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Bhojpuri: खास नक्षत्र से ही खेती-किसानी के होखे ला गणना, जानीं कब ना खाए के श्वान भात!

किसानन के खेती किसानी के काम आ गृहस्थ के गर्भाधान से मृत्यु तक के संस्कार एह काल गणना आ मुहूर्त के शुभाशुभ से ही आज भी तय होत बा. मौसम विज्ञान के अनुमान के तकनीकी जब अतना विकसित ना रहें,तब घाघ,अउर भरथरी आ परासर संहिता में बतावल अनुमान आ तरीका से ही खेती किसानी के काम चलत रहें.

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मौसम के मिजाज बदलल,खेती के उपज के पूछ कम भईल, कोरोना काल में बढ़ल किसानन के मुश्किल.. दुनिया में शायद भारत ही अइसन देश बा जहां, सूक्ष्मतम काल गणना पद्धति अति पराचीन काल से प्रचलित रहें.ओह समय ऋतु, मौसम आ नक्षत्र के जानकारी के बारे में भले आजकल के तरह कवनों एडवांस तकनीकी ना विकसित रहें, बाकी अनुभव पर आधारित काल गणना बिल्कुल दुरुस्त होत रहें. अउरी कवनों देश में तीन तरह के मौसम,छह के ऋतु आ सताईस तरह के नक्षत्र के परिकल्पना शायद नइखे भईल.

किसानन के खेती किसानी के काम आ गृहस्थ के गर्भाधान से मृत्यु तक के संस्कार एह काल गणना आ मुहूर्त के शुभाशुभ से ही आज भी तय होत बा. मौसम विज्ञान के अनुमान के तकनीकी जब अतना विकसित ना रहें,तब घाघ,अउर भरथरी आ परासर संहिता में बतावल अनुमान आ तरीका से ही खेती किसानी के काम चलत रहें.अपना यहां ई काल गणना सूर्य के उदया तिथि से तय होला.ओकरा आधार पर सूर्य ग्रहण आ चंद्र ग्रहण के तिथि आ समय आज भी तय करे के विधान बा.सोलहवीं शताब्दी के मध्य काल तक यूरोप के ज्ञानी विज्ञानी लोगन के इहे पता रहें कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगावें लन.सोलहवीं शताब्दी के मध्य में खगोल शास्त्री कॉपरनिकस ने यह बताया कि सूर्य ना पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगावें लें.

एह जानकारी के यूरोप के दुनिया में कॉपरनिकस क्रांति के नाम से बात जानल जाला. जब कि भारत में लगभग 956 साल पहिले वराह मिहिर जी अपना खगोलीय ज्ञान के आधर पर ई बात जान चुकल रहलन कि सूर्य ग्रहण आ चंद्र ग्रहण कवना दिन,कवना घड़ी आ कब से कब तक लागे वाला बा.दशमलव से पाई तक के सटीक मान निकाले के गणीतिय जानकारी अपना ऋषि मुनि लोगन के रहें.ईशा के पहिले आ ईशा के बाद दुनिया में प्रचलित आज के काल गणना पर भले आज कवनों प्रश्न चिन्ह खड़ा नइखे होत. बाकी आज भी अपना देश में लग्न शुभाशुभ मुहूर्त सूर्य के उदया तिथ से तय करें के विधान बा. खेती किसानी के काम में कवनों खास नक्षत्र में वर्षा सूखा,लूह जाड़ा के अनुमान लगावें आ ओकरा आधार पर मौसम के मिजाज के बारे में, चाहें आगामी खेती में पैदावार के बारे में भविष्यवाणी करें के पद्धति अपना देशज भाषा में खूब विकसित रहें.

