Bhojpuri: का रउआ बता सकीं ना आम के अउर का कहल जाला? पढ़ब त इयाद आ जाई बचपना!

आम चाहें कांच होखे भा पाकल, हर अवस्था में अपना ओरि लोगन के लुभा लेला. अगर अइसन ना रहित त राहि चलत-चलत अमराई में टिकोढ़ा लटकल देखि अचानके ओह पर ढेला भा झटहां ना फेंका जाइ. सायदे कवनो गांव होई, जहवां बगइचन के बाढ़ि के दिनन में भी पुलुई पर एगो पाकल आम देखि के चढ़े वाला वीर बालक ना होइहें.

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एह बात से सायदे केहू इनकार करी कि फलन के राजा आम ना ह. आम में कुछु त खास बड़ले बा कि ओकरा के देखते संयमी से संयमी लोगन के मन के गील कई देला. हमनीं इहां के एगो बाबा के आम के लेके गजबे कहनाम रहे. सवाल पूछला के अंदाज में ऊ कहत रहले कि जेकरा आम देखि के लार ना चूए, मरदवा ऊ आदिमिए ह? आम चाहें कांच होखे भा पाकल, हर अवस्था में अपना ओरि लोगन के लुभा लेला. अगर अइसन ना रहित त राहि चलत-चलत अमराई में टिकोढ़ा लटकल देखि अचानके ओह पर ढेला भा झटहां ना फेंका जाइ. सायदे कवनो गांव होई, जहवां बगइचन के बाढ़ि के दिनन में भी पुलुई पर एगो पाकल आम देखि के चढ़े वाला वीर बालक ना होइहें.

एह लाइन के लिखे वाला त करीब पैंतीस साल पहिले पुलुई पर दग-दग पीयर आम देखि के फेंड़ पर चढ़ि गइल रहे, आम के आहिस्ते से तूरियो लिहलसि, आ जइसहीं उतरे के तेयारी कइलसि कि आन्हीं आ गइल. ऊ दिन जब-जब यादि आवेला त गोड़ से लेकर कपार तक सिहरि जाला. एगो आम के लालच अइसन रहे कि करीब साठ फीट ऊंच फेंड़ के पुलुई पर चढ़ि गइल आ जइसहीं उतरे के भइल की आन्हीं में फेंड़ के पत्ता-पत्ता अइसे लचके लागल, जइसे लवंग के डाढ़ि. अब आदमी त बानर त ह ना कि कूदि-फानि के निकलि ली. खैर.. आम के एगो नाम रसालो ह-रसाल माने रस से भरल. ई बात आउर बा कि अब जमाना कलमी आम के बा, पारंपरिक बीजू आम कमे रहि गइल बाड़े स, बाकिर आम संगे रस अइसन जुड़ल बा कि ओह के रस से जूस बनावे वाला कंपनी के विज्ञापन में आम के गूदा के जिकिर ना होला, रसे के महिमा बेचाला.

ई रसे ह कि आम निमना-निमना लोगन के मुंह में पानी भरि देला आ केहू के पुलुई पर चढ़े खातिर का उकसा देला त केहू के झटहा मारे खातिर, आ जे ई दूनों ना कई पावेला, ऊ कीनि के खाला. आम करीब चार महीना में तेयार होला. बसंत पंचमी के बेरि जब खेत सरसों, मटर आ रहरि के फूल से छा जाले स, ओह घरी आमो गदरा जाला. माहौल के मदमस्ती में मोजरि के गंध के कम योगदान ना होला, तबे नु कहल गइल बा-
आमवा मोजराई गइले
महुआ फुलाइल मन अगराई गइले ना.
देह नेहिया के रस में
रसाई गइले ना.

