Bhojpuri Spl: पढ़ाई-लिखाई बढ़ल, लेकिन आपसी प्रेम भइल कम... आखिर काहें बदलत बा गवईं समाज?

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ग्रामीण समाज (Village Society) में पहिले जेतना आपसी भाईचारा रहे, मेल-मिलाप रहे, ऊ धीरे-धीरे कम होत बा. पढ़ाई-लिखाई (Education), कमाई-धमाई से इ सब बढ़ल चाहत रहे, लेकिन बिल्कुल उल्टा होखत बा. आखिर काहें?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 5, 2021, 11:49 AM IST
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‘अब गांव में पहिले जईसन हाल ना ह. अब केहू की घरे जाके बईठल, खायल-पियाल, हुक्का-चिलम बाँटल बंद हो गईल ह. बहुत कम लोग हवें जिनकर आपस में बिसवास बनल ह.’ आशीष से परधानी की चुनाव पर बात करत समय जब इ सुने के मिलल त बहुत ठीक ना लागल. उदारीकरण की बाद से किताब आउर विद्वान बतावत हवें लोग कि अब गांव बदलत हवें सो. उत्तर आधुनिकता सब तरफ हावी होत बा. लेकिन कुछ अईसन बात रहल हीय जवना कारण इ कुल बात पर बिसवास ना होत रहल ह. लेकिन अब उहो टूटले की कगार पर पहुंच गईल बा.

गांव में इ कुल देख सुन के एगो बात समझ आईल की पढ़ाई-लिखाई बढ़ गईल, लोग कमाए-धमाए लगलन. घर में पईसा आवे लागल. अब जब सब केहू सक्षम हो गईल बा त आपस में प्रेम बढ़े के चाहीं. लेकिन होत उल्टा बा. लोग आपन घर कम बनावत ह, दूसरे क कईसे टूटी, इ सोचे में अधिक समय लगावत ह. अईसन ना ह कि इकुल बात पहिले ना होत रहल हीय. लेकिन तब लोग सीमा ना लांघे. लोक-मरजाद बचा के चले. जबसे लोग सीमा लांघे शुरू कईले बा तबसे लागत ह कि सोच में मुरचा लग गईल ह. केहू के दूसरे क सुघर चीज़ ना देखात बा. सब एमे लागल ह कि फलाने क बाढ़ कईसे रोकल जाव.

आज सब आपन कमात खात ह. अब केहू के हरियर सावा चूल्ह में सूखा के कूट के खईले क जरुरत ना ह. केहू की घरे में फांका ना पड़ेला. खेती-बारी करे वाला अब शायद केहू अईसन मिली जेकरा घरे खरची क सकेत होखे. जब हरित क्रांति ना आईल रहे तब हर गांव में कुछ अईसन घर जरुर रहें जिनकर खरची साल भर न जुरे. काच फसल काट के सुखावे-खाए के परे. होरहा रस से काम चलावे के परे. खाना की अभाव में चना-केराव उखार लेहल, खेत से पाकल गेहूं/धान काट लेहल आम बात रहे. गदराईल फसल पर पहरा देवे के परे. ऊख, कुकुढ़ी, जोन्हरी, सावा, कोदो क चोरी खूब होखे. रहर क छीमी गाय-गोरु चरावत क लोग थयिली में भर लें आउर घरे ले जाके सूखा के दाल निकालें. तरकारी में डाल के खा जायं. नशपाती, तरबुज्जा, ककरी, खीरा, गाजर, मुरई, कन्ना क चोरी करत लईका खूब पकड़ाय. अक्सर अईसन होखे की लईका क माई ओकरा के बचावे आवें आउर कहें कि ‘बाबू कई दिन से चूल्ह ना बरत हिय. पानी पी के दिन काटत हईं जा.’ इ बात सुनके बहुत नीमन त केहू के ना लगत रहल होई. लेकिन जे रात दिन मेहनत क के उपजावे उहो परेशान रहे. दूसर बात इ की चोरियो करे वाला दुई तरह क होखें-- केहू सुवाद खातिन चोरावे, त केहू भूख से परेशान होके चोरावे. एसे खेतिहर रात-दिन रखवारी में परेशान रहे.

