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Bhojpuri Spl: भारतीय संस्कृति के जियतार थाती ह लोककथा, पढ़के इयाद आ जाई बचपन

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लोकसाहित्य शुद्ध रूप से मौखिक भा वाचिक परंपरा में आगा बढ़ल. ना त एकरा रचनिहार के अता-पता चलल, ना ई लिपिबद्धे भइल. बाकिर सभसे पहिले एकरा के केहू-ना-केहू त रचले होई जरूर आ लोकमित्रन के अपेक्षित-जरूरी संशोधन के बाद एकरा के लोक-मंजूरी मिलल होई.

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लरिकाईं में लोगन के मुंह से गांव में सुनले रहलीं-जे लउके से लोक. माने, खुलल आंखि से जवन किछु साफ-साफ लउकत होखे, उहे लोक ह. एह लोक में नगर-महानगर से लेके सुदूर ग्राम्यांचल में रचल-बसल जनसमुदाय त बड़ले बा, तमाम जीया-जन्तु, चिरई-चुरुंग, फेंड़-पउध, नदी-पोखरा, पहाड़, झरनो समाहित बा. दोसरा सबद में कहीं, त सउंसे कुदरते में लोक रमल बा. तबे नू चर होखे चाहे अचर, जरि होखे भा चेतन-लोक के सभ उपादान घुलि-मिलिके एक-दोसरा से बतकही करेलन स.

अपना आंतर के विचार साझा करेलन स आ किसिम-किसिम के भेसभूषा, पहिनावा-ओढ़ावा, रहन-सहन मिलिके जवन साझा संस्कृति के निरमान करेलन स,उहे कुदरती समरसता से लबरेज़ लोक आधारित संस्कृति लोकसंस्कृति का रूप में जानल-पहिचानल जाले. तमाम चुनौतियन आ उपेक्षा-अपेक्षा के बावजूद आजुओ चटक लोकरंग के छटा आ सोन्ह गंवई गमक के मिठास अभिभूत कइला बेगर नइखे रहत. लोक से कथा ले साहित्य के दूगो धारा साथे-साथे बहत रहेली स-लोक आ शिष्ट. लोकसाहित्य लोक भा जन, माने धरती से रचल-बसल मेहनतकश, किसान आउर मजूरन के केन्द्र में राखिके रचात आइल आ दोसरा किसिम के साहित्य प्रबुद्ध वर्ग खातिर. बाकिर लोक से उपजल लोगे जब अपना जरि के भुलाए लागल आ खुद के ‘शिष्ट-विशिष्ट’ के विभूषण से अलंकृत करे लागल, तब से आस्ते-आस्ते लोक के लोप होत चलि गइल. नतीजतन अधिकतर लोकसाहित्य के रचयिता आपन नांव गुपुते राखल आ फेरु ई परिपाटिए चलि निकलल.

एही से लोकसाहित्य शुद्ध रूप से मौखिक भा वाचिक परंपरा में आगा बढ़ल. ना त एकरा रचनिहार के अता-पता चलल, ना ई लिपिबद्धे भइल. बाकिर सभसे पहिले एकरा के केहू-ना-केहू त रचले होई जरूर आ लोकमित्रन के अपेक्षित-जरूरी संशोधन के बाद एकरा के लोक-मंजूरी मिलल होई. फेरु समय-संदर्भ का लेहाज से छोट-मोट परिवर्तन-परिवर्धन का साथे लोकसाहित्य के ऊ रचना समूह के रचना होके फइलत-पसरत चलि गइल होई. लोकसाहित्य का अंतर्गत लोकगीत, संस्कार गीत, ऋतुगीत,क्रीड़ागीत,श्रमगीत (जइसे जंतसार,रोपनी-सोहनी-कटनी के गीत),लोकगाथा,लोकोक्ति,लोककथा वगैरह विधा आवेली स. बाकिर एगो बात साफ-साफ देखल जाला कि चाहे लोक से जुड़ल कवनो विधा होखे,ओह में कवनो-ना-कवनो रूप में कथा के समावेश जरूर मिली.

