Bhojpuri: चूहा गली से हाथी गली तक, पढ़ीं अजब गजब बनारस के बारे में

जोगी से भोगी तक, रागी से विरागी तक, शैव से वैष्णव तक, प्रेमी से ज्ञानी तक, मूर्ख से विद्वान तक, इहां के रस शास्त्र में सबके बदे कुछ न कुछ मौजूद हौ. अब अइसन शहर के गजबय न कहि जाई, जवन ऑल इन वन होय. बनारस अपने आप में एक पूरा संसार हौ.

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  • Last Updated: March 10, 2021, 3:40 PM IST
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बनारस धरती क एकमात्र अइसन शहर हौ, जहां हर तरह क रस मौजूद हौ. जेतनय डूबा ओतनय रस. ’जिन डूबा तिन पाइयां’ वाली हालत. जोगी से भोगी तक, रागी से विरागी तक, शैव से वैष्णव तक, प्रेमी से ज्ञानी तक, मूर्ख से विद्वान तक, इहां के रस शास्त्र में सबके बदे कुछ न कुछ मौजूद हौ. अब अइसन शहर के गजबय न कहि जाई, जवन ऑल इन वन होय. बनारस अपने आप में एक पूरा संसार हौ. इहां गजब क लोग पैदा भइलन त केतना इहां आइके गजब क होइ गइलन. नाम गजब क त काम भी गजब क. गली गजब क त गान गजब क. गंगा गजब क त बनारसिन से पंगा भी गजबय क होला.

नाम से इहां काम क अंदाजा न लग पाई. एक बार क किस्सा सुना. शहर के बहरी अलंग में कवि सम्मेलन होत रहल. मंच संचालक के तरफ से तेज अवाज में घोषणा भइल -सावधान! सांड़ बनारसी पधारत हयन. घोषणा सुनतय मंच के सामने बइठल तमाम लोग उठि के भगलन. सांड़ बनारसी बेचारे दौड़ि के माइक पकड़लन. आपन असली नाम बतउलन -सुदामा तिवारी. लेकिन तबतक सांड़ काम कइ चुकल रहल. असलियत जनले के बाद भी कई लोगन क मिजाज अइसन उखड़ल कि कवि सम्मेलन छोड़ि के चलि गइलन. कवि अउर कवि क कविता आकर्षण क केंद्र होला -दिनकर, निराला, बच्चन, पंत, हरिऔध, नीरज आदि. लेकिन बनारस में साड़ बनारसी, चकाचक बनारसी, बेढब बनारसी, दमदार बनारसी, डंडा बनारसी, ठेठ बनारसी, चपाचप बनारसी क का मतलब हौ, इ बनारस क लोग अउर बनरस क मिजाज समझय वाले ही समझि सकयलन. अगर साड़, चकाचक, बेढब, दमदार, डंडा, ठेठ, चपाचप भी कवि होइ सकयलन त उ जगह बनारस ही हौ.

सांड़ भोले बाबा क सवारी हयन. बाबा के नगरी में सांड़ सड़क से लेइके गली तक में छुट्टा टहरत, मस्ती करत मिलि जइहय. लेकिन हाथी क रहाइस बनारस के गली में मुश्किल हौ. फिर भी पक्का महाल में एक गली हाथी गली हौ. एकरे ठीक उलट एक चूहा गली भी हौ. अब नाम से केव भी गच्चा खाइ सकयला कि हाथी गली में हाथी रहत होइहय, या फिर गली हाथी की नाईं विशाल होई, जइसे सांड़ बनारसी क नाम सुनिके कवि सम्मेलन में जनता सुदामा तिवारी के सांड़ समझि लेहले रहल. लेकिन बनारस क हाथी गली एतनी सकरी हौ कि ओम्मे हाथी का, हाथी क बच्चा तक नाहीं घुसि सकत. मात्र दुई-ढाई फुट चौड़ी. फिर भी नाम हाथी गली हौ. कुछ लोगन क कहना हौ कि एक बार गली में हाथी सकसि गयल रहल. कुछ लोग कहयलन कि गली में एक औरत हाथी की नाईं बच्चा क जनम देहले रहल. लेकिन हाथी गली के नामकरण के पीछे एक प्रमाण उहां मौजूद हौ. गली के नुक्कड़ पर एक बहुत पुराना मकान हौ, तीन सौ साल पुराना बतावल जाला. मकान के अंगना में चारों ओर जवन खंभा बनल हयन, ओप्पे हाथी क मूर्ति बनल हयन. मकान में एक गुजराती शाह परिवार रहयला. अरुण शाह क कहना हौ कि एही मकान के नाते पूरी गली क नाम हाथी गली पड़ल हौ. इ मकान गली क सबसे पुराना मकान हौ.