आम तैयार होला निछछ गरमी में, रोहिणी नक्षत्र में बरखा भइल ना कि आम पाकल शुरू हो जाला, इहे ऊ दिन होला, जब कउआ, कोइलरि आ तमाम चिरई-चुरूंग आम पर टूटि पड़ेले. ओह घरी आम के रखवारी के मेहनति बढ़ि जाला.
आम रसाल भले हउए, बाकिर ऊ लोकरंग के मर्म के अभिव्यक्त करे के भी दर्दीला जरिया बा. बेटी के बियाह के बेरि गवाए वाला सहाना में बेटी के दरद के जरिया आमे बनल बा,

अमवा से मीठ महुइया ए बाबा
आरे बाबा महुआ में लागि गइले कोच
सजन लोगवा घेरि अइले ना...

बेटी के विदाई के बेरि जब ई गीति गवाला त निमन-निमन कठकरेज के आंखि पानी-पानी हो जाले.. बेटिए से जुड़ल आम के लेके एगो अउरू लोकगीत बा, एह में बतावल बा कि बेटी के बाप आम के काताना फेंड़ लगवले बाड़े, बाकिर बेटी के बिदा भइला के बाद ओकर कवनो मोल नइखे रहि गइल-

एक सौ अमवां लगवनीं, सवा सौ जामुन हो.
आहो रामा
तबहूं न बगिया सोहावन,
एक रे कोइलरिया बिना ना.

एह गीत में कोइलरि बेटी के प्रतीक बिया. ई संजोगे बा कि आम सवाद के दोसर नाम बा, ओकर फेंड़ निछछ गरमी से बचावे वाला छांह के जरिया बा, बाकिर ओकर सौंदर्य के कवनो मतलब बेटी बिना नइखे. बेटी आम के बगइचा के चिरई होले. सायेद इहे वजहि बा कि भोजपुरी के ज्यादातर ओहि लोकगीतन में आम के चर्चा बा, जवना धिया पर केंद्रित बा.जइसे एह के देखीं.

धिया बिनु सून ऊँगनवा ए बेटी
काहे बिनु सून ऊँगनवा ए बाबा, काहे बिनु सून लखरांव
काहे बिनु सून दुअरवा ए बाबा, काहे बिनु पोखरा लहार.
धिया बिनु सून ऊँगनवा ए बेटी, हंस बिनु पोखरा हमार.
कइसे के सोहे ऊँगनवा ए बाबा, कइसे सोहे लखरांव
कइसे के सोहे दुअरवा ए बाबा, कइसे सोहे पोखरा तहार.
धरम से ऐ बेटी, बेटी उपजिहें, सेवा से आम तइयार
तपता से ए बेटी, पुतवा भेंटइहें, दान से हंसा मंझधार.
का देइ बेटी समोधव ए बाबा, का देइ अमवा के गाँछ
का देइ पुतवा समोधब ए बाबा, का देइ समोधब लखरांव

इहां ई बतावल जरूरी बा का आम के छोट-मोट बगइचा के अमराई कहल जाला आ बड़का बगइचा के लखरांव.. ई ठीक बा कि पाकल आम के सवाद सबके लुभावेला..बाकिर एकर कांच रूप के कम आकर्षण नइखे. जब मोजरि में फल लागेला त ऊ बहुते महीन होला. ओकरा के भोजपुरी में सरसई कहल जाला. सरसई माने सरसो आताना बारीक. धीरे-धीरे बढ़ि के ई टिकोढ़ा बनि जाला आ ओह टिकोढ़ा के पुदीना पत्ता, अदरख, लहसुन डालि के सिलवटि पर जवन चटनी पिसाला, ओकर सवाद त पूछहिं के नइखे. दाल-भात होखे भा रोटी-तरकारी भा दुपहरिया खानी सतुआ के खवान, चटनी सबके रस बढ़ा देले.