किसिम-किसिम के लोककथा
लोकसाहित्य के अनमोल धरोहर ह लोककथा. एमें एक तरफ बरत आउर तीज-तेवहारन के कथा आवेली स, उहंवें दोसरा ओरि ओइसन कथा, जवन आजी-ईया-नानी के मुंह से अगिली पीढ़ी के सौगात का रूप में मिलत आ रहल बिया. लोकजिनिगी के विविध पक्षन के उद्घाटित करेवाली लोकभाषा के अइसन कथा, जवन अपना सरसता, रोचकता,कौतूहल आ मनोरंजन के गुन से सुनेवाला के मन में आपन अमिट छाप छोड़े, लोककथा कहावेले. भारत माई के अलगा-अलगा अंचरा आ दुनिया के कई गो देशन में बोलेवालन के निठाह तादाद राखेवाली लोकभाषा भोजपुरी में लोककथा के मुंहजबानी परिपाटी सदियन से चलल आ रहल बिया. ‘भोजपुरी नीति-कथा’ के भूमिका में डॉ रसिकबिहारी ओझा ‘निर्भीक’ लिखले बाड़न-‘ हमरा विचार से लोककथा मानव-मन के अनुभूति आ मस्तिष्क के सिरिजना ह. इन्हनीं में दिलचस्पी आ उत्सुकता बरकरार राखे के अद्भुत क्षमता होला. लोकसाहित्य में एकर आपन खासियत बा. ई लोककथा जीवन के हरेक क्षेत्र के छूवत नाना ढंग आ व्यापक रूप से हमनीं के सोझा आवेले. एकर परंपरा मौखिके रहल बा.’

कथा गइल वन में, सोचऽ अपना मन में!
भोजपुरी में कथा के ‘कहनी’ कहल जाला, जवन ‘कथन’ के पर्याय होला. हरेक लोककथा के भलहीं सोद्देश्य होखल जरूरी ना होखे, बाकिर ओमें भोजपुरिया संस्कृति के झांकी त मिलबे करेला. लोककथा के पात्र एक तरफ राजा-रानी, भूत-परेत, परी आउर अलगा-अलगा जाति-धरम के लोग होला, उहंवें दोसरा ओरि गोरू-माल-मवेशी, चिरई-चुरुंग,फेंड़-पउधा,नदी-नारा,पहाड़,चान-सुरुज -कहे के माने ई कि सउंसे प्रकृति होले. ‘एगो राजा रहले’ से शुरू भइल कथा में राजा के चमचागीरी-चापलूसी ना मिलेला,उलुटे राह से राह से भटकल बादशाह के सही राह प ले आवे आ डंड़े (दंडित करे) के कथा होला. अधिकतर कथा सुखांत होली स आ जहंवां कथा के अंत होला, उहंवें से सोच-विचार के सिलसिला शुरू हो जाला. कतहीं-कतहीं त कथा के आखिरी पांतिए होला-‘कथा गइल वन में, सोचऽ अपना मन में!’ तुकबंदी लोककथा के रोचकता में चार चान लगा देले. कवनो-कवनो कथा में त लोकगीत के किछु मजेदार पांती बेरि-बेरि दोहरावल जाले आ अतना रोचक होले कि सुनेवालन के जबान पर चढ़िके सहजे कंठस्थ हो जाले. कथासरित्सागर,वृहद कथा-मंजरी,पंचतंत्र,हितोपदेश,जातक कथा,सिंहासन बत्तीसी,बैताल पचीसी वगैरह लिपिबद्ध कथन के परिपाटी से ई लोककथा एह माने में अलगा बाड़ी स कि सोझ-सपाट गंवई लोग-लुगाई के मुंह से निकलल ई कथा सांस्कृतिक विरासत के अक्षुन्न राखे में काफी हद ले कामयाब रहल बाड़ी स.