चूहा गली क भी हाथी गली की नाईं किस्सा हौ. इहां भी न त चूहन क घर हौ, अउर न गली ही चूहा के बिल की नाईं हौ. हां, चौड़ाई दुइ फुट से जादा नाहीं हौ. फिर भी गली क नाम चूहा पर. पुरनिया लोग बतावयलन कि लगभग तीन सौ साल पहिले एक मराठी साधु इहां आइके रहत रहलन. साधु भगवान गणेश क पूजा करंय अउर उ इहां भगवान गणेश क एक ठे मंदिर बनवउलन. मंदिर के बहरे पथरे क एक ठे बड़ा क चूहा बनवउलन. एही चूहा के नाते गली क नाम चूहा गली पड़ि गयल. पथरे क चूहा करीब डेढ़ सौ साल पहिले टूटि गयल. लेकिन चूहा क स्मृति बरकरार रखय बदे मंदिर के बहरे दीवारी पर चूहा क बड़ा क चित्र बनावल गयल हौ.
पक्का महाल में ही एक दस पुत्तर की गली हौ. अब दस पुत्तर अउर गली क का रिश्ता? कुछ लोगन क कहना हौ कि 300 साल पहिले गली में दसपुत्रे नाम क एक ठे मराठी विद्वान रहत रहलन. लेकिन जादातर लोग बतावयलन कि गली में एक ठे औरत 10 लड़िकन के जनम देहलस. दसों के मरल समझि के परिवार गंगा में बहावय जात रहल. रस्ते में एक दाई देखलस त उ लड़िकन के जिंदा बतउलस अउर परिवार बच्चन के वापस घरे लेइके आयल. बाद में दसों लड़िका बड़ा भइलन, हट्ठा-कट्ठा जवान भइलन. गली क नाम दस पुत्तर की गली पड़ि गयल. अइसन केतना गली हइन, जवने क अजब गजब नाम अउर अजब गजब कहानी हौ. मसलन डेढ़ मन की गली, पतरसुट्टी गली, लट्टू गली आदि आदि.

नाम के साथ काम भी कम अजब गजब नाहीं हौ बनारस में. अनगिनत किस्सा-कहानी हयन. अजब गजब काम कभौ कभौ बड़ा काम भी कइ जाला. किस्सा पुराना हौ, अंगरेजन के जमाने क 17 अगस्त, 1781 क. पहिला अंगरेज गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग काशी नरेश चेतसिंह से 50 लाख रुपिया जुर्माना वसूलय चाहत रहल. हेस्टिंग कलकत्ता से आपन सेना लेइके बनारस पहुंचि गयल. कबीर चौरा महल्ला में माधोदास नाम के एक मकान में उ ठहरल. पूरे शहर में राजा साहेब के गिरफ्तारी क खबर फइलि गइल. एही बीच एक बनारसी तुकबंदी बनाइ देहलस. तुकबंदी पूरे बनारस के लोगन के जबान पर चढ़ि के बोलय लगल.

घोड़े पे हौदा, हाथी पे जीन.



डर कर भाग वारेन हेस्टिंग..

इ तुकबंदी अंगरेजन के रहस्यमय लगल. उ एकर अर्थ नाहीं समझि पउलन. अंगरेज सोचलन कि भागय में ही कल्याण हौ अउर रातों रात साढे़ चार सौ सैनिकन के साथ अपने दलाल बेनी राम के मदद से वारेन हेस्टिंग शहर से भागि गयल अउर चुनार के किला में जाइके शरण लेहलस. एह दौरान कई अंगरेज सिपाही मारल भी गइलन अउर ओन्हय चेतगंज अउर भदैनी में दफनाइ देहल गयल. अब बनारसी गुरू लोग मोछी पर ताव देवय लगलन. सब अपुना-अपुना के हांकय शुरू कइलन -देखला कंपनी बहादुर क का हाल कइली? चुटकी में भगा देहली सारे के. बनारस के ओरी फिर मुड़ि के ना देखिहय ससुर. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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