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Bhojpuri में पढ़ें- अगहन: हांड़ी देत अदहन

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ओइसे त जिनिगी में हरेक पल,हरेक छन के महातम होला, बाकिर तबो किछु समय अइसन आवेला,जवन जनसमुदाय के विशेष रूप से आनंदित करेल ...अधिक पढ़ें

कहल गइल बा-पुरुष बली नहिं होत है,समय होत बलवान. एही से मनई के परिस्थिति के दास कहल जाला, काहेंकि
भलहीं ऊ कतनो उतजोग करे, अगर काल-परिस्थिति अनुकूल ना होला,त ओकर तमाम कोशिश निष्फल साबित होला आ
होनी(लिखितंग) होके रहेला. इहे राजा के रंक आ भिखार के रातोंरात बादशाह बना देला. जनता जनार्दन के रचल ई कहाउत के नइखे जानत-राजा हरिश्चंद प विपत परल,पकवल मछरी नदी में गिरल. एही से काल के भोजपुरी में मउवत मानल जाला.
बाकिर इहो कहनाम सोरह आना सांच बुझात बा-जब आछे दिन आइहें,बनत न लगिहें देर. मतलबी समाजो त बनला के आगा आ बिगड़ला का पाछा रहेला. बाकिर ‘राम ना बिगड़िहन जेकर,केहू का बिगाड़ी जी?’

फेरु बिगड़े-बिगाड़े वाली ना,बने-बनावे वाली बात काहें ना कइल जाउ! जब साल आ महीना के बात चलेला,त अगहन मास के महातम गिनावल जाए लागेला.

जब लीला पुरुषोत्तम भगवान सिरीकिसुन अर्जुन के गीता के उपदेश देत रहलन, त मउसम, प्रकृति आ कुदरत के चरचा करत कहत बाड़न- हम नदियन में गंगा नदी हईं. ऋतुअन में हम बसंत ऋतु हईं आ महीना में हम अगहन मास हईं. आखिर का खासियत होला एह अगहन मास के?

महीना अगहन के मार्गशीर्ष,अग्रहायण भा अग्रहण कहल जाला. आसाढ़ के अंजोरिया एकादशी के देवशयनी एकादशी कहल जाला आ ई मानल जाला कि देवशयनी एकादशी से लेके चार महीना देवी-देवता शयन करे चलि जालन आ ई सिलसिला कातिक महीना के अंजोरिया एकादशी, देवउठनी एकादशी ले चलेला. इहे कारन बा कि ओह बीचे कवनो शुभ काम ना होला. कातिक का बाद जब अगहन महीना आवेला,त शुभ काम के सिरीगनेस हो जाला, जवना में शादी- बियाह समेत तमाम सगुनी शुभ काम शुरू हो जाला आ लगन चरचराए लागेला. देवी-देवता जाग्रत अवस्था में रहेलन, तबे नू ई महीना अगहर,अव्वल आ मार्ग शीर्ष मानल जाला.

सावन से कातिक ले बरसाती मउसम रहेला. कतहीं नदियन में बाढ़ के प्रकोप होला,त कतहीं सूखा के. किसिम-किसिम के कीरा-मकोड़ा कीच-काच के मउसम में जनमेलन,बढ़ेलन आ जनमानस के नोकसान पहुंचावेलन. एह सभसे मुकुती मिलेला,जब अगहन के महीना शुरू होला.

बरसात का बाद आस्ते-आस्ते गुलाबी जाड़ आ जाला आ मउसम खुशगवार हो जाला. सेहत खातिर हरियर साग-सब्जी आ तरोताजा फल-मूल आवे लागेला. दिन छोट आ रात लमहर हो जाला. जवन खाइल जाला, आसानी से पचि जाला. अगहन,पूस,माघ महीना का बारे में कहल गइल बा-

अगहन-हांड़ी देत अदहन
पूस-फासे फूस
माघ से दिन बाघ!