इतिहास
लोककथा के इतिहास ओतने पुरान बा,जतना मनई के इतिहास. बुझिला आदिएकाल से ई कहल-सुनल जात रहल होइहें स आ इन्हनीं के मार्फत अदिमी के आसा-निरासा,हार-जीत,सुख-दु:ख, जिजीविषा, परदुखकातरता, कल्पनाशीलता वगैरह के कथात्मक अभिव्यक्ति होत रहल होई. डॉ निर्भीक के कहनाम बा-‘लोककथा में मानव-मन के सुकोमल इतिहास अंकित रहेला. अदिमी जवन किछु कइलस,एकर लेखा-जोखा त इतिहास में आ जाला,बाकिर अपना मन के मानसरोवर के तट पर ऊ जवन किछु सोचलस-गुनलस,रंगीन आ मधुर कल्पना कइलस आ सुन्नर सपना सजवलस-एकर विवरन लोककथा में भा लोकसाहित्य के दोसर विधा-लोकगीत,लोकोक्ति वगैरह में संजोवल गइल बा. इतिहास मनई के बहरी कारनामा के दस्तावेज होला,त लोकसाहित्य ओकरा भितरी मन के मानचित्र. सदियन से ई लोककथा मानव के मनोरंजन करत आ रहल बाड़ी स. इन्हनीं में किछऊ असंभव ना होला. इन्हनीं में बाघ आ सांप के इयारी होला,पंछी संदेश पहुंचावेलन स आ जरूरत परला पर देवालो बोले लागेले. इच्छा होते अदिमी सात समुंदर लांघिके पार हो जाला,घनघोर जंगल एके कुलांच में फानि जाला,धरती के नवो खंड के परिकरमा कऽ लेला आ कवनो टापू पर रहेवाली सुन्नर युवती से बियाह रचा लेला. थकइनी मेटावे आ समय बितावे के छन में लोककथा हमनीं सबके मनोरंजन करेले आ घोर निरासा के छन में अमिट आसरा के संचार करेले. ई लोककथा सामाजिक धरोहर ह.’

वर्गीकरन
‘लोकसाहित्य की भूमिका’ में डॉ कृष्णदेव उपाध्याय जी भोजपुरी लोककथा के छव हिस्सा में बंटले बानीं-उपदेशात्मक कथा, व्रतकथा,प्रेमकथा,मनोरंजक कथा,सामाजिक कथा आ पौराणिक कथा. बाकिर ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश की भोजपुरी लोककथाओं का सामाजिक अध्ययन’ शीर्षक शोध-ग्रंथ में डॉ परमेश्वर दूबे’शाहाबादी’ भोजपुरी लोककथा के वर्गीकरन एह किसिम से कइले बाड़न-सामाजिक कथा,धार्मिक कथा,आर्थिक कथा,राजनीतिक कथा,दार्शनिक कथा आ विविध कथा. उहां के मोताबिक,लोककथा में छव गो खास तत्व होलन स-कथानक आ कथावस्तु,पात्र आ पात्रन के चरित्र,कथोपकथन भा पात्र के वार्तालाप,वातावरन भा परिवेश,शैली भा अभिव्यक्ति के ढंग, आ उद्देश्य. कथा सुनत खा सुननिहारन के मन में कथानक खातिर जिज्ञासा बनल रहेला आ जइसे-जइसे कथा आगा बढ़ेले,ऊ ओह कथावस्तु का प्रति अधीर होत जाला-‘फेरु का भइल?’ के जवाब पावे खातिर. लोककथा कहे के अंदाज के खास अहमियत होला,जवना में सुननिहारन के बन्हले राखे के ताकत होला. हरेक कथा एगो मकसद से कहल जाले,जवन सुनेवालन पर आपन छाप छोड़ेले.

