Bhojpuri: सवाद के सरताज ह फुटेहरी, रउआ सभे खइले जरूर होखब!

फुटेहरी यानी लिट्टी को हर कोई चांव से खाना पसंद करता है.

फुटेहरी यानी लिट्टी को हर कोई चांव से खाना पसंद करता है.

भलहीं भिखारी ठाकुर 'मकइया रे, तोर गुन गूथबि माला' लिखिके मकई के महातम बतवले होखसु,बाकिर फुटेहरी के गुन त गूंग के गूर नियर होला, जवना के सबद में बयान भा बखान ना कइल जा सके. जे एक बेरि फुटेहरी खा ली, ऊ एकरा के कबो ना भुलाई आ बेरि-बेरि खाइल चाही.

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भोजपुरिया अक्खड़ सुभाव आ रसदार मन-मिजाज के मोताबिक जदी कवनो मजेदार व्यंजन लउकेला, त ऊ हऽ फुटेहरी (वर्तमान में लिट्टी). उहे सवाद के सरताज फुटेहरी, जवन देश-विदेश में लिट्टी-चोखा के नांव से जानल जाले आ बड़ से बड़ परोजन आजु फुटेहरी के अभाव में फीका लागेला. 'बिन पानी सब सून' कहेवाला रहीम आजु जिन्दा रहिते, त जरूर एह बात के कबूल करिते कि पानी का संगें-संगें फुटेहरियो जिनिगी के जियतार आउर सवदगर बनावे खातिर जरूरी होला. एकरा सोझा मए पकवान फेल बा. भलहीं भिखारी ठाकुर 'मकइया रे, तोर गुन गूथबि माला' लिखिके मकई के महातम बतवले होखसु,बाकिर फुटेहरी के गुन त गूंग के गूर नियर होला, जवना के सबद में बयान भा बखान ना कइल जा सके. जे एक बेरि फुटेहरी खा ली, ऊ एकरा के कबो ना भुलाई आ बेरि-बेरि खाइल चाही.

बलिया रेलवे स्टेशन के बहरी दक्खिन के टाउनहॉल रोड पर टहरत रहलीं. ओह रोड प मशहूर मिठाई के दोकान बाड़ी स, जवना में एक तरफ भारत भंडार बा,त दोसरा ओर कृष्ण मिष्ठान्न भंडार आउर क्षीरसागर. ओकरा बगल में एके लाइन से तीन-चार गो अइसन दोकान सजल-धजल लउकिहन स, जवनन का आगा होत फजीरे तगाड़ी में गोंइंठा के आगी के अहड़ा जोड़ा जाला आ ओकर धुआं चारू ओरि फइले-पसरे लागेला. त का ओह दोकानन में धुआं कऽके मच्छर भगावल जाला? जी ना,गोइंठा के आगी के अहड़ा जोड़िके उहवां फुटेहरी लगावेके तय्यारी कइल जाला. एगो अदिमी कड़ेरे हाथे आटा साने आ माड़ेला. फेरु छोटे-छोटे लोइया बनावेला. दोसर कामगार बूंट के खांटी सातू (सतुई) से फुटेहरी के मसाला बनावेला. सतुई में जेवाइन, मंगरइल,गोलमरीचि,लहसुन, पिआजु, अदरख, मरिचा, मरिचा के अचार वगैरह उचित मात्रा में मिलाके करू तेल डालिके मीसल जाला. हिसाब से नून मिलाईं आ फुटेहरी के मसालेदार सातू तय्यार! ओकरा के देखत कहीं कि मुंह में पानी आवे लागी,लार टपके लागी. एगो अदिमी के ऊ तनिकी भर मुट्ठी में पिंड़ी बनाके देता आ ऊ चीखिके बतावत बा कि नून-मसाला सभ किछु ठीक बा. कागजी नीबुओ गारि दिहल जात बा. अब लोइया के गड़हा (गुड़वा)बनाके ओमें मसालेदार सातू भरात बा आ लोइया के बन्न कऽ दिहल जात बा.

