Bhojpuri Spl: कांग्रेस के अउरो कमजोर करत ह ओके ‘मजबूत’ करे क परयास

दिन पर दिन कमजोर होत जात कांग्रेस संगठन के मजबूत कइल जरूरी ह लेकिन चुनाव के समय कांग्रेस नेतवन क खुला मंच से आपन कमजोरी उजागर कइल पार्टी के अउरो कमजोर करी. उहो तब जब पार्टी हाईकमान की ओर से जून में संगठन चुनाव करा के नया मुखिया चुने क घोषणा हो चुकल ह.

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पांच गो राज्य में चुनाव क तारीख घोषित हो चुकल ह, लेकिन कांग्रेस आपन भीतरी संकट से गुजर रहल ह. चुनाव परचार में जुटले की जगह पार्टी में नीचे लेकर ऊपर तक संगठन के मजबूत करे क मांग करे वाले जी 23 क सात आठ गो नेतन क बयानबाजी कांग्रेस के अउरो कमजोर कर रहल ह. इ बात त सही ह कि दिन पर दिन कमजोर होत जात कांग्रेस संगठन के मजबूत कइल जरूरी ह लेकिन चुनाव के समय कांग्रेस नेतवन क खुला मंच से आपन कमजोरी उजागर कइल पार्टी के अउरो कमजोर करी. उहो तब जब पार्टी हाईकमान की ओर से जून में संगठन चुनाव करा के नया मुखिया चुने क घोषणा हो चुकल ह. अइसन में पांच राज्य क चुनाव में कांग्रेस क प्रदर्शन कइसन होई एकर अंदाजा लगावल जा सकेला.

पांच राज्यन में से तीन गो केरल, असम अउर पुड्डूचेरी में कांग्रेस सीधा लड़ाई में ह. बाकी बंगाल में वामपंथी दल अउर तमिलनाडु में डीएमके साथे मिल कर चुनाव चुनाव लड़त ह कांग्रेस. केरल, असम अउर पुड्डूचेरी में भी ओकर गंठबंधन ह लेकिन इहवां कांग्रेस क अगुवाई में ही गंठबंधन चुनावी लड़ाई लड़त ह. एकर माने इ ह कि इ तीन राज्यन में कांग्रेस क मजबूती अधिका जरूरी ह. अइसन में अगर पार्टी के भीतरे सिर फुटोव्वल होई त चुनाव परिणाम पर एकर बहुते बुरा असर पड़ी. चुनाव के समय पार्टी के मजबूत करे क सबसे अच्छा तरीका इहे ह कि मिल जुल के जोर लगा के परचार कइल जाए जेसे कि पार्टी अधिका से अधिक सीट सको. अउर जब चुनाव परिणाम अच्छा होई त पार्टी के नया संजीवनी अपने आप मिल जाई.

एसे उलटे जी 23 क नेता पार्टी क चुनावी तालमेल पर ही सवाल उठावत ह उहो बचकाना. बंगाल में वामपंथी दलन के साथे तालमेल में जब फुरफुरा शरीफ क मुखिया अब्बास सिद्दकी क नया पार्टी इंडियन सेकूलर फ्रंट के भी जोड़े क बात चल रहल रहे तब कांग्रेस क इ नाराज नेता लोग कौअनों तरह क सवाल नाही उठवले लेकिन जब साझा रैली में सब पार्टी क लोग जुटल त एगो धार्मिक दल के साथे कांग्रेस के तालमेल करे पर सवाल उठा देहल गइल कि कांग्रेस क सेकूलर छवि से समझौता कइल जात ह. उहो सवाल बंगाल कांग्रेस क अध्यक्ष से इ सवाल कइल गइल. जबकि सब जाने ला कि कौअनो भी दल में हाईकमान क सहमति के बिना ए तरह क फैसला नाही लेहल जा सके ला. एकर माने इ निशाना सीधा हाईकमान क फैसला पर ताने गइल ह. इहा सवाल इहो उठत ह कि जब असम में बंगाली मुसलमानन क संगठन एआईडीयूएफ क साथे गंठबंधन क घोषणा भइल तब का कांग्रेस क सेकूलर छवि से समझौता नाही कइल गइल. अउर तब इ नेता लोग काहे चुप रहे. एही तरह केरल में मुस्लिम लीग त उहवां कांग्रेस क अगुवाई यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट में कई साल से ह अउर कई बार सरकारों में रहे तब ए तरह क सवाल उठावे वाला नेता लोग कहां रहे.



