Bhojpuri: अब न कहार न ओहार असवरिया, बदल गयल पहिलका जमाना

पहिले वाला जमाना अब नाहीं रहि गयल. इ संवाद लोगन के मुंहे से अक्सर सुनय के मिलि जाला. अब बदलाव क इ जमाना या त बरदास्त करा, बरदास्त न होय त पच्छू मुंह कइ के हुआ-हुआ करा. केव सुनय-समझय वाला नाहीं हौ.

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जमाना बड़ी तेजी से बदलत हौ, जमाना बदलि गयल, पहिले वाला जमाना अब नाहीं रहि गयल. इ संवाद लोगन के मुंहे से अक्सर सुनय के मिलि जाला. वाकई जमाना एतना तेजी से बदलत हौ कि आंख चोन्हियाय जाय. कभौ-कभौ त आंखी पर भरोसा नाहीं होत कि जवन देखात हौ उ सही हौ कि जवन देखात रहल उ सही हौ, या सही अबहीं देखाए वाला हौ. मामला आगे बढ़त हौ कि पीछे जात हौ. विकास होत हौ कि कुल विनाश के मुंहे में जात हौ. परेशानी उ लोगन के जादा हौ, जे दुरभिसंधि में फंसल हौ.

जेकरे आंखी के सामने लालटेन अउर डेबरी के जगह फट से बिजली क बलब अउर ट्यूबलाइट रोशनी फेंकय लगल, हर-बरधा के जगह ट्रैक्टर चलय लगल, पुरवट-रहट अउर ढेकुली के जगह पंपिंगसेट अउर ट्यूबवेल पानी उगिलय लगल, बैलगाड़ी-घोड़ागाड़ी के बदले ट्रक-टेम्पो दउड़य लगल अउर कहार-ओहार-असवारी के जगह मोटर कार पो पो करय लगल. केतना गिनाई? बदलाव क लिस्ट हनुमान जी के पूंछ जेतनी लंबी हौ.

अब बदलाव क इ जमाना या त बरदास्त करा, बरदास्त न होय त पच्छू मुंह कइ के हुआ-हुआ करा. केव सुनय-समझय वाला नाहीं हौ. तीर-तलवार अउर भाला-गड़ासा क जमाना गयल, अब गोली-गोला, बम-बंदूक, परमाणु बम हौ. फिर भी लाठी भांजय वालन क कमी नाहीं हौ. अब लाठी बड़ी कि भइस, एकर जवाब अबही तक नाहीं मिलल हौ. अंगरेजी सिस्टम में कुल अंगरेजी होइ गयल हौ, लाठी भी भइस भी. रहन-सहन, खान-पान, पहिनावा-ओढ़ावा, दवाई-दारू सबकुछ. उ जमान गयल जब बईद जी क खरबिरइया गोली रामबाड़ होइ जाय. अंगरेजी सिस्टम में अब जड़ी-बूटी भी अंगरेजी होइ गयल हयन. पेड़-पौधा सबके बीमारी पकड़त हौ. जवने तुलसी के पत्ता क कढ़ा देखि के कइसौ बोखार देह छोडि के भागय, उ तुलसी अब खुदय बीमार भयल जात हौ. फिर भी संझा के भैरवी गावय वालन क कमी नाहीं हौ. आंन्ही के आगे बेना क बतास.

एक ठे राजसुमन मिसिर हयन, इलाहाबाद के पास जंघई क रहयवाला. मुंबई में कवनो कंपनी में नोकरी करत रहलन. अब रिटायर होइ गयल हयन, अस्सी के पार. लेकिन एक गोड़ अबही भी मुंबई में रहयला. जंघई अउर मुंबई के बीच गोड़ापाही में जवानी ही व्हाइटहाउस बनि गयल. लेकिन गांव क मट्टी जब मुंबई क नमी पइलस त भीतर से शब्द-भाव क अइसन अंखुवा फूटल कि मुंहे से कालिदास क छंद निकलय लगल. कुल छंद बटोरि के ’अगहन क धूप’ तइयार भयल. अगहन क धूप में जीवन क छंद हयन, लोकजीवन क. जंघई क राजसुमन मिश्र मुंबई में लोककवि बनि गइलन. अगहन क धूप से दुइ लाइन क गुनगुनाहट देखा-
अब न कहार न ओहार असवरिया,
बबुनी हमार गईंन चढ़ि के मोटरिया.