कहे के माने ई कि अगहन में दिन अतना छोट होला कि हांड़ी के अदहन खउलत कहीं कि दिन खतम! अगहन में खेत से खरीफ के फसिल कटा के आ जाला. धान के चिउरा कुटाए लागेला. जोन्हरी के एगो किसिम अगहनिया होला, जवन अगहन में फरेला आ ओकर झोंप के झोंप तूरिके ओखर में मूसर से चिउरी कुटाला. ऊखि के काटिके कल्हुआड़ा में पेरला का बाद सोन्ह-मीठ गूर बने लागेला आ कचरस से लेके गूर के संगें चिउरा आ तिलवा,लाई,तिलकुट के सवाद लरिका, जवान, बूढ़-सभकर मन मोहि लेला. गूंग भला गूर के सवाद का बताई! अइसहीं अगहन में अतना गुन बा,जवना के बयान-बखान नइखे कइल जा सकत.

अगहन के गुलाबी मउसम में ना गरमी के एहसास होला, ना ठंढा के. बरखा के त नांवोंनिशान खतम हो गइल रहेला. खेती-किसानी के काम निपटाके खरीफी फसिल के अनाज घर में आ गइल रहेला आ गिरहत्त के जबान पर गीत गूंजत रहेला-उगे रे मोर सुगना,माटी में सोनवा!

फेरु त अगहन में मेला के बहार होला. मेला,जवन सामूहिकता आ मिल्लत के पर्याय होला. बलिया जिला में बैरिया रानीगंज बाजार का लगे एगो मेला लागेला-सुदिष्ट बाबा के मेला. बाबा अगहन सुदी पंचमी के धनुष के जगि करावत रहलन,जवना के इयादि में आजुओ अगहन अंजोरिया पंचमी के धनुष जगि मेला लागेला आ महीना भर चलेला. कातिक पूरनवासी के लागेवाला हरिहर क्षेत्र, सोनपुर आ भृगु क्षेत्र, बलिया के मेला अगहन के शोभा बढ़ावेला.

अगहन के गुलाबी ठंढ वाला ई महीना आवाहन करत बा-खूब खा,खूब सेहत बजावऽ,खूब शादी-बियाह,बर-बरियात के नेवता पुरावऽ,खूब मेला घूमऽ आ पुड़ी-जिलेबी प हाथ फेरऽ! एह सुहावन महीना में जहां-तहां पुस्तको के मेला लागल बा, जहवां दिमागी सेहत बनावे का संगें ज्ञान के खोराको भेंटात बा. कतहीं गीता-जयंती समारोह हो रहल बा, त कतहीं ज्ञान जगि ठनाइल बा.

कुल्हि मिलाके अगहन के ई अगहर महीना कुदरत के संगलेहर बने के सनेस देता. गुलाबी जाड़ ठिठुरावत नइखे, ई त कल्हुआड़ा जाके नवका गूर के मिठास से ओतप्रोत होखे खातिर उकसावत बा. चिउरा-दही-गूर के सवाद लेबे के आवाहन करत बा.जेकरा-जेकरा हाड़े हरदी लागत बा, ऊ त खुश बड़ले बा, जे एह मोका के साखी बनत बा, ऊहो कम खुशनसीब नइखे. तिलक-बरियात में गीतगवनी मेहरारुन के लोककंठ से हरसिंगार-अस झरत गारी सुनिके भला के अभिभूत नइखे होत! ई त प्रीत के सौगात हऽ नू! अगहन तन-मन के तिरपित करत जा रहल बा.आनंदित होत रहीं, आनंद बांटत रहीं आ अगहन का प्रति आभार परगट करत रहीं.

ई अगहन हांड़ी देत अदहन लेखा जाई,त फेरु एक बरिस का बादे जाके आई. जात-जात एह अगहन मास के महातम के आत्मसात करे के जरूरत बा. जे अगहन नियर बांटी,ऊहे बांची आ ओकरे के जनमानस बेरि-बेरि गोहराई. तबे नू लीला पुरुषोत्तम भगवान सिरीकिसुन कहलन कि हम महीना में अगहन हईं.जै श्रीकृष्ण!जै अगहन!

(भगवती प्रसाद द्विवेदी भोजपुरी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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