Bhojpuri: देश क पहिला दुतल्ला पुल, पढ़ी पूरी कहानी

अंगरेज भारत के लूटय आयल रहलन. लूटय बदे सड़क, रेल अउर पुल क जरूरत रहल, ताकि लूट क समान असानी से ढोवल जाइ सकय. कहीं भी असानी से आवल जाइ सकय. कलकत्ता से पेशावर तक ग्रांड ट्रंक रोड क निर्माण एही बदे कयल गयल रहल.

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भारतीय उपमहाद्वीप क पहिला दुतल्ला पुल बनारस में गंगा नदी पर बनल रहल. बनारस अपने आप में धरोहर हौ, अउर इ पुल भी आपन एक खास स्थान रखयला. पुल क निर्माण जनवरी 1881 में शुरू भयल अउर सात साल बाद दिसंबर 1987 में आवाजाही बदे खुलि गयल. पुल पर नीचे रेलगाड़ी चलयला अउर ओकरे ऊपर मोटर-गाड़ी. पहिले एकर नाम डफरिन ब्रिज रहल. लार्ड डफरिन ओह समय भारत क वाइसराय रहल. अजादी के बाद पुल क नाम बदलि के पंडित मदनमोहन मालवीय के नाम पर मालवीय सेतु कइ देहल गयल. लेकिन बनारस क लोग अपने अंदाज में महल्ला के नाम पर राजघाट क पुल बोलावयलन.

अंगरेज भारत के लूटय आयल रहलन. लूटय बदे सड़क, रेल अउर पुल क जरूरत रहल, ताकि लूट क समान असानी से ढोवल जाइ सकय. कहीं भी असानी से आवल जाइ सकय. कलकत्ता से पेशावर तक ग्रांड ट्रंक रोड क निर्माण एही बदे कयल गयल रहल. हलांकि इ सड़क शेरशाह सूरी बनवउले रहल, लेकिन अंगरेज एकर फिर से निर्माण करउलन. अपने जमाने में इ एशिया क सबसे लंबी-चौड़ी सड़क रहल. जीटी रोड राजघाट के पुल से ही गुजरयला. राजघाट क पुल आपन उमर पार कइ चुकल हौ. कई बार पुल क मरम्मत कइ के चलावल जात हौ. फिर भी खतरा बनल हौ. अब बगल में ही गंगा पर एक दूसर पुल बनावय क घोषणा भइल हौ. नए पुल क परियोजना अबही डीपीआर स्तर पर ही हौ. नया पुल भी पुराने के ही तर्ज पर दुतल्ला रही. नीचे से रेल अउर ऊपर से मोटर-गाड़ी चली. परियोजना पर कुल दुइ हजार करोड़ रुपिया क खर्चा आई. पुल क निर्माण रेलवे अउर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण मिलि के करिहय. चार लेन वाले नए पुल क चौड़ाई 70 मीटर बतावल जाला.