इहां राजसुमन मिश्र क बखान करय क मकसद उ दुरभिसंधि क दर्शन करावय क रहल, जवन इ दुइ लाइन में मौजूद हौ. इहय दुरभिसंधि आज केतना जने के खात हौ त केतना जने के खियावत हौ. केतना जने के मारत हौ त केतना जने के जियावत हौ. अगर जीवन एही के कहल जाला त इहय जीवन क आनंद हौ. अब आज के जमाने के पढ़वइयन से पूछय लगा त समझी न पइहय कि इ कवने भासा में हौ. कहार, ओहार, असरवारी अउर बबुनी से आज के जमाने के लोगन के का लेवय-लादय के बा? एक जमाना रहल, जब इ शब्दन के बिना केहूं क जीवन किनारे न लगि पावय. हमरे लड़िकइयां में ही बियाह-बरात क साधन असवारी-पालकी, बैलगाड़ी, ऊंट अउर हाथी रहलन. आदमी के अमीरी क अंदाजा बराती में पालकी-असवारी, ऊंट-घोड़ा-हाथी के संख्या से लगावल जाय. हलांकि फरक असवारी अउर पालकी में भी रहल. गरीबन क असवारी, अमीरन क पालकी. अमीर लोग आवय-जाए बदे खुद क पालकी रखय, बाकी बियाह-शादी में केराया पर लेहल जाय. पालकी क केराया असवारी से अधिक रहय. पालकी कहार ढोवय. एक पालकी पर आठ कहार. बारी-बारी से चार-चार कंधा लगावय. आज के जमाने में त अर्थी के कंधा लगावय वाला नाहीं रहि गयल बायन.

कहार शब्द कंधहार से बनल हौ, जवने क अर्थ होला कंधा देवय वाला. लेकिन कंधा देवयवालन क एक अलग जाति बनि गइल कहार. बनारस में कहार धीरे-धीरे पनिहार बनि गइलन. पनिहार यानी पानी भरयवाला. कहांर जब से पानी भरय लगलन तब से असवारी-पालकी ढोवय क जिम्मेदारी मुसहरन के कंधा पर आइ गयल रहल. मुसहर यानी वनवासी. जवने रस्ते से मुसहर पालकी लेइके चलय, दूरय से पता चलि जाय कि केहूं क बरात जात हौ. दरअसल, असवारी-पालकी ढोवय बदे मजबूत कंधा के साथ खास कौशल भी चाहयला. चलय क अलग अंदाज, अलग सांकेतिक भासा. सांकेतिक भासा क जिम्मेदारी आगे वाले मुसहरन क रहय. पीछे वाले ओही अधार पर आंख मूंदि के कदमताल करयं. सांकेतिक भासाराग के साथ कदमताल से अइसन ध्वनि गूंजय जइसे कुमार गंधर्व अउर गोदई महराज क जुगलबंदी. मुसहरन क दिशाज्ञान एतना सटीक रहय कि आधुनिक विज्ञान क जीपीएस फेल. मुसहर रस्ते से न जायं, बल्कि आपन रस्ता खुद बनावय. बिल्कुल सीधा. अब उ रस्ता चाहे जेतना भी कठिन अउर दुर्गम काहे न होय, पार पावय क उपाय ओनके पास मौजूद रहय. खेत-खरिहान, नाली-नाला पार करत तय समय पर अपने गंतव्य पहुंचि जायं. रस्ते में अगर नाली रहय त काफी पहिलय से आगे वाला मुसहर पीछे वालन के सतर्क कइ देय -हइ सुराही हौ. अगर रहरी क खुत्थी रहय त आगे वाले कहय -हइ कलमतास. एही तरह से पूरे रस्ते भर आगे वाले मुसहर अलग-अलग सांकेतिक भासा में रस्ता क चरित्र-चित्रण करत जायं अउर पीछे वाले ओही अनुसार सतर्क होइ के कदम बढ़इले जायं.

लड़िकइयां में एक दइयां इ जानय क जिज्ञासा भयल कि आखिर असवारी-पालकी ढोवय वाले हमेशा रस्ते भर बरबरात क काहे जालन. पूछले पर पता चलल कि बिना बरबरइले उ एक कदम नाहीं चलि सकतन. आज के पीढ़ी में असवारी ढोवय वाली भाषा शायदय केहूं के पता होय, असवारी के कंधा देब त दूर क बात. असवारी-पालकी अब इतिहास बनि गयल हयन. इतिहास वाली फिलिम में ही असवारी-पालकी देखय के मिलयला. पहिले हर गांव में असवारी-पालकी क कारोबार चलय. हमरे गांव में खेलावन साव असवारी-पालकी क बड़ा कारोबारी रहलन. लगभग 100 असवारी-पालकी क ओनके पास इंतजाम रहय. परिवार में एक शादी रहल त खेलावन साव के इहां से 25 असवारी अउर 25 पालकी बराती गइल रहल. जवने रस्ते से कुल असवारी-पालकी एकसाथ लाइन से निकलय, देखवइया किनारे खड़ा होइ के देखय लगय.

जवने पालकी में दुलहिन बिदा होय, ओहमें ओहार लगाइ जाय, ताकि दुलहिनी के केव देखि न पावय. काफी समय तक कार में भी ओहार लगावय क प्रथा रहल, पीछे वाली अउर आगे वाली सीट के बीच में, ताकि आगे वाली सीट पर बइठल आदमी अउर ड्राइबर क नजर दुलहिनी पर न पड़य. दुलहिन क मतलब ही ओहार अउर घूंघट रहल. आज न ओहार हौ न घूंघट. दुलहिन क परिभासा बदलि गयल हौ. जमाना बदलि गयल हौ. (सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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