एह टिकोढ़ा के छिलि-काटि के मोटे-मोटे कूंचि के ओह में हरदी, तेल, पिसल सरसों, लाल मरीचा आ नून डालि के घामा पकावल जाला. ओह के कूंचा कहल जाला, कूंचला से बनल कूंचा, जवना के अचार के बाल रूप कहल जा सकेला.
कांच आम के अचार से के नइखे परिचित, बाकिर एकर खटमीठिया भी बनेला, खट-मिठ ई चटनी भोजपुरी काज-परोज-भोज के महत्वपूर्ण आइटम ह. आम के छीलि –काटि के पंचफोरन से छंवकि के ओह में गुर आ नून डालि के पकावल जाला. तेजपता आ पंचफोरन से तड़का के बीच बनल चाशनी में पाकल आम के फांकी के खटमीठ चटनी, ओह.

कांच आम के फांकि काटि के सुखा के साल भर खातिर रखल जाला, एही के जब पीसि दियाला त ऊ अमचूर कहाला. अमचूर के तरकारी-चटनी में तब इस्तेमाल कइल जाला, जब आम के सीजन ना होला. अब त आम खाए के तरीका हो गइल बा फांकि में काटि के खाइल. बाकिर पहिले ओह के खाए के अलगे स्वैग रहे. अबहियों आम के गढ़ बनारस, मिथिलांचल, मलीहाबाद में आम बाल्टी में भेंवाला आ खाली ओकरे भोज होला. जे जाताना खा लेऊ, आम के असल खवइया उहे होला, जे चोंप गारि लेला आ ओकर साइड इफेक्ट ओकरा ना होखे. बाल्टी में आम भेंवला के वजहि ह, ओकर गरमी निकालि दिहल. कहलो जाला कि आम भलहिं पाकि गइल होखे, लेकिन ऊ फायदा तबे करेला, जब पहिलका बरसाति के बाद खाइल जाला. पहिलका बारिस के बाद पाकल आम के सवादे अलग होला.

भोजपुरिया समाज में आदरा नक्षत्र में पुड़ी, खीर आ आम खाए के अलगे परंपरा बा. गांव से बड़की माई, मइया, चाची के फोन जब आदरा नक्षत्र में सहर में रहे वाली दुलहिन किहां आवेला त ओह में हाल-चाल पूछला आ दुख-दरिदर बांटला के बाद ताकीद होला, “दुलहिन, फलानां दिने आदरा बीति जाइ, पुड़ी-खीर बना के आम संगे लइकन के ओह के पहिले खिया दिह.” पाकल आम के रस निकालि के पहिले घर-घर अमावट बनत रहल हा. ओह रस के साफ कपड़ा पर फइला के घामा सुखावल जात रहल हा. जब आम के सीजन बीति जाइ त अमावट निकलात रहल हा आ ओकरा के पानी में भेंई के रोटी संगे खाइल जात रहल हा. अमावट त अबो बनता, बाकिर अब ऊ घरऊं कम, फैक्टरी में ढेरे बनता. आ ओकरा के बाजार अमावट ना, आमरस कहता.

पाकल आम के खइला के बाद ओकर अंठीली घूरा पर फेंकाति रहल हा. सावन के मेह बरसला के बाद ओह अंठीली में से आताना मोलायम बैंगनिया रंग के आंकुर फूटेला. ऊ जब धीरे-धीरे जब पौधा बनेला त ओकर चिकनाई आ मुलायमियत जइसे मन मोह लेला. ओकरा के भोजपुरी में मोला कहल जाला. एहि से भोजपुरी में मोला के एगो अर्थ सुकुमारो हो गइल बा.. आम भारतीय समाज आ संस्कृति के अइसन अंग बा कि चाहे मुअला के बाद के श्राद्ध कर्म होखे भा पूजा-पाठ, बिना आम के पल्लो के होइए ना सकेला, पल्लो माने आम के पतई. पूजा-पाठ में आमे के सूखल लकड़ी से तैयार आगी में हवन होला. माने आम सबसे पवितर पौधा, फेंड़ आ फल ह. (उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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