अब त पानी माथा से ऊपर चढ़ल जात ह.. जे तरह से नाराज नेता लोग चुनाव के समय हाईकमान पर सवाल उठा रहल हउअन, देर सबेर इनकर आचरण पर सवाल उठावल जाई बलुक उठऊं लगल ह. जम्मू गुलाम नबी आजाद के विरोध में प्रदर्शन भी भईल. एकरा अलावे जौन जी 23 क नाराज होवे क बात हो रहल ह, जम्मू में होइल इनकर सम्मेलन में 23 में से खाली साते गो नेता केसरिया साफा बान्ह के मंच पे विराजमान रहे. बाकी नेतवन क एक के बाद एक बयान आवे लगल कि पार्टी संगठन के मजबूत करे क जौअन मुद्दा 23 लोगों क हस्ताक्षर वाला अगस्त माहिना में लिखल चिट्ठी में उठावल गइल रहे ओसे उ लोग आजो सहमत हउअन लेकिन एसे आगे जाके पार्टी के नुकसान पहुंचावे क उनकर तनिको मनसा नाही ह. माने कि हाईकमान के पत्र लिखे वाला अधिका लोग पार्टी क भला त चाहत ह लेकिन ओके अउर कमजोर करे क कीमत पर नाही.
इ तरह क नेतन में से एक कर्नाटक क मुख्यमंत्री रह चुकले वीरप्पा मोइली क कहनाम ह कि उ चिट्ठी के तुरते बाद हाईकमान की ओर कांग्रेस वर्किंग कमिटी क मीटिंग बोलवा के एपर चर्चा कइल गइल अउर उहे समय जून में संगठन क चुनाव करावे आ नया अध्यक्ष चुने क घोषणा हो गइल ... एकरा बाद सार्वजनिक मंच से दल क कमजोरी बतावले क कौअनो जरूरत नाही रहे. इ सब हरकत से पहिले से कमजोर हो चुकल पार्टी अउर कमजोर होई उहो चुनाव के समय. वइसे पार्टी क बड़ बड़ नेता लोग जे तरह से बोलबाजी कर रहल हउअन ओसे लगत ह कि इ समस्या जल्दी खतम ना होई. इ जइसे जइसे बढ़ी कांग्रेस के अधिका से अधिका नुकसान पहुंचाई.

एसे पहिला भी कांग्रेस अइसन संकट से कई बार गुजरल ह. कई बड़ बड़ नेता पार्टी से अलगा भइले फिर दोबारा जुड़ गइलें. इंदिरा क जमाना में त कई लोग अलगा भइलें, आपन पार्टी बनवले फिर देर सबेरा कांग्रेस से जुड़ गइलें. एही तरह राजीव गांधी अउर नरसिम्हा राव क जमाना में अलगा भइल नेता लोग फेरो कांग्रेस में लौट अइलें. लेकिन जबसे सोनिया गांधी के हाथ में कांग्रेस आइल तबसे अलगा होइल शरद पवार, ममता बनर्जी, मुफ्ती मोहम्मद सईद अउर जगन रेड्डी जइसन नेता दोबारा पार्टी में नाही लौटले. सब आपन आपन परदेस में क्षेत्रीय पार्टी बनाके मन माफिक राजनीति कर रहल हउअन. केहू कांग्रेस के साथे मिल कर सरकार बना लेह लस ते केहू अपना दम पर. जहवां जहवां कांग्रेस से टूट के क्षेत्रीय पार्टी बनल उहवां कांग्रेस कमजोर हो गइल. कब्बो बिना देस के आजाद करावे वाला कांग्रेस क मजबूत संगठन के ही समाज के हर वर्ग पर पकड़ रहे, अब ओके दोबारा खड़ा करे खातिर एगो मजबूत संगठन क जरूरत ह. अउर सड़क पर संघर्ष कइले इ संभव नाही देखाई देत ह. (लेखक सुशील कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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