तब फसल बहुत कमजोर होखे. माटी बहुत उपजाऊ ना रहे. बड़हर परिवार में खरची क कमी अक्सर होत रहे. जेकरा घरे सवांग ढेर रहें, उनकरा घरे फसल गिरले से पहिले खरची क कमी होखल आम बात रहे. सावन-भादों में जब झड़ी लगे आउर दुई-तीन दिन तक लगातार चल जाय त घर में अनाज रहलहुं पर खरची क सकेत होखे लागे. लेकिन तब गांव में एक दूसरे क बड़हर सहारा रहे. नून-तेल-हरदी, आगी-पानी क लेहल-देहल चलत रहे. एकरी बिना केहू क काम ना चले. छोट-बड़, अमीर-गरीब सभे एक-दूसरे के काम आवे. समान क लेन-देन त खूब होखे. खेत में खाद-बीज, हर-हेंगी-बरही-जुआठ, नाधा-पैना तक क लेन-देन चले. केहू क केहू से मनमोटाव होऊ जाय त ढेर दिन ना चले. एसे की अकेले खेती-बारी क काम ना हो पावे. कहीं न कहीं जरुरत पड़ जाय. कबो लईका त कबो खेती क काम दूरी खतम क देवे.
तब बहुत आभाव रहे लेकिन अहम् क भाव लोगन में ना रहे. कुछऊ नीक-जबुन भईले पर लोग सब छोड़के आगे आवें. जब बदलाव शुरू भईल तब मशीन आउर काम में मदद क बात होखे. बनावे वालन क कहना इ रहे की मशीन अईले से अदमी की हाथ के अराम मिली. काम साफ-सुथरा आउर जल्दी होई. लेकिन एकरा परयोग से अदमी क व्यवहार बदल जाई. मशीन ओकरा के एतना स्वार्थी बना देई. इ बात कहीं ना रहे. जवन बात कहीं ना रहे, उ आज सबसे ढेर होत हिय. आज समाज में बदलाव सोझे देखत बा.

बात इ ह कि येह बदलाव से दिकत का बा? समय की संग्हे बदलाव त होखही के चाही. बिलकुल होखे के चाही, लेकिन ओह बदलाव क कवनो फयिदा ना ह जेसे कि अदमी क आदमियत खतम हो जाय. जईसे कि पहिले केहू आपस में झगरा करे त लईका/लईकी/मेहरारुन के कुछ ना बोले. जवान/सवांग आपस में निपटें. लेकिन आज लोग कमजोर जगह पर हमला करत ह. बराबरी आउर स्वाभिमान क लड़ाई क बखत बीत गईल बुझात बा.

अब इ सोचल जरुरी ह कि अयिसने समाज बनावे क सपना रहल ह का? यदि इ ठीक होत त होखे दिहल जाव आउर ना ठीक होत ह त ओकरा के ठीक करे क तरीका खोजे के परी. इ जवन होत ह, एकरी जरी में जाए के परी. कारण खोजे के परी. एसे की अदमियत ना बची त कुल बचा/बना के का होई. आप सब त जानी ला कि आदिम समाज के कई जगह बरबर कहल जाला. ओकर कारण इहे ह कि कुछ लोग अपना सुवारथ खातिन केहू क जान लेवे में ना सोचे. लईका/बच्चा में उनहन लोगन के भेद ना रहे. जे कमजोर रहे ओकर जियल मुश्किल रहे. लेकिन जब तनी समझ बढ़ल, लोग बढ़िया सोचे/करे लगलन. धीरे-धीरे जीवन कीमती हो गईल. लोग बाग़ समझ के काम करे लगलन. शिक्षा आईल त लोग सोचे लागल की आगे कुल आउर बढ़िया होई. होतो रहल ह. विज्ञान/मशीन मिल के अदमी के ठीक क देत हईं सो. मरल आदमी जी जात ह. लेकिन एकर दूसराकी बात ढेर डेरावे वाली ह. अदमी में जेतना सुवारथ बढ़ी, उ ओतने बुरा होत जाई. (लेखक रामाशंकर कुशवाहा वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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