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Bhojpuri Spl: गलती पर पिटाई, ओरहन पर धोवाई, कुछ अइसन होत रहे पहिले स्कूल क पढ़ाई!

पढ़ाई करे वाला लईका खाली पढ़ें, इ हो ना सकेला. खूब सख्ती रहे, ओकरी बादो लईका बीच में कुछ कुछ कई दें. जईसे पढ़ाई क बिच्चा में कहीं धीरे से आवाज़ आवे..... दुद्धि पर ईमली, दुद्धि पर ईमली, दुद्धि पर अवरा, सियाही पर अवरा. पांच पईसा क पांच गो करवना. आज लिखत समय अईसन लगत ह कि इ सुनले युग बीत गईल.

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स्कूल क पढ़ाई पहिले बहुत रोचक रहे. पढ़ले की संग्हे खूब हंसी ठिठोली होखे. कक्षा चलत समय त केहू हिले-डुले नाहीं. एसे कि दुखहरन (सरपत/नरई/बेहया/कईन) क डर रहे. बेसुल-साल क पिटाई होखे. गलती कईला पर स्कूल में मार पड़े आउर घरे ओरहन पहुंचे त ओहुजा धोवाई होखे. स्कूल मतलब की बिगरल लईकन के सुधरले क जगह. लेकिन लईका त लईका होलन न. उनकर सुधरल आउर बिगरल, कुल बराबर होला. एसे कि उ सीखले/कईले क उम्र होले. घरौंदा बनावे वाली उमर. कल्पना क के बहुत कुछ सही/गलत सीखले आउर कईले वाली उमर में मास्टर क मार परसाद मतीन रहे. एक दू दिन इयाद रहे फिर सब पुरनका ढर्रा पर चल दे.

पढ़ाई करे वाला लईका खाली पढ़ें, इ हो ना सकेला. खूब सख्ती रहे, ओकरी बादो लईका बीच में कुछ कुछ कई दें. जईसे पढ़ाई क बिच्चा में कहीं धीरे से आवाज़ आवे….. दुद्धि पर ईमली, दुद्धि पर ईमली, दुद्धि पर अवरा, सियाही पर अवरा. पांच पईसा क पांच गो करवना. आज लिखत समय अईसन लगत ह कि इ सुनले युग बीत गईल. कबो अयिसनो होखे की एकरा बिच्चे में मस्टर आ जाय आउर कान पकड़ के गरम क देवें. बेचे वाला दूसरी-तीसरी कक्षा में पढ़े वाला रहें. तब बाल पेन क प्रयोग स्कुल में ना होखे. छोट कक्षा में दुधिया आउर बड़ कक्षा में सियाही घोर के लिखल जाय. पांचवी कक्षा ले सुलेख जरुरी रहे. बढ़िया लिखले क प्रतियोगिता होखे. जिला आउर मंडल स्तर ले लईका भाग लेवें जायं. एही में केहू कला बनावे, केहू खेती-किसानी क पढ़ाई करे, केहू इंजीनियर बने, डाक्टर बने. विचार से लेके विज्ञान तक काम ओही स्कूल से निकलल लईका करें. उहे आगे चल के देश चलावें. सत्ता सम्हारें. कुछ सफल ना हो पावें त खेती-किसानी करें. जन संपत्ति बढ़ावें. सब कुछ न कुछ करे. चारगो लईकन में एगो नालायको निकल जाय त ओकरो जीवन चल जाय. लेकिन आत्महत्या ना करें. न आपन नुकसान करें आउर ना केहू दूसरे के नुकसान पहुंचावें. आज जब सोचब त बार बार इ जरुर धियान आई कि अईसन का भइल कि पढ़-लिख के मनई अपने गरदन दबा देत बा. इ समसिया दुनिया-जहान में एतना बढ़त बा कि कुल कोशिश बेकार जात बा.