लेकिन पुराना राजघाट क पुल अपने पीछे जवन लकीर छोड़ले हौ, ओहके मिटाइब कठिन हौ. ब्रिटिश पत्रकार जान सर्जेंट बीबीसी क वृत्तचित्र ’ट्रैक्स आफ एंपायर’ बनावय बदे 3000 मील लंबी रेलयात्रा कइले रहलन. सर्जेंट बनारस के डफरिन पुल क खूब बखान कइले रहलन. ’मिनट्स आफ द प्रोसीडिंग्स इंस्टीट्यूशन आफ सिविल इंजीनियर्स’ में प्रकाशित एक पत्र में तमाम रेलवे पुल क चर्चा कयल गयल हौ. पत्र में डफरिन ब्रिज क तुलना ओकरे निर्माण तकनीक के आधार पर आस्ट्रेलिया के हाक्सबरी ब्रिज से कयल गयल हौ. दूनो पुल एक ही कालखंड में बनल रहलन. डफरिन ब्रिज इतिहास क पहिला पुल रहल जवन लोहे के ढाचा से विशेष तकनीक के जरिए बनल रहल. एकर निर्माण अवध एवं रुहेलखंड रेलवे कंपनी क इंजीनियर लोग कइले रहलन. पूरा निर्माण कार्य इंजीनियर फ्रेडरिक थामस ग्रेनविले वाल्टन के नेतृत्व में भयल रहल. फ्रेडरिक ही गोदावरी नदी पर ’हैवलाक ब्रिज’ क निर्माण कइले रहलन. फ्रेडरिक क पत्र ’द कंस्ट्रक्शन आफ द डफरिन ब्रिज ओवर द गंगाज एट बनारस’ के अनुसार, पुल के निर्माण क मंजूरी जुलाई 1879 में देहल गयल, निर्माण क शुरुआज 19 जनवरी, 1881 के भयल, फिर 24 सितंबर, 1887 के पुल क परीक्षण भयल अउर 16 दिसंबर, 1887 के वाइसराय के हाथे से पुल के औपचारिक रूप से आम आवागमन बदे खोलि देहल गयल. पुल क लंबाई 1048.5 मीटर हौ. नीचे रेलमार्ग अउर ऊपर सड़क मार्ग. सड़क मार्ग पर दूनों किनारे फुटपाथ भी. गंगा में नौका विहार करत समय राजघाट के पुल क नजारा देखतय बनयला. पुल क छंटा अइसन लगयला जइसे गंगा मइया के गले में हार पहिनावल गयल होय.

बनारस गजेटियर के अनुसार, पुल के निर्माण पर ओह समय लगभग 47 लाख चार हजार रुपिया लागत आयल रहल. पुल क निर्माण जब शुरू भयल तब लार्ड रिपन भारत में वाइसराय रहल. लार्ड रिपन स्वशासन क पक्षधर रहल अउर अपने प्रशासनिक सुधार बदे चर्चित रहल. उ भारत में 1880-84 तक वाइसराय रहल. पुल पर स्थापित शिलापट्ट के अनुसार, पुल क उद्घाटन रानी विक्टोरिया के भारत साम्राज्ञी बनले के इकतीसवें बरस में भयल रहल. डफरिन ब्रिज से पहिले एही स्थान पर नाव पर निर्मित पुल रहल अउर ओही पुल पर से शेरशाह सूरी मार्ग गंगा पार करय. डफरिन ब्रिज के उद्घाटन के मौके पर फ्रेडरिक क मित्र अउर साहित्यकार रुडयार्ड किपलिंग भी मौजूद रहलन. पुल बनले के छह साल बाद किपलिंग ’द ब्रिज-बिल्डर्स’ नाम क एक कहानी लिखलन. कहानी बहुत चर्चित भइल. कहानी में गंगा नदी पर अइसनय एक ठे बड़ा पुल बनावय में आइल कठिनाई क जिक्र हौ. इ कहानी सबसे पहिले 1893 में ’इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज’ में छपल रहल. कहानी क नायक पुल निर्माण के काम में जुटल इंजीनियर फिंडलेसन हौ. फिंडलेसन के सामने बाढ़ के कारण पुल के क्षतिग्रस्त होवय से बचावय क चुनौती हौ. बतावल जाला कि फिंडलेसन क किरदार फ्रेडरिक पर आधारित हौ.
डफरिन ब्रिज पहिले सिंगल लाइन क रहल. बाद में 1947 में पुल क दोहरीकरण भयल. दोहरीकरण के बाद पांच दिसंबर, 1947 के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत पुल क उद्घाटन कइलन अउर पुल क नाम मालवीय सेतु रखि गयल. उद्घाटन के मौके पर मुख्य इंजीनियर के.सी. बाखले के साथ बीएचयू क तत्कालीन कुलपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी मौजूद रहलन. (सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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