फरक आधुनिक कहानी से
लोककथा आ आधुनिक कहानी में मूलभूत फरक खाली मौखिक परंपरा आ लिपिबद्धते के ना होला. लोककथा कबो नसीब के नजरिया पर,त कबो हैरतअंगेज कारनामा पर आधारित होले,जबकि कहानी जथारथ के ऊबड़-खाबड़ जमीन पर आपन गोड़ रोपले बिया. एगो में राजा-रानी,भूत-परेत,परी,पशु-पक्षी,सुरुज-चान वगैरह पात्र का रूप में मौजूद रहेलन,त दोसरा में जिनिगी से जूझत मरद-मेहरारू आ लरिका.लोककथा में कथानक के प्रधानता होला आ एकर कवनो निश्चित ढांचा भा शिल्प ना होला,जबकि कहानी खातिर ई जरूरी शर्त होला. लोककथा में घटनन के भरमार होला,जबकि कहानी में भाव आ विचार के प्रधानता होला. ई जरूरी नइखे कि कहानी सुखांते होखे. कहानी के उद्देश्यपरकता त असंदिग्ध होला, बाकिर हर लोककथा सोद्देश्य होखे,ई जरूरी ना होला. मगर ई बात सोरहो आना सांच बा कि आधुनिक कहानी के जनम देबेवाली जननी ह लोककथा.

सर्वे भवन्तु सुखिन: के जयघोष
लोककथा कथा-कहन के कला से लैस होले आ एकर असर कथा कहे वाला के शैली पर निर्भर रहेला. एमें कुदरत के मानवीकरन देखते बनेला. कथानक अइसन तरतीबवार होला कि एक बेरि सुनि लिहला पर कथा मुंहजबानी इयाद हो जाले. लोककथा एहीसे कहल जाले कि ओकरा के एक कान से सुनिके दोसरा कान से उड़ा देबे के जगहा ओकरा प कान दिहल जाउ आ ‘सोचीं अपना मन में’ से चिंतन के प्रक्रिया शुरू कऽके सबक लिहल जाउ. लोककथा के सुखद अंत मंगलकामना से ओतप्रोत होला आ कुकरम के सजाइ का संगहीं हिरदय-परिवर्तन आ दुसमनो के सुख-सम्पन्नता के कामना एकर खासियत होला. मनोवैज्ञानिक चित्र उकेरेवाली लोककथा सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, नैतिक, दार्शनिक आउर आर्थिक सहित तमाम पच्छन के बखूबी उजागर करेले आ एह बाजारवादी धनलोलुपता,स्वार्थान्धता के निठुर काल में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के जयघोष करत शाश्वत सांच के एहसास करावेले. पहिले लोककथा सांझ-सवेरे कउड़ के घेरिके चारू ओरि बइठकी करत,खेत-खरिहान-बगइचा के रखवारी करत,जांत पर अनाज पीसत,खेत में रोपनी-सोहनी-कटनी करत,रात में लरिकन के सुतावत निश्चिंत होके कहल-सुनल जात रहली स.

तब ना त शिक्षा के परचार-परसार रहे,ना जिनिगी के आपाधापी,भागम-भाग आ ना मनोरंजन खातिर अतना अधिका संचारे माध्यम रहलन स. आजु केकरा फुरसत बा कहे आ सुने के! एह से आस्ते-आस्ते अधिकांश लोककथा कहे वाली कई गो पीढ़ी गुजरत चलि गइली स आ ओकरा संगहीं मरि-बिला गइली स अस्सी फीसदी लोककथा. आजु जरूरत एह बात के बा कि भारतीय लोकसंस्कृति के एह जियतार थाती,लोकसाहित्य के सभसे सेसर विधा लोककथा के अस्मिता के बचावे आ लिपिबद्ध कऽके विशाल पाठक वर्ग ले पहुंचावे के हरसंभव पहल कइल जाउ,जवना से कि संचार माध्यमन के खतरा से इन्हनीं के उबारल जा सके. अगर अइसन नइखे हो पावत,त लोककथा सुनावेवाली पीढ़ी के पूरी तरह गुजरि गइला का बाद ई धरोहर हरदम-हरदम-हरदम खातिर मटियामेट हो जाई. (भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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