मसलन,अनुभव के आधार पर ही किसानन के आपन कवि अउर मौसम विज्ञानी घाघ जी कहत बानी जे,,,,,,रोहिणी बरिसै, मृग तवे कुछ कुछ आदर जाय.कहें घाघ सुनि घाघीनि श्वान भात ना खाय..,,,,,मतलब ई कि जब एह क्रम में मौसम के मिज़ाज रहें आ बरसात के स्थिति कायम रहें, तब ओह साल धान के पैदावार खूब होई.अतना कि कुकुर भी भात खात खात उबिया जइहें.ओहि तरह सूखा के बारे में भविष्यवाणी कइल गइल बा.,,,,,,,,,,कवि ऐलान करत बाड़े कि,,,,,,,,, दिन में बादर, रात निबदर. बहै पुरवाई झब्बर झब्बर.घाघ कहें कुछ होनी होई. कुआं खोदी के धोबी धोई..,,,,,,,,,,,,मतलब ई कि सावन महीना में फसल के बोवाई के बाद दिन अउर रात में आकाश में बादल के अइसन स्थिति होखे आ पुरवा हवा अपना पूरा जोम में बहत होखे,तब निश्चित बा कि ओह साल भयंकर सुख पड़ी.अइसन कि धोबी के कपड़ा धोये खातिर नया कुआं खोदे के पड़ सकेला.ताल तलैया, गड़हा तालाब में कहीं भी पानी नसीब ना होई.

ठीक ओइसे बाढ़ के आवें के अनुमान कइल गईल बा.मसलन सेमा पक्षी के खेत में आगम देखी के गंगा आ घाघरा नदी के किनारवाही के किसान एह बात के पूर्वानुमान कर लेत रहलन कि बाढ़ आवे वाला बा.किसान भाई एक दूसरा से बतावस कि बाढ़ के आवग सेमा.अइसहीं पुरुवा नक्षत्र में जब जम के पुरवाई हवा चलें,तब किसान अपना अनुभव के आधार पर ऐलान करें कि राणी के रोवल,आ पुरुवा के बहल. कभी बाव ना जाई.. मतलब ओह साल बाढ़ जरूर आई. वइसे माघा नक्षत्र में जतना दिन पछुवा हवा चलेला, पान के खेती करें वाला किसान ओकरा के लिखी के राखें देलन.एह खातिर कि माघ महीना में ओतने दिन पाला पड़े के संभावना बढ़ जाला.पान के पता बहुत नाज़ुक होला.ज्यादा ठंड पाला,से नुकसान हो जाला.ऐ वजह से पान के खेती करें वाला किसान,अगवाहे पान के बचावें के इंतजाम कर लेलें. खेत कब जुताई करें के चाही,कतना जोताई करें के चाही,कवना फसल के बोवाई करें के कब अनुकूल मौसम बा.ओकर विधिवत जानकारी एक आम किसान के गांव में आजो बा.

एह जानकारी के आधार अनुभव के अलावा पुरनिया लोगन के बतावल सीख रहें. ग्रीक दार्शनिक प्लेटो बतावत बानी कि पुराने यादों अनुभवों को बार बार याद करना ही ज्ञान हैं.अपना देश में जहां मुफ्त ज्ञान दान के उत्कृष्ट तरह के दान बतावें के परंपरा कमोवेश आजो जिंदा बा.ओह ज्ञान के वाचिक पद्धति से दुसरका पीढ़ी तक पहुँचावें के चलन हाल तक रहल बा. बाकी आज जब से हर तरह के जानकारी आ सूचना प्राप्त करें के आधार गूगल गुरु हो गइल बाड़न, खेती आ मौसम के पूर्वानुमान खातिर रेखियाउठान वाली पीढ़ी,गाँवन में भी अपना बुजुर्गन के संगे बइठे आ पुरनका अनुभव साझा करें में संकुचात बाड़न.फिर भी कोशिश होखे के चाही एह तरह के अनुभव ज्ञान, डिजिटल प्रणाली से बचावल जा सकें.अगर कवनों व्यवस्था ना होई, तब बहुत सम्भव बा कि एक समृद्ध ज्ञान परम्परा से आवें वाला पीढ़ी वंचित हो जाय. (लेखक मोहन सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं.)