ओने अहड़ा के धुआं खतम हो गइला प धधकत आगी पर भराइल लोइया धरात जात बा, उलटात-पलटात बा आ आगी में फाटिके सोन्ह-सोन्ह फुटेहरी तय्यार हो जात बा. साफ कपड़ा में झारिके एक-एक कऽके फुटेहरी के घीव के कटोरा में डुबावल जात बा. ओने आगी प आलू-भंटा के पकाके सवदगर चोखा बना लिहल गइल बा. फुटेहरी आ चोखा पत्तल में परोसल जात बा. संगें-संगें खीरा,टमाटर, पिआजु के सलादो चलावल जाता. फेरु त का पूछे के!

फुटेहरी खाएवाला लोगन के भीड़ ठकचल जात बा. एह फुटेहरी का आगा सभ मिठाई फीका परि जात बाड़ी स. मिठाई त जहवां एगो-दूगो खइनीं कि मन भरि गइल. बाकिर फुटेहरी-चोखा त गहंकी लोग ओड़ा-ओड़ा के ले रहल बा आ रस ले-लेके सिसकारी भरत दनादन खा रहल बा. पेट भरि जाता,तबो मन नइखे भरत. खाएवाला सही माने में तिरपित हो जात बाड़न.
फुटेटरी के सर्वव्यापी सुभाव जग-जाहिर बा. एकरा के घर के अंगना में लगाईं भा दुआर पर (ई बनावल भा पकावल ना जाला,लगावल जाला),मेहरारू लोग लगावे भा मरद-मानुस, कवनो फरक ना परे. माल-मवेशी के मेला में गोरू बेचे-कीने वाला लोग सांझि का बेरा फुटेहरी लगाके खाला आ दिन में सातू सानिके मन-मिजाज बनवले रहेला. ददरी मेला में सांझि के बेरा बैलहट्टा में जाईं, त चारू ओरि धुएं-धुआं लउकी आ फुटेहरी के सोन्ह गमक वातावरन में पंवरत महसूस कइल जाला.

एकरा शोहरत के अंदाज एही से लगावल जा सकेला कि जब एगो भोजपुरिया सांसद रेलमंत्री भइल रहलन, त लिट्टी-चोखा के बहार आ गइल रहे आ हरेक रेलवे स्टेशन पर फुटेहरी के सवाद के खूब सराहना मिलल रहे. आजुओ सभ स्टेशन पर फुटेहरी मए व्यंजन के मात देत लउकी. शादी-बियाह समेत तमाम पारटी में अगर भोज के पहिले समहुत करे खातिर फुटेहरी-चोखा ना मिले, त सभ मजा किरकिरा हो जाला. तबे नू भोजपुरिया नायिका अपना परेमी से गोहरावत बाड़ी-

बलिया जइहऽ, हमें लेले जइहऽ



बगल में बइठाइके फुटेहरी खिअइहऽ हो करेजऊ!

फुटेटरी ना खाली अपना सवाद से जनता-जनार्दन के मन मोहेले, बलुक उत्तम सेहतो खातिर एकर इस्तेमाल कइल जाला. ई गैस के बेमारी से निजात दिअवावेले,पेट साफ राखेले आ मन-मिजाज के तरो-ताजा बनवले राखे में अहम भूमिका निबाहेले.

जातरा में जलखावा खातिर मुफीद होले, त लंचो-डिनर में एकरा इस्तेमाल से तन-मन तिरपित हो जाला.

नगर-महानगर में कोइला के आंच पर जवन लिट्टी लगावल जाला, ओमें ऊ सवाद कहां, जवन गोइंठा के आगी प लगावल फुटेहरी में मिलेला! एकरा में भोजपुरिया संस्कृति के गमक साफ-साफ महसूसल जाला. ई सामूहिकता के पर्याय होले, जवना के बहाना से पिकनिक मनावत लोग एक-दोसरा से जुड़ेला आ खानपान का जरिए सुख-दुख के सहभागी बनेला. फुटेहरी संस्कृति अइसन समिलात संस्कृति हऽ,जवन पक्का खानपान से सभके जोड़े आ हरदम जोड़ले राखे में बिसवास करेले.

त भाई-बहिनी,आईं!फुटेटरी संस्कृति अपनाईं.सरफुटौवल ना कऽके फुटेहरी खाईं-खिआईं, एक-दोसरा के तहेदिल से अपनाईं आ सामाजिक समरसता बढ़ावत जाईं. सांचो,फुटेहरी रे,तोर गुन गूथबि माला! (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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