इ बात बहुत पुरान ना हीय. लेकिन आज इकुल सपना जईसन लागत बा. एसे कि आज हर काम में पईसा घुस गईल बा. आप सब त जानीला की सबसे पुरान काम समान की बदले समान ह. जब लोग पईसा एतना ना रखले रहलन तब गदहिया गोल की पढ़ाई से इकुल शुरू हो जाय. लोग जीवन के एतना व्यवहारिक बना दें कि बहुत कुल समसिया अपने आपे हल हो जाय. उदारीकरण आउर बजार शुरू भईले से पहिले स्कुल कईसन रहलन स, इ समझे लायक ह. जईसे हमहन क कुछ साथी, जवन दुद्धि आउर सियाही आ फिर कागज खरीद ना पावें उ पेड़ से ईमली, करवना, अवरा, बईर ले आवें आउर ओकरा के स्कुल में बेंच दें. इ काम ज्यादातर तब होखे जब स्कुल में मस्टर ना आयल रहें. एसे कि मस्टर लोग लईकन के इकुल काम ना करे देवें. लेकिन लईको कम जोगाड़ वाला ना रहें. पढ़ाई क बखत छोड़ के इकुल काम करे क तरीका खोज लेवें. जईसे कि दुपहरिया में जब खाए जाए के मिले त मस्टर से दूर परती पर चाहे नहर पर सउदा हो जाय. बेचे वाला बहुत कमे रहें. एसे दिक्कत ना होखे. इ काम उनहन के जीवन क ककहरा सिखा दे.

तब लेमनचूस छोड़ के बाकी बहुत कम मिठाई मिलें जवन लईका खायं. स्कुल की बहरा सनपपड़ी ख़रीदे क लाईन लगे. उहो समान की बदले मिले. जईसे कि पलस्टिक क जूता, चप्पल, बोतल, मेहरारुन क बार, आलू, पीयाज, गेहूं, धान, सरसो की बदले सोनपपड़ी मिल जायल करे. इ व्यवस्था कबीर की ओह लाईन मतीन रहे–‘साधू इतना दीजिये, जामे कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय.’एगो बात जरुर रहे. घर आउर स्कूल की साथे लईका अपनी तरह से काम करें आउर सबकर मदद करें. लईका जवान करें उ कवनो व्यापार ना रहे. बल्कि उ एक तरह क रचनात्मक काम रहे. आभाव में केहू भी अपनी जरुरत खातिन जवन क सकेला, उनहनो क प्रयास कुछ अईसने रहे. कवनो लईका दुद्धि, सियाही, कागज या पईसा ना दे पावें तबो उनके ईमीली, अवरा, करवना, बईर खाए के मिल जाय. इ दया ना रहे. सहयोग आउर सोच रहे. घर-परिवार में इ सिखवाल जाय. लईकन में दिलदारी बहुत रहे. जरुरत रहे लेकिन लालच ना रहे.

समय की संग्हे बहुत कुछ बदल गयल. बदलाव जरुरी ह. लेकिन ओह बदलाव में स्कूली लईकन क सबसे ढेर नुकसान भायल ह. उनकर बचपना बस्ता की बोझ में दब के ख़तम हो गईल ह. आज दुधिया सियाही क जगह पेंसिल आउर बाल पेन ले लिहलस. स्कूल जाए वाला लईका पढ़ाई शुरू कईले की पाहिले दिन से सपना देखे शुरू क देत हवें. माई-बाबू लईका/लईकिन के पढ़ावे पर जोर ना देत हवें. बल्कि सपना देके घर से भेजत हवें. स्कूल वाला वोही सपना के खरीदार आउर बेचे वाला बनल बाड़ें सो. लईका पहिले दिन से जीवन में ‘आगे का करके बा’, इहे सोचे में एतना परशान हवें सो कि उनहन के इ ना पता चल पावेला की बचपन का ह, जवानी का बा आउर एके जियले में कईसन रस ह? बात इ ह कि सहजता हर जगह से बिला गईल बा. जहां जाईब उहां भरपूर बनावटीपन देखे के मिली. इ का ह? सब कहत ह की जीवन शैली बा. लेकिन इ कईसन जीवन शैली जवना में केहू कतहुं खुश नईखे. सब अपना में जियत बा लेकिन ओहू में खुश नईखे. पता न इ जीवन शैली के खोजले बा? कहां से आईल बा? कई लोग कहत बा कि इ जरुर चोरी क मामला ह. (लेखक रमाशंकर कुशवाहा जी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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