Bhojpuri Special: खाईं होरहा-उमि, पिहीं कचरस आ लीहीं सवाद

माघ में अइसन जाड़ परत रहल हा कि ओकरा बारे में जब भी चर्चा होई त कहाई, माघ में ठार चुअता. माघ के अइसन महीना होला, जब खेत में ठाढ़ गहूं, बूंट, मटर, लेतरी आदि फसल के दाना के दूध धीरे-धीरे काड़ा होखल शुरू हो जाला.

  • Share this:
माघ के जाड़ा काताना कठोर होत रहल हा, एकरा के एही से समझे के चाहीं कि पहिले लोग माघ के जाड़ के ठार कहत रहल हा. माघ में अइसन जाड़ परत रहल हा कि ओकरा बारे में जब भी चर्चा होई त कहाई, माघ में ठार चुअता. माघ के अइसन महीना होला, जब खेत में ठाढ़ गहूं, बूंट, मटर, लेतरी आदि फसल के दाना के दूध धीरे-धीरे काड़ा होखल शुरू हो जाला. खाली गहूंए अइसन फसल ह, जवना के बालि से दाना निकालि के कांचे ना खाइल जाला. बाकिर बूंट के कचरी होखे भा मटर, लेतरी के छेमी, ओकरा गोटाइल दाना के कांचहूं खाइल जाला. पुरनिया लोग बतावत रहले हा कि सइ-दु सइ साल पहिले जब भोजपुरी इलाका में गरीबी रहे त कतना परिवार के दिन कचरस संगे आगि में भूंजल छेमिए आ कचरिए पर कटि जात रहे.

आगि में कचरी आ छेमी के भूंजला के बाद जवन आइटम तेयार होला, ओकरा के भोजपुरी समाज होरहा कहे ला. आंच में भूनल कचरि आ छेमि के तातले निकालि के खइला पर कइसन सवाद मिलेला, उहे जानेला, जेकरा ई मोका मिलल बा. सिलवटि पर नून-मरीचा आ हरियर लहसुन के पीसि के ओकरा संगे ई होरहा के खाके कचरस पियला के बाद जवन आऩंद भोजपुरिया समाज उठावेला, ओकर तोख कमे मिली.

होरहा के भोजपुरिया सवाद में का अहमियत होला, एकरा के एही से समझे के चाहीं के एकरा के लेके लोकगीत भी बनल बा त कहाउत भी. ई होरहा के महत्वे ह कि जब भोजपुरिया नायक आपाना नायिका के सौंदर्य पर मरि मिटेला त ओकरा मुंह से अनायासे निकली जाला,

गोरिया तू त जान मारेलू
तू त होरहा के चाना लागेलू..

सहर के नायिका आपाना ब्वॉय फ्रेंड संगे जब महंगा होटल, रेस्तरां या माल में जाली त उनुका सामने पिज्जा आ कोल्ड ड्रिंक के डिमांड करेली. सहरी नायक जब डेट पर जाला त ओकरा रेस्टोरेंट आ माल लउकेला. लेकिन भोजपुरिया मनई के प्यार आंखही आंख परवान चढ़ेला, कबो मोका लागल त मुड़ल-तुड़ल कवनो चिट्ठी चोरी-चुपे दिया गइल. अइसना में भोजपुरिया नायिका अगर आपना प्रेमी से अगर ई मांग ना करिहें त का करिहें,

राजा, होरहा खिया दिहित चनवा के



भोजपुरी इलाका में ई धोबी गीत बहुते मसहूर बा. धोबी समाज के लोग पूरा लय में ई गीत सुनावेला. कम लोग जानत होई कि पेट पूजा के ठेठ लोकरंगी चिखना होरहा से ही होली शब्द निकलल बा. होरहा के संस्कृत में होला कहल जाला. होला शब्द संस्कृत के होलक के एगो रूप ह, जवना के माने होला मटर, बूट यानी चाना के छेमी-कचरी के भूंजल रूप. संस्कृत में बूंट के हरियर दाना जवना के भोजपुरी में कचरीयो कहल जाला, ओकरा खातिर भी होला शब्द के प्रयोग भइल बा. एही होरहा यानी होला से बनल बा शब्द होली. यानी होला मनावे वाला तेवहार. जरत होलिका में बूंट, गहूं आदि के छेमी-फरी के भूने के चलन पूरा देस में एक जइसन बा. होली के तेवहार के पीछे चाहे जवन पौराणिक कथा-कहानी होखे, बाकिर ई साफ बा कि होली खेती-किसानी के तेवहार ह. एह में फसल के पहिलका दाना के आगि देवता के चढ़ावे आ भूंजल दाना के भगवान के प्रसाद मानि के खाए के तेवहार ह. ओकरा बुनियादे पर टिकल बा होरहा के चलन आ सवाद.

जइसे-जइसे उदारीकरण आइल, गांव के पारंपरिक बाजार में आधुनिकता आ विकास के नाम पर पिज्जा, मैगी आ पास्ता भी चहुंपि गइल. बाकिर हजारों हजार साल से मानव के जीन में शामिल ठेठ गंवई सवाद से भोजपुरिया समाज पीछा ना छोड़ा पइले बा. इहे वजह बा कि माघ में जइसहीं खेतन में ठाढ़ फसल के दाना गोटाइल सुरू हो जाला, सीवान होखे चाहे बगइचा, चाहे टिबुल यानी ट्यूबवेल, उहां पतझड़ के पतई के जुटा के ओह में माचिस के तीली जरा दियाले. ओह के आंच में भुंजाए लागेला मटर के छेमी, बूंट के कचरी आ ओकर सोन्ह गन्ह सरेह में गंउजि जाले. एह गन्ह में अइसन आकर्षण होला कि लोग ओने खिंचात चलि जाला आ ओकर सवाद लेबे लागेला. कुछु लोग त पूरा तेयारी से सरेहि में पहुंचेला. उनुका संगे माचिस त होखबे करेले, घर के सिलवटि पर पीसल हरियर मरीचा आ लहसुन में मिलावल नून के पुड़िया भी होला. एह के संगे होरहा के सवाद अजबे होला.

होरहा के चरचा होखे आ उमि के बात ना होखे त गहूं रानी से बेइमानिये होई.

गहूं के गोटात बालि के होरहे नियर आगि में भूंजल जाला. बाद में ओकरा के मिसि के भूंजल दाना के अलगा कइल जाला. ओकरा के साफ कई के केहू नून संगे खाला त केहू घीव आ गुर मिला के खाला.

होरहा भले कतनो सवदगर होत होखे, बाकिर ओकरा खातिर सावधान रहे के परेला, ना त उहां से निकलल कवनो लुत्ती नुकसानो पहुंचा सकेले.

भोजपुरी समाज में होरहा के लेके एगो कहाउतो बा,

हम आपाना छान्हि पर होरहा फूंकीं, ताहार का?

यानी हम आपाना छान्हि पर आगि लगावतानी त ताहार का जाता.

होरहा के लेके एगो आउर कहाउत बा,

पूत के पांव पलने में चिन्हा जाला कि ई कवना खेत के होरहा होइहें.

करीब दू दसक पहिले के बात ह, ओह घरि गांवां-गाईं उखि बोआत रहे त होरहा खइला के बाद उखि के कचरसो पियला के चालान रहे. अब एह में कमी आ गइल बा.

उमि होखे भा कि होरहा, ओकरा सवाद में एगो चीजु समान बा..दूनों में मिठास होला, जवना के आधार होला सोन्हापन.

त आईँ गांवें चली जां, आ उमि आउर होरहा के सवाद लिहल जाउ... (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज