्ज भईल वहीं बेरोजगारी के दर दुनिया में अपरैल  मई में कोलंबिया के बाद दूसरा नमबर पर पहुंच गईल. परदेसी कामगारन के कामकाज बंद हो गईल. जे जहें रहे जवने साधन मिलल चाहें पैदले अपना घरें चल दीहल. एक लंबा अरसा के बाद घरें पहुंचल तब ओ लोगन के एहसास भईल हा कि सरग में चौकीदारी कईला से बेहतर बा अपना घरें दुवारे झाड़ू लगावल. ठीक समय से ए  साल रोहिन नक्षत्र के बारिश हो गईल.किसान मन परदेश से आके अपना घरें ठौर पईले रहें ओह लोगन के घाघ कवि के बात याद आईल. घाघ कहलें बाड़े कि रोहिन बरसे, मृग तवैं, कुछ कुछ आदर जाए.
घा कहें सुन घाघिनी शवान भात ना खाऐं. मतलब ओह साल धान के पैदावार खूब होई. सरकारी मौसम विभाग के सूचना के मुताबिक एह साल सामान्य मानसून पूरे देश में 7% ज्यादा बरसात आ खरीफ के बुवाई के दायरा में  लगभग 6% के बढ़ोतरी भईल बा. लेकिन बारिश अनुपात अनुमान से कई गुना जायदा आ सामान्य से ज्यादा! बा. दक्षिण भारत में जहां जुलाई में सामान्य औसत से ज्यादा26.3%बरसात भईल. वहीं सितंबर महीना में अबतक 76.6% ज्यादा बरसात होखे के संभावना बा. एही दौरान उत्तर पश्चिमी भारत में बारिश 13.5%कम मानसून के बरसात भईल. अपना उतर परदेश के पश्चिमी हिस्सा में 30% कम बरसात भईल हा.

भौगोलिक रुप से बारिश के अतना असमान वितरण अलनीनो आ ला नीनो के असर अउर जलवायु के परिवर्तन के वजह से होत बा. मौसम के सटीक भविष्यवाणी करें खातिर हाले में भारत जर्मनी के वैज्ञानिक मिली के एगो नया अधययन पेश कईलें बा. अधययन मे  दावा कईल जात बा कि ज्वालामुखी के विस्फोट से भारतीय मानसून के समझे में काफी मदद मिल सकत बा. कहल ई जात बा कि जवालामुखी के विस्फोट से छोट कण आ गैस वायुमंडल के समतापमंडल में पहुंच जाला आ उहाँ क बरसों तक मौजूद रहेला. ज्वालामुखी की राख से निकलकण सूर्य के परकाश  के पृथ्वी तक पहुंचे  से रोक देला.ऐ वजह से प्रशांत महासागर में अलनीनो की परिघटना कीसंभावना बढ़ जाला.एह वजह से अगले साल कम बारिश यानी सूखे की संभावना बढ़ जाला.

एकरा ठीक उलट ला नीनो के परिघटना होला. तब अतिवृष्टि के संभावना बढ़ जाला. जर्मनी के वैज्ञानिक एह बात के भी दावा करत बा कि ऊष्णतटबंधी प्रशांत महासागर और भारतीय  मानसून के बीच संबंध में खासा बदलाव आईल बा. एकर एक वजह ग्लोबल वार्मिंग भी बा.ऐह से मौसम के सटीक अनुमान नईखे लागी पावत.अब उ वैज्ञानिक लो ई बतावत बा कि ई नवका अधययन  से खेती किसानी के नया योजना  बनावें में काफी मदद मिलीं.हालांकि मोबाइल पर गांवन में आज भी पहिले सूचना मिल जात बा.मौसम के अगवाह सूचना के जरूरी वस्तु के बाजार भाव पर भी खासा असर पड़ेला.हाल में मौसम विभाग के घोषणा भईल कि सितंबर में मध्य भारत,   पश्चिमी भारत और उत्तर कर्नाटक में अनुमान से जयादा बारिश होई.

मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के नासिक और गुजरात में एह वजह से सोयाबीन, मूंगफली और प्याज के फसल के नुकसान के संभावना बा. उत्तर भारत में प्याज के कीमत  उपभोक्ता के चेहरा लाल करें लागल. भारत सरकार तुरंत फुरत में   प्याज के निर्यात पर पाबंदी के घोषणा क देलस. अब कर्नाटक के सांसद सरकार से मांग करत बा लोग कि सरकार गुलाब किस्म के प्याज के 10000 टन रोजाना निर्यात के अनुमति प्रदान करें. एहीं तरे इहो अफवाहें बा कि उत्तर परदेश में आलू के एह साल उम्मीद बा. बाढ़ बरसात की वजह से मौसमी  सब्जियां खत्म हो गईल त आलू के भाव अनाप शनाप चढ़़े लगाल.

तीस रुपये तक आलू बिकता. अनुमान ई लगावल जाता कि फसल के बुआई तक भाव तीस पैंतीस से जयादा ही रहीं.अनुमान इहों लगावल जाता कि किसानन के एह साल आलू से खूब कमाई भईल बा त आलू के खेती के दायरा भी अमूमन ज्यादा ही होई. इहाँ बतावल जरुरी बा कि अकेले उत्तर प्रदेश में देश के कुल आलू उत्पादन के करीब 44% पैदावार होला.अभी कोल्ड स्टोर में जतना आलू पड़ल बा, ओकरा बाद करीब 18लाख टन आलू बाजार खातिर उपलब्ध रहीं.तब तक नवंबर में आलू के अगौती फसल बाजार में आ जाई. तबो ई अफवाह फैलल बा कि बाजार में आलू के किलत बा.

अइसहीं कोरोना काल में ई अफवाह फैलल कि मुर्गा खाने से कोरोना  संक्रमण तेजी से फैले ला. नतीजा ई भईल कि मुर्गी पालक के ए साल भठा बैईठ गईल हा.अपने देश में कुल मक्का उत्पादन के लगभग 60% हिस्सा मुर्गियों के दाने तैयार करें में खपत होला. अभी गर्मी वाला मक्का  किसानन के स्टॉक पड़ल बा. आधा दाम मिल ता पिछला साल के मुकाबले. अब जबकि 70% मक्का के खरीफ के फसल  बाजार में आ जाई. तब अनुमान कईल जा सकें ला कि मक्का उत्पादक किसानन के सामने कतना बड़ा मुसीबत आवें वाला बा. एकरा बावजूद किसान कभी हार नईखे मनले. मौसम के मार उम्मीद के बौछार आ आशंका  के बीच किसानन के जिनगानी झूलत रहें ला.

किसानन के मेहनत के ही कमाल कह कहें के चाहीं कि जब पूरा देश में अर्थव्यवस्था में गिरावट दर्ज होत रहें अकेले खेती के क्षेत्र में विकास दर में  3.4% के  दर  से बढ़ोत्तरी दर्ज  भईल. एह वजह से किसान के  अन्नदाता अउर अन्न के देवता के उपाधि दीहल ग गईल बा. आदमी पैईसा रुपया चाहें जतना कमा ली खाईं त आनाजे. ऐसे जीवन के जवन चार गो आश्रम मानल  जाला ऊ सब गृहस्थ आ गृहस्थ आश्रम पर आधारित बा. किसानन के ए वजह से महत्व दिहल जात रहें. बीच के काल में जब औद्योगिक विकास आ तकनीकी विकास के खुमारी सर प चढ़ल रहें तब खेती किसानी के महत्व के नजरअंदाज करें के जरूर कोशिश भईल.

बाकी एहीं बीचे खेती किसानी एक बार फिर कुछ खास वजह से चर्चा के केंद्र में आ गईल बा. अब उम्मीद बा कि खेती किसानी के दिन बहुरे वाला बा.एहीं बहाने पूरा  देश किसानन के सवाल पर जाग गईल. काहें कि अर्थव्यवस्था के. बाकी क्षेत्र में रफ्तार पकड़े  में अभी सन 2021 नवम्बर दिसंबर तक इंतजार करें के पडीं. अब एतना उम्मीद जरूर बा कि आफत बिपति के समय खेती आ किसानी में आज भी उ क कुवत बा कि कम से कम अन्न के अभाव गरीब आदमी के जिनगी  तबाह ना होई. अन्न के भंडार त किसान अपना मेहनत के बदौलत भरले बाड़न. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये मुफ्त में आनाज आज गरीब गुरबा मुंह के निवाला बनत बा.
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